बिजनेस स्टैंडर्ड - श्रम सुधार: अकेला कानून नहीं हो सकता पर्याप्त
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श्रम सुधार: अकेला कानून नहीं हो सकता पर्याप्त

ए के भट्टाचार्य /  January 21, 2018

लगता है कि श्रम सुधारों पर हलचल हो रही है। केंद्र और राज्य सरकारें सभी तरह के श्रम सुधारों को आगे बढ़ाने में व्यस्त हैं। लेकिन जिस तरीके से केंद्र और राज्य सरकारें श्रम सुधारों को आगे बढ़ा रही हैं, उनमें कई असमानताएं हैं। 

उदाहरण के लिए कुछ ही दिन पहले जम्मू कश्मीर की सरकार ने श्रम कानूनों में सुधार की योजना को आगे बढ़ाने की घोषणा की। राज्य सरकार ने 2018-19 के बजट में घोषणा की कि जल्दी ही एक समान रोजगार कानून को अंतिम रूप दिया जाएगा। प्रस्तावित कानून में मौजूदा सभी 260 श्रम कानूनों को समाहित किया जाएगा। जरूरी नहीं है कि इन सभी कानूनों को एक श्रम कानून में बदलने के अपेक्षित परिणाम निकलें जिनमें कामगारों को नौकरी पर रखने और निकालने में लचीलापन, अच्छा वेतन, काम की परिस्थितियों में सुधार और छंटनी की स्थिति में कामगारों को आकर्षक मुआवजा पैकेज शामिल है। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आपको कई मौजूदा कानूनों को मिलाकर एक कानून बनाने के बजाय श्रम कानूनों में विशिष्टï बदलाव करने होंगे। 

आदर्श स्थिति में इन बदलावों से यह सुनिश्चित होना चाहिए कि नियोक्ताओं को जरूरत के मुताबिक किसी प्रोजेक्ट के लिए कामगारों को रखने की उतनी ही आजादी होनी चाहिए जितनी कि जरूरत नहीं होने या प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद निकालने की। छंटनी पर नियोक्ताओं को वाजिब कीमत चुकानी चाहिए ताकि ऐसा कोई भी फैसला सोचसमझकर लिया जाए। इस तरह की छंटनी में हमेशा प्रभावित कर्मचारियों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए।

यह साफ नहीं है कि जम्मू कश्मीर सरकार के एकीकृत रोजगार कानून में इन तत्त्वों को शामिल किया जाएगा या नहीं। अगर इन्हें शामिल भी किया जाता है तो भी आप निश्चित तौर पर नहीं कह सकते कि इन बदलावों से निवेश के माहौल में तत्काल कोई ठोस सुधार आएगा। 

सोचिए कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्टï्र जैसे राज्यों में क्या हुआ जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में जोरशोर से अपने कुछ श्रम कानूनों में सुधार किए हैं। लेकिन अभी इन राज्यों के निवेश के माहौल या फिर श्रम बाजार में इसका असर नहीं दिखाई दिया है। राजस्थान सरकार ने तो 300 से कम कर्मचारियों वाली कंपनियों को छंटनी के लिए सरकार की मंजूरी लेने से भी मुक्त कर दिया है। पहले यह सीमा 100 थी। 

लेकिन श्रम सुधारों के बावजूद इन राज्यों को पिछले दो वर्षों में निवेश के जो प्रस्ताव मिले हैं, उनकी कुल राशि में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। यह वृद्घि पूरे देश की रफ्तार से भी कम है। राजस्थान में 2015 की तुलना में 2016 में निवेश के प्रस्तावों की कुल राशि में कमी आई जबकि मध्य प्रदेश में 2017 में यही स्थिति रही।

अलबत्ता निवेश प्रस्ताव के आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि देश में निवेश के माहौल की बेहतरी के लिए श्रम कानूनों में सुधार की जरूरत नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि केवल श्रम कानून में सुधार से ही निवेश का प्रवाह बेहतर नहीं हो सकता है। कई दूसरे अहम कारक भी निवेश बढ़ाने में सहायक हैं। इनमें कुशल श्रमिकों की उपलब्धता, मजबूत बुनियादी ढांचा और वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए बढ़ता बाजार शामिल है।

