बिजनेस स्टैंडर्ड - पेंटागन पेपर्स की तर्ज पर कलाम-कॉलेजियम पेपर्स
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पेंटागन पेपर्स की तर्ज पर कलाम-कॉलेजियम पेपर्स

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  January 19, 2018

राजनीति के अलावा इस सप्ताह 'द पोस्ट' नामक फिल्म की भी चर्चा है। यह फिल्म द वॉशिंगटन पोस्ट और उसके महान संपादक-प्रकाशक (जैसा कि अमेरिकी समाचार पत्र के मालिक को पुकारते हैं) बेंजामिन ब्रैडली और कैथरीन ग्राहम के बारे में है कि कैसे उन्होंने इतिहास रच दिया और साहसी पत्रकारिता के नए मानक स्थापित किए। यह कहानी इससे पहले भी कई बार कही जा चुकी है। ग्राहम और ब्रैडली दोनों ने बेहतरीन आत्मकथाएं लिखी हैं। ऑल द प्रेसिडेंट्स मेन नामक फिल्म भी बन चुकी है। आप इन्हें कितना भी पढ़ें या देखें, आपका जी नहीं भरेगा। वाटरगेट और पेंटागन पेपर्स दुनिया भर में साहसी पत्रकारिता के मानक हैं। कई पीढिय़ों से पत्रकार उनसे प्रेरणा लेते आए हैं। 

 
काफी वक्त बीत चुका है और अब मैं विस्तार से बात कर सकता हूं कि कैसे पेंटागन पेपर्स ने हमें सन 2006 के जाड़ों में द इंडियन एक्सप्रेस में कुछ विशिष्टï करने के लिए प्रेरित किया। यह वह घटना है जो उन दिनों द इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू के साथ घटी। ये दोनों ही समाचार पत्र किसी भी तरह सीधे प्रतिद्वंद्वी नहीं थे लेकिन नए विचारों और दर्शन के मामले में उनमें तगड़ी प्रतिस्पर्धा थी। खसतौर पर आर्थिक और सामरिक नीतियों को लेकर।  द पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स की परिस्थिति से तुलना करना कुछ ज्यादा होगा इसलिए हम वैसा नहीं करेंगे। हम केवल यह कहेंगे कि दोनों समाचार पत्रों का दर्शन, विचारधारा और उनका संपादकीय नजरिया एक दूसरे से काफी अलग था। जबकि द पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स दोनों अमेरिका के समान रूप से उदार बाजार में पनपे थे। एन राम के संपादन में द हिंदू आर्थिक और सामरिक मसलों पर वाम झुकाव रखता था जबकि हम दक्षिण की ओर। हालांकि सामाजिक रूप से दोनों ही उदार थे। 
 
आज अति सरलीकृत बहस के दौर में तत्कालीन वाम उदारता वाला द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस में हम, दोनों ही एक उदार यूटोपिया की तलाश में हैं। एक उदार समाज, उदार अर्थव्यवस्था। परंतु विदेश नीति और सामरिक नीतियों से जुड़े पुराने शीतयुद्घ को तोडऩे के प्रति भी काफी अधैर्य से भरे हुए। आगे हम जो बात करने वाले हैं उसे समझने के लिए यह आवश्यक है। बल्कि यह उसे और अधिक नाटकीय बनाता है। इस घटना में सर्वोच्च न्यायालय का कॉलेजियम भी शामिल था जिसकी पिछले दिनों खूब चर्चा हुई। 
 
नवंबर 2006 के आसपास द इंडियन एक्सप्रेस की खोजी पत्रकार रितु सरीन जो पूरे देश में अपनी पत्रकारिता के लिए ख्यात थीं, उन्होंने पहले पन्ने पर दो छोटी खबरें लिखीं। ये खबरें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की आपत्ति से जुड़ी थीं। कलाम ने दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश विजेंदर जैन को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाने पर आपत्ति दर्ज की थी क्योंकि कॉलेजियम के कुछ सदस्यों का उनके प्रति पूर्वग्रह था। हर बार तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनसे कहा कि वह देश के प्रधान न्यायाधीश वाई के सभरवाल से मशविरा करें। सभरवाल इस नियुक्ति को मंजूरी देने के पक्ष में थे। कलाम भी अपनी बात पर टिके रहे। उन्होंने तीसरी बार फाइल लौटा दी। इसके बाद उन्होंने ऐसा किया जो किसी और राष्ट्रपति ने नहीं किया था और मुझे लगता है बाद में भी नहीं किया। उन्होंने अपनी आपत्तियां दो पैराग्राफ में लिखीं। उन्होंने मशविरे की प्रक्रिया में कहा था कि तीन वरिष्ठï न्यायाधीशों ने नियुक्ति पर सवाल उठाए थे। इतना ही नहीं कॉलेजियम में एक न्यायाधीश और बढ़ा दिया गया था जो इसके खिलाफ था। 
 
