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देश में सस्ते आवास क्षेत्र की समस्याएं

इंद्रजित गुप्ता /  January 24, 2018

भारत में हर वर्ष 50 लाख सस्ते मकानों की आवश्यकता है जबकि आपूर्ति 5 लाख मकानों की भी नहीं हो पा रही है। देश में इस समस्या और इसके निदान के बारे में बात कर रहे हैं इंद्रजित गुप्ता

 
देश में सस्ते आवास की समस्या एक अबूझ पहेली बनी हुई है। हमें हर वर्ष करीब 50 लाख सस्ते मकानों की आवश्यकता है जबकि आपूर्ति के मोर्चे पर हम 5 लाख का आंकड़ा भी नहीं छू पा रहे हैं।  मांग और आपूर्ति के इस अंतर के मद्देनजर ही भारत दुनिया की सबसे बड़ी और कई अरब की लागत वाली सस्ती आवास निर्माण योजना के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। आपको यह लग सकता है कि ऐसे में बड़े-बड़े डेवलपर्स की भीड़ लग जाएगी। स्थापित कारोबारी घराने और देश के चतुर कारोबारी इस अवसर का लाभ उठाने के लिए सामने आएंगे। 
 
परंतु चकित करने वाली बात यह है कि पूरा परिदृश्य विफल प्रयासों से भरा हुआ है। इतना ही नहीं इस क्षेत्र में काम करने की मंशा भी कम ही नजर आती है। सवाल यह उठता है कि देश के बड़े कारोबारी घराने मसलन टाटा समूह और महिंद्रा समूह या फिर बैंकर से कारोबारी बने जयतीर्थ राव का वैल्यू ऐंड बजट हाउसिंग कॉर्पोरेशन (वीबीएचसी) इस क्षेत्र में क्यों नहीं सक्रिय हुए। देश में जहां 7.8 करोड़ बेघर लोग हैं तो भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबके लिए आवास की योजना 2022 तक पूरा होने के लक्ष्य के आसपास भी नजर नहीं आ रही है। आखिर क्यों? 
 
मैंने इस बारे में संबंधित पक्षकारों से जो भी बातचीत की है उसके आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि सस्ते आवास की समस्या देश में व्याप्त कई अन्य समस्याओं में से एक साबित हुई है। कम से कम तीन देश, चीन, मैक्सिको और थाईलैंड ने बड़े पैमाने पर इस समस्या को हल कर लिया है। हमारे देश में इस दिशा में कुछ साहसी प्रयास अवश्य किए गए हैं लेकिन व्यापक पैमाने पर काम करने वाला कोई कारोबारी मॉडल अब तक सामने नहीं आया है।  आइए बात करते हैं उन परिकल्पनाओं पर जो इसके पीछे वजह हो सकती हैं। पहली बात, ज्यादातर बड़े निवेशक खूबसूरत सजावटी गेट वाले एन्क्लेव बनाने में रुचि रखते हैं। जिनमें प्राय: अमीर और उच्च मध्य वर्ग के लोग रहते हैं। ये डेवलपर सस्ते आवास निर्माण से मिलने वाले 15 फीसदी के मामूली प्रतिफल पर काम नहीं कर सकते। दूसरी बात, भारत में अनेक कुछ-कुछ किलोमीटर की दूरी पर भी कई छोटे बाजार रहते हैं। ऐसे में एक मानक उत्पाद तैयार कर पाना बहुत नुकसानदेह साबित हो सकता है। मांग की प्रकृति का सही-सही आकलन कर पाना भी एक ऐसा काम है जो आसान नहीं। तीसरी बात, विपणन और बिक्री की बात करें तो कम मार्जिन और ज्यादा वॉल्यूम वाले क्षेत्र में यह काम दोहरी चुनौती से भरा होता है। चौथी बात, सरकारी नीतियां भी इस मामले में ज्यादातर गलत दिशा में ही रही हैं। उदाहरण के लिए कम आय वाले उपभोक्ताओं को सब्सिडी देने का कोई तुक नहीं नजर आता। समस्या मांग तैयार करने की नहीं है। बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि आपूर्ति की दिक्कत दूर हो। पांचवीं बात, करीब 20,000 से अधिक स्थानीय उद्यमी हैं जिनके बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते। ये उद्यमी आवास बाजार के हाशिये पर काम करते है और सस्ते मकानों की मांग पूरी करते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो सस्ते मकानों की आपूर्ति का 90 फीसदी यही पूरा करते हैं। उनके पास इस कारोबार को सफल बनाने के तीन जरूरी कारकों में से दो हैं। एक तो जरूरी मानसिकता और स्थानीय माहौल को समझने की काबिलियत। उनके पास सस्ती पूंजी और मजबूत संचालन ढांचे की कमी रहती है।
 
