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रिजर्व बैंक और बॉन्ड बाजार के साथ सरकार करे बेहतर संवाद

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  January 24, 2018

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने तीन हफ्ते से भी कम समय में अपने उधारी कार्यक्रम पर विचार बदल दिया है। मंत्रालय ने गत 27 दिसंबर को बाजार से 50,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज जुटाने का ऐलान किया था जिससे वर्ष 2017-18 में राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.2 फीसदी तक  सीमित रखने में चूक के संकेत मिले थे। लेकिन 17 जनवरी को मंत्रालय ने कहा कि वह बाजार से केवल 20,000 करोड़ रुपये का ही अतिरिक्त कर्ज लेगा। इस तरह मंत्रालय ने अतिरिक्त कर्ज के पूर्व-घोषित लक्ष्य में 60 फीसदी कटौती कर दी है।

 
सवाल यह है कि केंद्र सरकार को तीन हफ्तों के ही भीतर किन वजहों से अपनी योजना में संशोधन के लिए मजबूर होना पड़ा है? इसकी आधिकारिक वजह सरकार की राजस्व प्राप्तियों और व्यय परिपाटी का पुनर्मूल्यांकन है जिसने उसे बाजार हालात के अनुरूप फैसला लेने की क्षमता दी। इस अवधि में बम्बई स्टॉक एक्सचेंज का बेंचमार्क सूचकांक सेंसेक्स नई ऊंचाई पर पहुंच गया और 10 साल की अवधि वाले सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला प्रतिफल कम हो गया। बॉन्ड प्रतिफल में नवंबर 2016 के बाद की सर्वाधिक एकदिवसीय गिरावट भी देखी गई।
 
हालांकि मुंबई में बाजार प्रतिभागी सरकार की तरफ से दिए गए तर्क से प्रभावित नहीं दिखे। पिछले कुछ महीनों में सरकारी बॉन्ड के प्रतिफल इस आस में बढ़ते रहे हैं कि सरकार घाटा बढऩे पर आगे चलकर अधिक कर्ज लेने के लिए मजबूर होगी। अगस्त 2017 में 10 साल की अवधि वाले सरकारी बॉन्ड का जो प्रतिफल 6.4 फीसदी हुआ करता था वह जनवरी 2018 की शुरुआत में 7.4 फीसदी हो चुका था। लेकिन जब सरकार ने बाजार से अतिरिक्त कर्ज लेने की योजना में 60 फीसदी कटौती का ऐलान किया तो बॉन्ड प्रतिफल गिर गया।
 
बड़ी संख्या में ऐसे बॉन्ड खरीदने वाले बैंकों के पास हालिया घटनाओं से नाखुश होने की पर्याप्त वजह हैं। दिसंबर में बॉन्ड प्रतिफल बढऩे और कुछ ही दिन बाद उसमें गिरावट आ जाने से इन बैंकों को 31 दिसंबर, 2017 को समाप्त अवधि में घाटा दर्ज करना पड़ा। अब बैंक सोच रहे हैं कि अगर सरकार ने पहले ही अपनी राजस्व प्राप्तियों और व्यय परिपाटी का पुनर्मूल्यांकन कर लिया होता और उसकी घोषणा पहले ही कर दी होती तो बैंकों को बाजार में कम नुकसान उठाना पड़ा होता। लेकिन सरकार का यह ऐलान बैंकों के लिए तकलीफदेह साबित हो रहा है। दरअसल रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कुछ दिन पहले ही बैंकों से पूरी योजना एवं तैयारी के साथ बॉन्ड खरीद को अंजाम देने की सलाह देते हुए कहा था कि प्रतिफल में गिरावट आने से लगने वाले वित्तीय झटके से उबरने में उन्हें किसी तरह की नियामकीय मदद की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
 
