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वैश्विक अव्यवस्था बनाम प्रगति

शंकर आचार्य /  January 22, 2018

विश्व व्यवस्था के समक्ष चुनौतियां बरकरार हैं। भले ही वे अभी नजर नहीं आ रही हों लेकिन भविष्य में हमें उनका सामना करना होगा। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं शंकर आचार्य 

 
वर्ष 2017 वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था की दृष्टि से बहुत अच्छा नहीं रहा। इस दौरान कुछ घटनाएं और उनसे जुड़े रुझान कुछ इस प्रकार रहे:
 
अमेरिका के ट्रंप प्रशासन की ओर से सर्वनाश की धमकियों के बावजूद उत्तर कोरिया की परमाणु और प्रक्षेपास्त्र क्षमता अत्यधिक उच्च स्तर तक बढ़ गई है। इससे कोरियाई प्रायद्वीप तथा अन्य इलाकों में बड़े टकराव की आशंका बढ़ गई है।
 
अब इस बात की काफी आशंका है कि प्रमुख महाशक्तियों और ईरान के बीच ओबामा के कार्यकाल के आखिरी साल में हुए परमाणु हथियार सीमित करने के समझौते को अमेरिका नकार दे। इसका क्षेत्रीय स्थिरता पर गहन असर होगा।
 
चीन ने दक्षिण चीन सागर, हिमालय और अन्य भौगोलिक क्षेत्रों में अपनी विस्तारवादी नीतियों में इजाफा किया है। इससे भी अंतरराष्ट्रीय शांति और व्यापार गतिविधियों के लिए खतरा उत्पन्न हुआ है।
 
ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब और इजरायल के समर्थन वाली नीतियां अपना रखी हैं जो पश्चिम एशिया में शिया-सुन्नी विवाद को बढ़ावा देंगी और इसके चलते इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष में शांति स्थापना की संभावना लगातार सीमित होती जाएगी।
 
अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, यमन, लीबिया, सूडान, सोमालिया, नाइजीरिया, पाकिस्तान और फिलीपींस में ज्यादातर जगहों पर गृहयुद्ध जारी हैं। म्यांमार में भी इन्होंने जोर पकड़ा है। 
 
ये विवाद तथा ऐसे अन्य विवादों के चलते ही दुनिया भर में विस्थापितों की तादाद 6.5 करोड़ के नए स्तर पर पहुंच गई है। संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी उच्चायुक्त के मुताबिक इनमें से एक तिहाई से ज्यादा सीमापार के शरणार्थी हैं।
 
आर्कटिक की बर्फ पिघलने तथा मनुष्य की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन के अन्य संकेत स्पष्ट मिलने के बावजूद अमेरिका ने 2015 के अपेक्षाकृत कमजोर पेरिस समझौते से बाहर का रुख किया। इससे भविष्य में पर्यावरण सुधार की संभावना को नुकसान पहुंचा है।
 
ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से अलग होने का कठिन निर्णय लिया। इसके बाद ब्रिटेन और शेष यूरोप दोनों के लिए अनिश्चित घटनाएं सामने आने का जोखिम बढ़ गया है।
 
विश्व व्यापार संगठन ने बहुपक्षीय व्यापार समझौतों को उदार बनाने के संबंध में कोई पहल नहीं की। जबकि उसकी मौजूदा विवाद निस्तारण व्यवस्था को अमेरिका ने नए न्यायाधीशों की नियुक्ति में बाधा उत्पन्न कर कमजोर किया। 
 
अमेरिका प्रशांत पार समझौते यानी सुपर रीजनल ट्रेड एग्रीमेंट से भी बाहर हो गया है जबकि इस पर पहले चर्चा हो चुकी थी। इससे अटलांटिक पार व्यापार एवं निवेश साझेदारी भी ठंडे बस्ते में चली गई है।
 
