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बहुप्रतीक्षित सहजता

संपादकीय /  01 21, 2018

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत के छह महीने बाद भी उसकी दरों और उससे जुड़े नियमों में बदलाव का क्रम जारी है। कई मामलों में ये बदलाव बेहतरी लिए हुए हैं जिन्हें जनता से मिली प्रतिक्रियाओं के बाद लागू किया गया है। उदाहरण के लिए यद्यपि इस कर की संचालन संस्था यानी जीएसटी परिषद सप्ताहांत पर अपनी बैठक में कर फाइलिंग की प्रक्रिया को सहज बनाने पर सहमत नहीं हो सकी लेकिन यह स्पष्ट हो गया कि इसे सामान्य बनाने की बात एजेंडे में शामिल है और आने वाले दिनों में न केवल इस पर सहमति बन सकती है बल्कि इसे लागू भी किया जाएगा।

प्रस्ताव दरअसल यह है कि जीएसटी कर फाइलिंग के दौरान आवश्यक प्रस्तुतियों को दो तक सीमित किया जाए, एक रिटर्न और दूसरा आपूर्तिकर्ता का इनवॉयस। यह एक बेहतर कदम होगा और इसकी मदद से जीएसटी को छोटे कारोबारियों के और अधिक अनुकूल बनाया जा सकेगा। जीएसटी परिषद भुगतान की प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रयास कर रही है जो काबिलेतारीफ है। परिषद को आगे भी यह प्रयास जारी रखना चाहिए कि कैसे आसान कर भुगतान के साथ कर अनुपालन को बढिय़ा से बढिय़ा किया जा सके।

बहरहाल अनुपालन को सहज बनाने से जुड़े सवालों के जवाब मिलने में छह माह का समय लग गया जो कतई उचित नहीं है। जीएसटी के नीतिगत एजेंडे में कागजी कार्रवाई करने में भी समय लग रहा है। यह भी इस बात का संकेत है कि सुविचारित अवधारणा पर आधारित यह कर प्रणाली जरूरी क्षमताओं और विचार प्रक्रिया के साथ लागू नहीं की गई। क्रियान्वयन को लेकर कई मुद्दे समय-समय पर अलग-अलग धड़ों से उठते रहे हैं। इनमें एक अहम मसला रिटर्न फाइल करने में कठिनाई का है। परिषद अब इस समस्या को हल करने का प्रयास कर रही है। अन्य कई दिक्कतें बरकरार हैं। उदाहरण के लिए एक आशंका यह भी है कि सरकार एकीकृत जीएसटी के रिफंड दिलाने के मामले में पूरी साफगोई से काम नहीं कर रही है। 

एक चिंता यह भी है कि इस देरी के चलते सरकार को अपने व्यय के आंकड़े ठीक करने और अपनी नकदी की स्थिति बेहतर दिखाने में मदद मिलेगी। आशा करनी चाहिए कि यह आधारहीन हो क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो यह बहुत ही अस्थायित्व वाली बात होगी। जीएसटी की अवधारणा ही कर के आसान भुगतान और रिफंड पर आधारित है। अगर इन दोनों ही लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकता तो फिर इस कर की क्षमताओं पर असर पड़ेगा। जीएसटी पर बीते कई वर्षों से काम चल रहा है। ऐसे में इसकी शुरुआत के वक्त इसका डिजाइन परिपूर्ण होना चाहिए था। इससे बदलाव की प्रक्रिया बहुत सहज होती। अभी भी इसमें काफी कुछ किया जाना है। पेट्रोलियम उत्पादों और अचल संपत्ति क्षेत्र को जीएसटी के दायरे में कैसे लाया जाए इस पर भी चर्चा चल रही है। 

हालांकि इन दोनों को बहुत पहले इस दायरे में ला दिया जाना चाहिए था। इतना ही नहीं इस क्षेत्र में और अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता की आवश्यकता है। राज्य सरकारें इस बात को लेकर भ्रमित हैं कि आखिर क्यों महीने के अंत में उनकी प्राप्तियों में कमी आ रही है। इस बीच निर्यातकों की शिकायत है कि उनके रिफंड समय पर नहीं मिल रहे हैं। जीएसटी परिषद अगर किसी समस्या के बारे में कहती है कि इस विषय में विस्तार से बात नहीं हो सकती है तो इसका मतलब यह है कि उस समस्या का कोई हल नहीं सूझ रहा है। ऐसे में कर फाइलिंग को सहज बनाने के हालिया कदम को अलग-थलग कदम होने के बजाय इस प्रक्रिया को सहज और जवाबदेह बनाने के लंबे एजेंडे का हिस्सा होना चाहिए।
 
Keyword: GST, rules, changes, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,
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