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संविधान पर कायम रहे हमारा भरोसा

श्याम सरन /  January 18, 2018

विभिन्न राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे मामूली बहसों और अल्पकालिक लाभ के बजाय राष्टï्र निर्माण करने वालों की दूरदृष्टिï पर यकीन करें। विस्तार से बता रहे हैं श्याम सरन

 
हाल ही में एक केंद्रीय मंत्री ने कहा कि उनकी पार्टी संविधान में बदलाव लाने को प्रतिबद्घ है। उनकी इस बात ने व्यापक चिंता पैदा की। यह बात आश्वस्त करने वाली है कि संविधान की सर्वोच्चता कायम रखते हुए इन टिप्पणियों को वापस ले लिया गया। चाहे जो भी हो लेकिन बीते कई सालों में देश का राजनीतिक और सामाजिक रुझान संविधान की मूलभूत भावना को धुंधला करने का रहा है, फिर चाहे सरकार कोई भी हो।   भारतीय संविधान एक अहम दस्तावेज है। न केवल इसलिए क्योंकि यह भारतीय राज्य का ढांचा, उसके संस्थान और उसकी शासन प्रक्रिया को तय करता है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि यह देश के भविष्य की दृष्टिï भी सामने रखता है। हमारे पुरखों ने संविधान के तत्त्वों में यही समाहित करने का प्रयास किया था। 
 
संविधान सभा के सदस्यों के बीच जो जबरदस्त बहस चली थी उसे आज भी पढऩा रोचक है। उसमें हमें देश की विविधता और बहुलता देखने को मिलती है। इसके साथ ही हमें इस बात पर भी एक व्यापक सहमति नजर आती है कि हमें कैसा भारत चाहिए।  निश्चित तौर पर इस बात पर सहमति थी कि राजनीतिक, सामाजिक अथवा आर्थिक दृष्टिï से भारत के लिए अलग-अलग व्यवस्था की आवश्यकता थी ताकि समाज के उन धड़ों को आगे बढ़ाया जा सके जो सदियों से पीडि़त और वंचित थे। हमारे देश की विविधता के चलते ही गहरे सामाजिक और सांस्कृतिक सुधारों की आवश्यकता थी जब तक कि शिक्षा आदि के जरिये जरूरी बदलाव आ सकें। बहरहाल, इस बात पर गहन सहमति थी कि विविधता को दबाने की नहीं बल्कि उसके समावेशन की मदद से एक जागरूक समाज स्थापित किया जाना चाहिए। ऐसा समाज जो व्यक्तिगत अधिकारों और दायित्वों पर आधारित हो। 
 
भारतीय संविधान ऐसी नीति सामने रखता है जो नागरिकों पर केंद्रित है और जहां राज्य व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है। समुदाय या समूह आधारित पात्रताओं की व्यवस्था है लेकिन अस्थायी तौर पर ताकि समय बीतने के साथ व्यक्तिगत अधिकारों को फलने-फूलने का अवसर मिले।  इस मोड़ पर संविधान की इस मूल भावना को याद रखना श्रेयस्कर है क्योंकि समुदाय या समूह आधारित अराजक और संकीर्ण पात्रताओं का दौर देखने को मिल रहा है। अगर यह स्थायी विशेषता बन गया तो व्यक्तिगत अधिकारों की सर्वोच्चता का क्या होगा जोकि संविधान की प्रमुख खासियत बना हुआ है। समुदाय आधारित पात्रताओं के बल पर हम राष्टï्रीय एकता कायम नहीं कर सकते। 
 
बतौर एक लोकतांत्रिक देश हमारी समसामयिक चुनौतियों से निपटने में संविधान की मूल भावना इस कदर अहमियत क्यों रखती है? संविधान तैयार करने वालों ने एक ऐसे समाज की परिकल्पना की थी जहां हर नागरिक अपनी पूरी क्षमता विकसित कर सके और जाति, धर्म आदि से परे श्रेष्ठïता हासिल कर सके। यह एक ऐसा समाज होगा जहां अवसरों की समानता होगी, न कि पात्रताओं की और अवसर की यह समानता तभी तैयार हो सकती है जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा सबके लिए हों और भेदभाव नहीं हो। अगर देश इस लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है तभी हम लोगों की रचनात्मक ऊर्जा का फायदा उठा पाएंगे और व्यापक गरीबी, बीमारियों और सामाजिक आर्थिक असमानता को दूर कर पाएंगे। संविधान बहुत आधारभूत ढंग से यह मानता रहा है कि देश की जनता ही सबसे कीमती संसाधन है और एक लोकतंत्र के फलने-फूलने, उसके भविष्य के निर्धारण में मानव संसाधन की अहम भूमिका है।
 