इस उदासीन राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में प्रश्न यह है कि साल 2017 में वैश्विक आर्थिक प्रदर्शन कैसा रहा? हर किसी ने सोचा होगा कि यह कमजोर रहा होगा। आम जनभावना तो यही है कि शांति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का वातावरण अच्छे आर्थिक प्रदर्शन का वाहक होना चाहिए और इसके विपरीत हालात आर्थिक हालात को कमजोर बनाने वाले होने चाहिए। हकीकत में सन 2017 वैश्विक आर्थिक वृद्धि और शेयर बाजारों के उल्लेखनीय प्रदर्शन वाला वर्ष रहा।  अगर 2010 में बाजार के 2009 की मंदी से वापसी के सुधार के अलावा बाजार विनिमय दर पर 80 लाख करोड़ डॉलर वाली वैश्विक अर्थव्यवस्था पिछले एक दशक में पहली बार 3 फीसदी से तेज गति से विकसित हुई। 19 लाख करोड़ डॉलर की अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी 2.2 फीसदी की गति से विकसित हुई। बेरोजगारी भी सन 2000 के बाद से अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर रही, मुद्रास्फीति करीब 2 फीसदी के स्तर पर रहा और शेयर बाजार में तेजी देखने को मिली। अन्य आर्थिक दिग्गजों की बात करें तो 17 लाख करोड़ डॉलर वाला यूरोपीय संघ भी 2.3 फीसदी की गति से विकसित हुआ। यह उसकी एक दशक की सबसे तेज वृद्घि है। इसमें जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और यहां तक कि इटली का भी अच्छा खासा योगदान रहा। अन्य बड़े देशों की बात करें तो चीन (12 लाख करोड़ डॉलर) और जापान (5 लाख करोड़ डॉलर) ने भी बहुत मजबूती दिखाई। ये दोनों देश क्रमश: 6.8 फीसदी और 1.5 फीसदी की दर से वृद्घि हासिल करने में कामयाब रहे। एक लाख करोड़ डॉलर से बड़े आकार की अन्य अहम अर्थव्यवस्थाओं की बात करें तो भारत को छोड़कर सबने बढिय़ा वृद्घि हासिल की। 
 
बहुत स्पष्टï सी बात है कि वर्ष 2017 वैश्विक आर्थिक विस्तार की दृष्टिï से वर्ष 2007 के बाद का सबसे बेहतरीन वर्ष था। यहां बात केवल आर्थिक वृद्घि की नहीं है बल्कि अधिकांश बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में बेरोजगारी दर कम हुई और मुद्रास्फीति कमतर बनी रही। दुनिया भर के शेयर बाजारों में उछाल आई। यहां तक कि जापान में भी निक्केई सूचकांक 26 सालों के उच्चतम स्तर पर जा पहुंचा। आखिर यह विरोधाभास क्यों? इसके लिए एक मजबूत स्पष्टïीकरण की आवश्यकता है। परंतु कुछ और बातें हैं जो इस संबंध में हमें सार्थक राह दिखा सकती हैं: 
 
उत्तर कोरिया की बढ़ी परमाणु मिसाइल क्षमता ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते की कमजोरी, चीन की बढ़ती आक्रामकता और शिया-सुन्नी विवाद का गहराना कुछ ऐसी राजनीतिक चुनौतियां हैं जो दुनिया को प्रभावित कर सकती हैं। परंतु इनका आर्थिक प्रभाव बहुत गहरा होता नहीं दिखता। अगर हालात बिगड़े तब जरूर प्रभाव गंभीर हो सकता है।
 
पश्चिम एशिया, अफ्रीका और एशिया के अन्य हिस्सों में गृहयुद्घ का सिलसिला रहा है। इसमें बहुत अधिक जानें गई हैं। इन क्षेत्रों में लोगों की आजीविका और आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। परंतु ये क्षेत्र वैश्विक आर्थिक गतिविधियों में कोई अहम योगदान नहीं करते। जाहिर सी बात है कि अगर ये विवाद नहीं हों या हल हो जाएं तो मजबूत आर्थिक वृद्घि देखने को मिल सकती है।
 
करीब 6.5 करोड़ से अधिक लोग जबरन विस्थापित हैं। उनकी हालत शोचनीय है लेकिन उनकी स्थिति ने वैश्विक जीडीपी या वृद्घि दर को कतई प्रभावित नहीं किया है। 
 
ऐसे तमाम अध्ययन हैं जो बताते हैं कि कैसे मनुष्यगत जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को पहुंचे नुकसान ने हमें प्रभावित करना शुरू कर दिया है। लेकिन यह भी जीडीपी में नहीं दिख रहा है क्योंकि जीडीपी केवल आर्थिक गतिविधियों और आय को ध्यान में रखता है। वैसे भी असली चुनौती तो आगे आएगी क्योंकि वैश्विक तापमान बहुत तेजी से बढ़ रहा है। मौजूदा नीतिगत अदूरदर्शिता के कारण वैश्विक आर्थिक गतिविधियां भविष्य में अवश्य प्रभावित होंगी। उसका असर आने वाली पीढिय़ों पर होगा। 
 
मुक्त अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भी खतरा बरकरार है। संरक्षणवाद का उदय वैश्विक कारोबार को प्रभावित करेगा। इसी तरह ब्रेक्सिट का आर्थिक कष्टï अभी दूर नहीं हुआ है। ऐसा ज्यादातर ब्रिटेन की धीमी आर्थिक वृद्घि के रूप में देखने को मिलेगा। 
 
लब्बोलुआब यह कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के समक्ष संकट वास्तव में है। भले ही वह फिलहाल बेहतर जीडीपी रुझानों के बीच नजर नहीं आ रहा हो। 
Keyword: world, economy, america trump,,
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