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निर्वाचन बॉन्ड के नाम पर बेनामी चंदे की नई राह

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  January 23, 2018

इन दिनों पूरे देश का ध्यान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के सार्वजनिक हुए मतभेदों पर है। राजनीतिक दल भी इन हालिया घटनाओं का अपने-अपने तरीके से लाभ लेने का प्रयास कर रहे हैं। इस शोरगुल में लोगों का ध्यान एक भारी पुरातनपंथी कदम पर नहीं जा पाया। केंद्र सरकार ने सभी राजनीतिक दलों को नए साल का तोहफा देते हुए निर्वाचन बॉन्ड के जरिये राजनीतिक चंदे के अपने वादे पर अमल करने का निर्णय किया। सरकार का कहना है कि इससे बेनामी राजनीतिक चंदे का प्रचलन समाप्त होगा। 

 
निर्वाचन बॉन्ड के बारे में गत वर्ष आम बजट प्रस्तुत होने के बाद हल्की चर्चा हुई थी। राजनीतिक दल सभी संस्थानों में पारदर्शिता की बात पूरी प्रसन्नता से करते हैं लेकिन निर्वाचन बॉन्ड के बिना जवाबदेही के उनके लिए धन जुटाने की बात आने पर वे चुप्पी साध लेते हैं। आइए देखते हैं कि ये बॉन्ड कैसे काम करेंगे। भारतीय स्टेट बैंक 15 दिन की वैधता वाले ये बॉन्ड जारी करेगा। ये बॉन्ड आप एसबीआई से खरीदेंगे। 15 दिन के भीतर आप इन बॉन्ड को किसी राजनीतिक दल को दान देंगे। दान में इन्हें पूरी गोपनीयता के साथ राजनीतिक दलों के खाते में जमा किया जा सकेगा। इस सिलसिले में कोई पूछताछ नहीं होगी। न तो आपको बॉन्ड खरीद की कोई जानकारी देनी होगी और न ही आपको यह बताना होगा कि आपने किसे दान दिया। राजनीतिक दलों को यह पता न लगे कि उनका दानदाता कौन है। यह बात एकदम सतही है क्योंकि उनको अच्छी तरह पता होगा कि उन्हें निर्वाचन बॉन्ड के जरिये दान कौन दे रहा है। आज भी वे अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें नकदी में दान कौन देता है। बहरहाल, गोपनीयता के नाम पर वे इसलिए राहत की सांस लेंगे क्योंकि उनको यह नहीं बताना होगा कि उन्हें धन कहां से मिला। 
 
राजनीतिक दलों को किसी भी तरह की जवाबदेही से बचाए रखने के लिहाज से यह बेहतरीन तरीका तलाश किया गया है। इससे पहले सूचना के अधिकार के तहत खुलासे के खिलाफ भी सभी राजनीतिक दल एकजुट हो गए थे। अब निर्वाचन बॉन्ड के जरिये वे यह दिखाने का ढोंग करेंगे कि उन्हें नहीं पता कि उनको दान कौन दे रहा है।  देश में भ्रष्टाचार की अहम वजह यह भी है कि राजनीतिक दल चुनावी खर्च के लिए भारी पैमाने पर धन एकत्रित करके रखते हैं। जिन पार्टियों को किसी वजह से अपने खजांची गंवाने पड़े हैं उन्हें चुनावों में भी नकारात्मक परिदृश्य का सामना करना पड़ता है। हर पार्टी यही मानती है कि वही देश के लिए सबसे बेहतर है। हर पार्टी को यह लगता है कि देश को बचाने के लिए उसका चुनाव जीतना आवश्यक है। पार्टी नेता इस भ्रम में रहते हैं कि वे भ्रष्टï नहीं हैं क्योंकि वे तो पार्टी की फंडिंग के लिए पैसे लेते हैं जो दरअसल राष्ट्र निर्माण का काम है। राष्ट्र हित के नाम पर कई अनैतिक कृत्य ढक दिए जाते हैं। 
 