यह समझ बताती है कि संविधान सभा के सदस्य किस कदर बौद्घिक क्षमताओं से लैस थे। संविधान सभा में अत्यंत बौद्घिक लोग थे जिन्होंने देश को आगे ले जाने की राह तय की। परंतु यह ऐसे लोगों का एक विशिष्टï समूह भी था जिन्होंने सभ्यता के मूल्य इसमें डाले। इन्हीं मूल्यों ने दुनिया में भारत को उसकी अलग पहचान दी है। संविधान सभा के रिकॉर्ड को पढऩे पर पता चलता है कि उनकी बहस की गुणवत्ता कितनी उत्कृष्टï थी, उनकी दलीलें कितनी तीक्ष्ण थीं और असहमति को कितनी सहजता से लिया जाता था। परस्पर विरोधी मतों के लिए भी उनके मन में गहरा सम्मान था। 
 
इन बहसों की तासीर में एक किस्म का भरोसा है कि केवल इनकी मदद से ही ये दिग्गज ऐसा संविधान बना सकते थे जो हमारे देश के लिए जरूरी था। कई कठिन और जटिल मुद्दे भी हैं जिनका सामना हमारे देश को आज करना पड़ रहा है। उन मुद्दों से भी हमें वैसी ही शिक्षित और सूचित बहस के माध्यम से निपटना होगा। यह बहस सदन के भीतर भी हो सकती है और बाहर भी।  बहरहाल, ऐसे तमाम मुद्दे हैं जिनका निर्धारण आज विभिन्न जनसमूहों की भावनाओं के आधार पर हो रहा है। इन समूहों के अपने पूर्वग्रह हैं। अगर इसका प्रतिरोध नहीं किया गया तो असहमति और दलीलों की गुंजाइश सीमित होती जाएगी। यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह व्यक्तिगत तौर पर लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करे। परंतु मौजूदा हालात इसकी गवाही नहीं देते। आज राज्य स्वघोषित समुदायों के दबाव का शिकार हो जाता है। यह अपनी जवाबदेही से दूर भागने का मामला है। फिल्मों पर प्रतिबंध या मामूली वजहों से किताबों पर रोक के रूप में हमें इसका उदाहरण देखने को मिलता है। 
 
हम इतिहास को किसी की दृष्टिï से नहीं पढ़ सकते। जबकि आज अधिकांश बहस और असहमति ऐसी ही बातों को लेकर उपजती है। हर किसी को अपना ऐतिहासिक संदर्भ रखने की छूट है लेकिन वह दूसरों को उसे मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। भले ही वह कितनी भी शिद्दत से उसे महसूस क्यों नहीं करता हो। न ही किसी भावना को कानून से ऊपर रखा जा सकता है। इन दिनों ऐसे विरोधाभासी संदर्भों की बाढ़ आई हुई है। हमें प्राय: उनका साक्षी बनना होता है। अगर हम इस खतरनाक रुझान को झेलते रहे तो सवाल यह है कि राष्टï्रीयता की भावना कैसे पनपेगी? 
 
अल्पावधि के चुनावी गुणा भाग राजनेताओं को ऐसी संकीर्णता भरी बातों के लिए प्रोत्साहित करते हैं। कई बार उनको इसका लाभ भी मिलता है। परंतु हमें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। देश में नागरिक समानता हमारे संविधान के मूल सिद्घांतों में से एक है। सभी राजनीतिक दलों में इस बात पर सहमति बननी चाहिए और उन्हें संविधान में उल्लिखित समान नागरिकों वाले जागृत समाज के प्रति प्रतिबद्घता दोहरानी चाहिए। यह भी कहा जाना चाहिए कि वे जाति, समुदाय, भाषा और समुदाय आधारित संकीर्ण पहचान वाली राजनीति से दूर रहेंगे। एक आधुनिक, लोकतांत्रिक और अग्रसोची समाज केवल ऐसी सहमति के आधार पर ही निखरकर सामने आ सकता है जो देश के संविधान निर्माताओं के दूरदर्शी सोच पर आधारित हो। 
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं और फिलहाल सीपीआर के वरिष्ठ फेलो हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूरी तरह निजी हैं। ) 
 
Keyword: constitution, india,,
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