बैंकिंग क्षेत्र के नियामक की इस चेतावनी को तो सरकारी बैंक शायद पचा भी सकते थे लेकिन उनकी प्रमुख अंशधारक केंद्र सरकार भी बैंकों को राहत प्रदान कर पाने वाली घोषणाओं को सही समय पर नहीं कर पाई। ऐसे में बैंकों का शिकायत करना काफी हद तक जायज है। आखिरकार सरकार के नियंत्रण वाले बैंक ही सरकारी बॉन्ड के सबसे बड़े खरीदार हैं। अगर बैंक इन बैंकों की खरीद में कम रुचि लेते हैं तो उससे सरकार की अतिरिक्त कर्ज जुटाने की योजना पर बुरा असर पड़ सकता है। वास्तव में, पिछले कुछ बॉन्ड बिक्री कार्यक्रम वांछित नतीजे हासिल कर पाने में नाकाम रहे हैं क्योंकि कई सरकार-नियंत्रित बैंकों ने उनसे दूरी बनाए रखी।
 
वैसे सरकारी बॉन्ड पर अतिशय निर्भरता के चलते सार्वजनिक बैंकों को मुश्किल हालात से उबारने की बात में कोई दम नहीं है। इन बैंकों की सुस्त बैंकिंग आदतों के चलते ही ऐसी हालत पैदा होती है। लेकिन मौजूदा घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में दो विचारणीय मुद्दे जरूर सामने आए हैं।रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर का कड़ा संदेश सरकार की तरफ से अतिरिक्त कर्ज लेने की घोषणा के कुछ दिन बाद ही आया था। लेकिन इस संदेश की विश्वसनीयता और असर तब और अधिक होता जब रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय ने सरकारी उधारी कार्यक्रम की देखभाल के लिए एक अलग कर्ज प्रबंधन इकाई का गठन किया होता। लेकिन सच यह है कि अब भी रिजर्व बैंक ही सरकार के उधारी कार्यक्रम की देखरेख करता है जो एक तरह से हितों के टकराव को जन्म देता है। क्या रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय दोनों को सरकार के उधारी कार्यक्रम की निगरानी के लिए अलग इकाई बनाने की दिशा में तेजी से कदम नहीं बढ़ाने चाहिए? अगर ऐसा होता तो रिजर्व बैंक ने बैंकों को बॉन्ड खरीद के संदर्भ में जवाबदेह ठहराने की जो कोशिश की है, उसकी कहीं अधिक विश्वसनीयता होती।
 
इसके अलावा चिंता का एक और बिंदु है। अगर वित्त मंत्रालय को यह मालूम था कि उसकी रिजर्व बैंक के साथ अधिशेष की कुछ अतिरिक्त रकम हस्तांतरित करने के बारे में चर्चा चल रही है और उसकी व्यय परिपाटी (व्यय पर बचत) की वजह से बाजार से कर्ज लेने की उसकी जरूरत कम हो सकती है तो फिर 50,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त उधारी लेकर बॉन्ड बाजार को दहलाने की घोषणा का क्या औचित्य था? कहीं ऐसा तो नहीं है कि महज तीन हफ्ते के ही भीतर की गई दोनों घोषणाओं का मकसद बॉन्ड बाजार की अपेक्षाओं को काबू में रखना था, भले ही सार्वजनिक बैंकों को इनकी दोतरफा मार झेलनी पड़ी हो?
 
जो भी हो, सरकार को बॉन्ड बाजार के साथ संवाद स्थापित करते समय और रिजर्व बैंक के साथ सामंजस्य बनाते समय कहीं अधिक पारदर्शी और कारगर रणनीति अपनाने की जरूरत है। मौजूदा हालात में सरकार की उधारी योजनाओं को अंजाम देने के लिए दोनों बातें अहम हैं। बॉन्ड की बिक्री के सही प्रबंधन के लिए एक नए निकाय का गठन होने के साथ ही रिजर्व बैंक एवं बॉन्ड बाजार के साथ पारदर्शी संवाद स्थापित करने की भी जरूरत है।
Keyword: finance ministry, RBI, bank,,
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