टाटा हाउसिंग या महिंद्रा जैसे संस्थानों के पास जहां पूंजी की कोई कमी नहीं होती है, वहीं उनके पास सफलता पाने के लिए जरूरी मानसिकता नहीं होती। मुझे याद है कि डॉ. सी के प्रह्लाद से हुई एक बातचीत जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके लिए बजट होटल ब्रांड जिंजर के निर्माण और डिजाइन के दौरान उसकी मालिक कंपनी इंडियन होटल्स की टीम के साथ काम करना काफी मुश्किल साबित हुआ था। उन्होंने इसका दोष लक्जरी होटल मालिक होने पर डाला।  सवाल यह है कि भारत इस चुनौती को हल करने के लिए क्या कर सकता है? क्या उसे इस बात की प्रतीक्षा जारी रखनी चाहिए कि बड़े कारोबारी घराने आगे आकर इस कमी को दूर करेंगे? क्या हमें सस्ते मकानों को प्राथमिकता वाले ऋण का हिस्सा बनाकर अधिक से अधिक सस्ती पूंजी इस क्षेत्र के लिए सुनिश्चित करनी चाहिए? क्या हमें इसके लिए बाजार आधारित हल सामने आने देने चाहिए जहां नए छोटे, बिना ब्रांड वाले अचल संपत्ति कारोबारी सामने आकर इतने बड़े पैमाने पर मकान की जरूरत पूरी कर सकें? 
 
इनमें से अंतिम बात सबसे अधिक रोचक है। हाल ही में मेरी मुलाकात राजेश कृष्णन से हुई। पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल से पढ़े कृष्णन पहले बैंकर थे और अब वह ब्रिकईगल नामक फर्म चलाते हैं जो खुद को सस्ते मकान बनाने में अव्वल बताती है। उनकी कोशिश दो स्तरों पर चलती है।  पहला, बेहतर स्थानीय अचल संपत्ति उद्यमियों की तलाश करना और उनको सस्ती पूंजी मुहैया कराना। यह पूंजी सामाजिक प्रभाव छोडऩे के इच्छुक निवेशकों से जुटाई जाती है। इन्हें इंपैक्ट इन्वेस्टर भी कहते हैं। दूसरा, सस्ते आवास की मूल्य शृंखला तैयार करते हुए एक सहयोगी पर्यावास तैयार करना। इसके लिए ऐसी फर्म में निवेश किया जाता है जो सस्ती विनिर्माण तकनीक, इंटीरियर डिजाइन आदि तैयार करती हैं। इससे पोर्टफोलियो फर्म को इसके व्यापक पैमाने और जटिलता को संभालने में मदद मिलती है। 
 
ब्रिकईगल अपने स्तर पर सस्ते आवास का जो माहौल बनाने का प्रयास कर रही है वह सराहनीय है। परंतु आखिर में जब तक सरकार की प्रक्रिया को सुसंगत नहीं किया जाता है तब तक होने वाली देरी काफी नुकसानदेह साबित हो सकती है। अब जरूरत है कि निजी सार्वजनिक भागीदारी के क्षेत्र में पारदर्शिता लाई जाए ताकि मैक्सिको में जो खामियां सामने आई हैं वे हमारे यहां न दोहराई जाएं। यह खुलासा वहां द लॉस एंजलिस टाइम्स की खोजी रपट से हुआ। वहां सरकार ने वर्ष 2001 में एक महत्त्वाकांक्षी आवासीय योजना तैयार की थी परंतु उसे पूरी सफलता नहीं मिली। भारत को भी अपने आवास संकट को तत्काल हल करने की आवश्यकता है। देश के बेहतर उद्यमी इसे हल करने की स्थिति में हैं। अगर सरकार बड़े बिल्डरों के बजाय उनका सहयोग करे तो काम बन सकता है क्योंकि बड़े बिल्डर तो पूरी तरह महंगे आवास पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं।
Keyword: real estate, property, home, house,,
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