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ठंडा पड़ रहा सूती धागा-कपड़ा निर्यात

विनय उमरजी / अहमदाबाद January 19, 2018

पिछले दो महीनों के दौरान भारत में कपास के दामों में हुई 11 प्रतिशत की तीव्र वृद्धि ने मिलों के इस कच्चे माल के दामों में इजाफा कर दिया है, जिससे इनका निर्यात न केवल मुश्किल बल्कि प्रतिस्पर्धा से भी बाहर हो गया है। कपास के अंतरराष्ट्रीय दामों में भी 17 प्रतिशत का इजाफा हो चुका है, लेकिन भारतीय रुपये में 2.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने कपास के वैश्विक दामों से मिलने वाले सारे लाभ को बेअसर कर दिया है। दिसंबर 2017 के दौरान सूती धागे और सूती कपड़े के निर्यात में पिछले साल के मुकाबले डॉलर के रूप में मात्र 0.38 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि मानव निर्मित धागे और कपड़े में 6.77 प्रतिशत  का इजाफा हुआ।

 
दिसंबर 2017 के कुछ प्रमुख जिंस निर्यात के लिए केंद्र सरकार के फौरी तौर पर जताए गए अनुमानों के अनुसार सूती धागे, सूती कपड़े और हथकरघा उत्पाद आदि का निर्यात 0.38 प्रतिशत बढ़कर 93.857 करोड़ डॉलर हो गया, जबकि दिसंबर 2016 में यह 93.505 करोड़ डॉलर था। दूसरी ओर मानव निर्मित धागे और मानव निर्मित कपड़े आदि के निर्यात में दिसंबर 2017 के दौरान 6.77 प्रतिशत की अच्छी बढ़ोतरी नजर आई और यह बढ़कर 41.691 करोड़ डॉलर रहा जबकि पिछले साल इस महीने में यह 39.047 करोड़ डॉलर था।
 
कपास की ओटाई, कताई और कपड़ा मिलों के अनुसार, इस जिंस के दामों में इजाफे का यह रुख अन्य वजहों के साथ-साथ प्रमुख रूप से निर्यात प्रोत्साहन की कमी के कारण रहा है। फिलहाल इसके दाम 42,000 रुपये प्रति कैंडी (356 किलोग्राम) पर चल रहे हैं। क्विंटल के रूप में भी कपास के दाम 11 प्रतिशत तक बढ़कर 11,670 रुपये पर पहुंच गए है, जबकि नवंबर 2017 में ये 10,517 रुपये थे। सूर्यलक्ष्मी कॉटन मिल्स लि. के प्रबंध निदेशक पारितोष अग्रवाल ने कहा कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद निर्यात के कई महत्त्वपूर्ण प्रोत्साहन उपलब्ध नहीं हैं। इससे कपास उत्पादों की मूल्य शृंखला की मांग में सुस्ती आई है और निर्यात के साथ-साथ घरेलू बाजार दोनों में ही बहुत कम वृद्धि हुई है। 
 
हाल में कपास के दामों में बढ़ोतरी ने बांग्लादेश जैसे निर्यातक देशों के मुकाबले भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धा से बाहर करते हुए कपास उत्पादों के निर्यात को अधिक मुश्किल कर दिया है। अग्रवाल ने कहा कि मुक्त व्यापार के आधार पर निर्यात में बांग्लादेश के सक्षम होने से भारत के कपास निर्यात की प्रतिस्पर्धा और कठिन हो गई है। इस वजह से जीएसटी के बाद सरकार की ओर से प्रोत्साहन न मिलने औ्र ऊपर से कीमत वृद्धि ने निर्यात में इजाफे को मुश्किल कर दिया है। बालकृष्ण ओटाई ऐंड प्रेसिंग फैक्ट्री के अरविंद रायचूरा के अनुसार कम क्षमता उपयोग की वजह से भी दिसंबर में घरेलू बिक्री और निर्यात मंद रहा। त्योहारी माहौल दिसंबर के आखिरी भाग में होने की वजह से ऐसा हुआ है, तब क्षमता उपयोग गिर गया। निर्यात मांग ठंडी पडऩे से कपड़ा विनिर्माता कंपनियों ने  कताई और जिनिंग मिलों से मांग  कम कर दी।
Keyword: textiles, कपड़ा एवं परिधान नीति,
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