नकदी को बैंक बैलेंस में बदलने के काम में धन शोधन करने वाले फलते-फूलते हैं। अब निर्वाचन बॉन्ड के आने के बाद राजनीतिक दलों को शायद हवाला दलालों की मदद नहीं लेनी पड़ेगी। अब यह काम उनके जिम्मे होगा जो उन्हें फंड देते हैं।  राजनीतिक दलों को निर्वाचन बॉन्ड के इस्तेमाल का अधिकार देना मुख्य सूचना आयुक्त के उन निर्देशों की स्पष्टï अवहेलना है जिनमें उन्होंने कहा था कि दलों को अपनी फंडिंग के स्रोत का खुलासा करना चाहिए। निर्वाचन बॉन्ड अब उनको एक अवसर दे रहे हैं ताकि वे अपना बचाव कर सकें। गत वर्ष फाइनैंस ऐक्ट 2017 में चुनावों में कॉर्पोरेट फंडिंग की सीमा को समाप्त करने संबंधी संशोधन किया गया था। 
 
निर्वाचन बॉन्ड के आगमन के बाद एसबीआई को यह पता होगा कि किसने कितने निर्वाचन बॉन्ड खरीदे हैं और किसके खाते में इन्हें जमा किया गया। एसबीआई के पास यह क्षमता होगी कि वह बॉन्ड की खरीद और प्राप्ति का मिलान कर सके। एसबीआई सरकारी बैंक है और सत्ताधारी दल को हमेशा इस सूचना के मामले में वरीयता हासिल होगी। किसी गोपनीय सूचना का सरकारी एजेंसी के पास होना हमेशा शंका पैदा करता है। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग एकमात्र ऐसी एजेंसी है जो अब तक अपनी गोपनीयता बरकरार रख सकी है। 
 
आम आदमी के लिए यह पता लगा पाना असंभव होगा कि किस कारोबारी घराने ने किस राजनीतिक दल को चंदा दिया। यहां सभी राजनीतिक दलों की साझा चुप्पी का षडयंत्र बहुत मायने रखता है। भ्रष्टï राजनीतिक फंडिंग को अब बैंकिंग चैनल से जोड़कर एक हद तक सम्मानजनक काम बना दिया गया है। राजनीतिक दलों की फंडिंग ऐसा क्षेत्र है जहां कोई दल अपने प्रतिस्पर्धियों के खिलाफ कुछ नहीं बोलेगा। फंड के स्रोत की बात करें तो उनका इतिहास रहा है कि इस क्षेत्र में किसी भी हालत में पारदर्शिता न आने पाए और न ही राजनीतिक फंडिंग में कोई सुधार हो। हर राजनीतिक दल निर्वाचन बॉन्ड के जरिये मिले समेकित धन का खुलासा करेगा लेकिन पहचान उजागर नहीं की जाएगी। न ही दानदाता और न ही उसे हासिल करने वालों के आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाएगा। बॉन्ड के आगमन और एसबीआई की भूमिका को देखते हुए इन बॉन्ड को नकदी का स्थानापन्न बताया गया। इन बातों का तात्पर्य यह है कि धनशोधन का भार अब राजनीतिक दलों के बजाय दानदाताओं पर आ जाएगा। राजनीतिक दल अब निर्वाचन बॉन्ड को स्वच्छ फंडिंग का दावा करने का जरिया बनाएंगे।
 
सरकार ने निर्वाचन बॉन्ड के बचाव में जो आधिकारिक बयान जारी किया है उसमें दो अच्छी बातें हैं। पत्र सूचना कार्यालय ने इस बारे में जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की उसमें कहा गया कि इस बॉन्ड की मदद से एक हद तक पारदर्शिता आएगी। उसमें यह भी कहा गया कि बॉन्ड की आलोचना ऐसे अव्यावहारिक सुझावों के दायरे में आती है जो अंतत: नकद दान की ओर जाते हैं। संक्षेप में कहें तो राजनीतिक दल अपनी संस्थागत व्यवस्था को लेकर उभरे विवाद के बाद सामने आए न्यायाधीशों को लेकर उत्साहित हैं लेकिन राजनीतिक चंदे में बेनामी राशि को उन्होंने संस्थागत मजबूती देने का काम किया है। 
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