इस बात को भी नजरअंदाज किया गया है कि सुधारों को अपना चुका श्रम बाजार एक समय के बाद ही ज्यादा निवेश प्रवाह आकर्षित कर सकता है। इतना ही नहीं, सुधारों से अपेक्षित परिणाम हासिल करने में श्रम कानून में सुधारों का क्रियान्वयन और प्रशासनिक दक्षता की स्थिति की भी अहम भूमिका है।

इसलिए यह संभव है कि एक अंतराल के बाद आने वाले वर्षों में इन तीन राज्यों में निवेश के प्रवाह की स्थिति में सुधार आए और खासकर जब सुधारों को लागू करने वाली राज्य की मशीनरी ज्यादा कारगर बने। राजस्थान और मध्य प्रदेश की तुलना में महाराष्टï्र बेहतर प्रदर्शन कर सकता है क्योंकि उसके पास बेहतर बुनियादी ढांचा और दक्ष मानव संसाधनों की उपलब्धता है।

यह देखना भी अहम है कि कुछ राज्य श्रम कानून सुधारों को आगे बढ़ा रहे हैं जबकि केंद्र सरकार ने थोड़ा अलग रास्ता अख्तियार किया है। मई 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के कुछ ही दिन बाद चार श्रम कानून बनाने की योजना बनाई गई थी। ये औद्योगिक संबंध, वेतन, सामाजिक सुरक्षा और औद्योगिक कल्याण से संबंधित थे। इन कानूनों में मौजूदा सभी 46 श्रम कानूनों को समाहित किया जाना था। लेकिन यह प्रस्ताव ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया है। साथ ही 500 से कम कर्मचारियों वाली कंपनियों में सरकारी मंजूरी के बिना छंटनी की अनुमति देने वाला प्रस्ताव भी फिलहाल ठंडे बस्ते में है। 

मोदी सरकार ने कानून में बदलाव के लिए संसद का लंबा घुमावदार रास्ता अपनाने के बजाय कामगारों के लिए नियामकीय ढांचे में ज्यादा बुनियादी बदलाव किया है। अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में तय अवधि के लिए रोजगार के बारे में मसौदा अधिसूचना पहले ही जारी की जा चुकी है और अगर कोई आपत्ति नहीं आई तो 8 फरवरी को इसे अधिसूचित किया जा सकता है।

ऐसे तय अवधि के रोजगार की पेशकश की जा सकती है, बशर्ते इस तरह के कामगारों को स्थायी कर्मचारियों के समान वेतन और दूसरे अधिकार मिलें। यह सही है कि तय अवधि के कामगारों का शोषण होने की गुंजाइश सीमित है, फिर भी केंद्र ने इस बदलाव के जरिये कामगारों को निकालने का रास्ता साफ किया है। यह सबकुछ कानून में बदलाव के बिना किया गया। सरकार अब अनुबंध रोजगार के नियमों के संशोधन की तैयारी कर रही है जिससे संविदा पर काम करने वाले कामगारों को किसी कंपनी में मुख्य काम करने की अनुमति मिल जाएगी। इससे भी देश के श्रम बाजार में लचीलापन आएगा। 

इन कदमों से दो चिंताएं भी सामने आई हैं। पहली यह कि श्रम कानून में सुधारों के लिए राज्यों और केंद्र का रास्ता अलग-अलग है जिससे शायद अर्थव्यवस्था में अधिकतम परिणाम हासिल नहीं किए जा सकते हैं। दूसरी चिंता यह है कि श्रम बाजार को संचालित करने वाले नियमों में बदलाव के लिए संसद को नजरअंदाज करने की कोशिश स्थायी रणनीति नहीं है। लंबी अवधि में इसके विपरीत परिणाम हो सकते हैं।

केंद्र और राज्यों के लिए बेहतर यही होगा कि वे मिलबैठकर श्रम कानूनों के लिए जरूरी सुधारों पर सहमति बनाएं। इसमें वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का मॉडल अपनाया जा सकता है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीके अपनाने के बजाय एक सहयोगात्मक दृष्टिïकोण से श्रम कानूनों में सुधार के लिए बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं जिन्हें पूरे देश में लागू किया जा सकता है। इससे सरकारों को मजदूर संगठनों को मनाने में भी मदद मिल सकती है और वे उन्हें इन सुधारों के फायदे गिना सकते हैं।
 
Keyword: श्रम सुधार, कानून, नियोक्ता, केंद्र, राज्य सरकार,
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