रितु जब न्यूज रूम में आईं तो उनके चेहरे पर ही लिखा था कि उनके पास बड़ी खबर है। कलाम के नोट की एक प्रति उनके पास थी। हमने इस खबर पर काम करना शुरू किया। तमाम संबंधित कार्यालयों से सवाल-जवाब किए गए। जब हम खबर छापने के लिए तैयार थे तभी कुछ घटित हुआ। दिल्ली के लोगों को याद होगा कि उस साल पूरी दिल्ली में बहुत बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण तोड़े गए थे या जब्त किए गए थे। यह फैसला न्यायमूर्ति जैन की अध्यक्षता वाले पीठ द्वारा बनाई गई एक अधिकारप्राप्त समिति ने लिया था। हमारे कार्यालय दिल्ली के दक्षिणी सिरे पर कुतुब इंस्टीट्यूशन एरिया में दो इमारतों में थे। यह जमीन संस्थागत उद्देश्यों से बहुत सस्ती दरों पर आवंटित की गई थी लेकिन कई लोगों ने इन्हें बेच दिया था, जरूरत से ज्यादा निर्माण कर लिया था या अनुमति से ज्यादा जगह किराये पर दे दी थी। समिति के लोग 18 नवंबर की दोपहर आए। उन्होंने उन सात इमारतों को सील कर दिया जिनका मालिकाना बदला गया था। हमारी इमारतें शामिल की गईं और हम अचानक बेघर हो गए। 
 
बुरी बात यह थी कि हम अब कलाम के नोट वाली खबर भी नहीं छाप सकते थे। भला एक अखबार उस न्यायाधीश के खिलाफ खबर कैसे छाप सकता था जिसके आदेश ने उसे बेघर कर दिया हो? हमने देश के तमाम वरिष्ठï वकीलों से मशविरा किया। सबने यही सलाह दी कि हम खबर नहीं छाप सकते। यह बदला माना जाएगा और शायद इसे अवमानना भी मान लिया जाए। हम अब लगभग सड़क से काम कर रहे थे, हमारे पास एक खबर थी जिसे हम छाप नहीं सकते थे। मैंने युवा साथी पत्रकारों को तोहफे में देने के लिए बेंजामिन बै्रडली की किताब अ गुड लाइफ की ढेर सारी प्रतियां रखी थीं। मैं उनमें से एक किताब यूं ही बेख्याली में पलट रहा था कि तभी मैं पेंटागन पेपर्स के जिक्र पर रुक गया। मुझे और मेरे साथियों को लगा कि हमारे पास अब एक विकल्प है। भले ही हमारे न्यूज रूम से नहीं लेकिन खबर छप सकती थी। 
 
मैंने चेन्नई में एन राम को फोन किया और दुआ सलाम के बाद उनसे पूछा कि क्या उन्हें याद है कि जब एक न्यायाधीश ने द न्यूयॉर्क टाइम्स को पेंटागन पेपर्स मामले में नील शीहान की खबरें छापने से रोक दिया था तो क्या हुआ था? उन्होंने जवाब दिया, 'हां, वे कागजात द वॉशिंगटन पोस्ट को दे दिए गए थे और उसने उन्हें छापा क्योंकि उसके खिलाफ कोई निषेधाज्ञा नहीं थी।' मैंने उन्हें हालात के बारे में बताया और यह तय हुआ कि खबरें जरूर छपेंगी, भले ही हममें कितनी भी असहमतियां हों। 
 
राम ने कहा कि वह मणिशंकर अय्यर की बेटी यामिनी के विवाह भोज में शामिल होने दिल्ली आ रहे हैं और वहां हम इस पर बात कर सकते हैं। हम वहां मिले। मैंने अपनी जैकेट से कागजात निकाले और उन्हें दे दिए। पत्रकारिता की गलाकाट प्रतिस्पर्धा वाली दुनिया में यह विश्वासघात से कम न था लेकिन किसी खबर के मर जाने से अच्छा था कि उसे छपने के लिए किसी प्रतिस्पर्धी को ही दे दिया जाए।  अगली सुबह वह खबर द हिंदू में पहले पन्ने पर फ्लायर के रूप में छपी। उसके संवाददाताओं ने उस पर और काम किया था। खबर में कॉलेजियम के एक न्यायाधीश ने भी नाम न जाहिर करते हुए अपनी बात रखी। प्रधान न्यायाधीश फिर भी न्यायमूर्ति जैन की नियुक्ति पर अड़े रहे। यह उनका और कलाम के बीच का मामला था। हम उस नियुक्ति को रोकना नहीं चाहते थे। हमें यह भी नहीं पता कि क्या द हिंदू की उस खबर ने बाद में सर्वोच्च न्यायालय के लिए कॉलेजियम के चयन पर कुछ असर डाला? हम केवल यह चाहते थे कि एक सच्ची और तथ्यात्मक खबर छपे। उसका छपना द हिंदू और एन राम की उदारता का परिचायक है। उसकी प्रेरणा पेंटागन पेपर्स से मिली। 
 
संवाददाता की किस्मत: दैनिक जागरण पहला भारतीय मीडिया समूह था जो एफडीआई लाया। उसका पहला निवेशक बना आयरलैंड का अखबार इंडिपेंडेंट। सन 2007 के आरंभ में उसने दिल्ली में अपने निदेेशक मंडल का परिचय कराते हुए एक पार्टी रखी। वहां मुझे दो जाने-पहचाने चेहरे दिखे। उनमें से एक थे अभिनेता सीन कॉनरी जो इंडिपेंडेंट के बोर्ड में थे। दूसरे सज्जन काफी बुजुर्ग थे। मैं उनके पास गया और कहा कि वह बेंजामिन ब्रैडली की तरह दिखते हैं। उन्होंने कहा, 'मैं बै्रडली ही हूं नौजवान!' वह भी बोर्ड के सदस्य थे। मैंने उन्हें एक्सप्रेस और हिंदू का किस्सा सुनाया और बताया कि कैसे यह उनसे प्रेरित था। मैंने उन्हें अगली सुबह एनडीटीवी के कार्यक्रम 'वॉक द टॉक' पर साक्षात्कार के लिए राजी कर लिया। वह बातचीत भले ही टीआरपी बटोरू न हो लेकिन वह देखे जाने लायक है।
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