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राजनीतिक असर डालने की भी क्षमता रखते हैं न्यायिक फैसले

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  January 17, 2018

सभी लोकतांत्रिक देशों के संवैधानिक विशेषज्ञों को दो सवाल बहुत परेशान करते हैं। पहला, अदालतें किस हद तक किसी राजनीतिक दल या नेता का भविष्य बना-बिगाड़ सकती हैं और दूसरा, क्या न्यायाधीशों को अत्यधिक महत्त्व वाले राष्ट्रीय मुद्दों पर भी तटस्थ रवैया अपनाना चाहिए? अमेरिका और ब्रिटेन के टिप्पणीकारों ने ऐतिहासिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इनपर गहरी चर्चाएं की हैं। भारतीय संदर्भ में पहले सवाल का जवाब दे पाना आसान लगता है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में आए निचली अदालत के फैसले पर चर्चा अब भी हो रही है। इस मामले की सुनवाई ने 2014 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव डाला था। वैसे अतीत में भी कांग्रेस को अदालती फैसलों के चलते सियासी हार झेलनी पड़ी हैं। जैन हवाला घोटाला मामले में उच्चतम न्यायालय ने बंद दरवाजे के भीतर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के अधिकारियों को तगड़ी लताड़ लगाई थी। उस मामले ने 1996 के आम चुनाव में कांग्रेस की संभावनाओं पर करारी चोट की थी। 2जी घोटाले की ही तरह जैन हवाला मामले के भी आरोपी एक-एक कर बरी होते गए। पहले, बोफोर्स घोटाले ने भी कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन पर करारी चोट की थी। हालांकि वह मामला भी आखिरकार दिल्ली उच्च न्यायालय में आकर दम तोड़ गया लेकिन कांग्रेस के पराभव की वजह तो बन ही गया। दूसरे दल भी अदालती फैसलों के असर से बच नहीं पाए हैं। मंडल आयोग की सिफारिशों पर आए फैसले ने ही राष्ट्रीय मोर्चे के गठन की बुनियाद रखी थी। दल-बदल के कई ऐसे मामले रहे हैं जिनमें अदालतों ने दखल दिया और राज्यों में सरकार बनाने-बिगाडऩे की कोशिशों पर लगाम लगाई।

 
अयोध्या मामले में विचाराधीन 13 अपीलों पर सुनवाई की तारीख करीब आने से आगे चलकर फिर से संदेह के काले बादल मंडराने लगे हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अयोध्या मामले में अपना फैसला वर्ष 2010 में ही सुना दिया था और उसके खिलाफ की गई अपीलों पर सात साल बाद भी फैसला नहीं आ सका है। काफी अनुरोध के बाद उच्चतम न्यायालय इस अपीलों पर अगले महीने से सुनवाई करने के लिए तैयार हुआ है। लेकिन अभी तक इस संवेदनशील मामले की सुनवाई करने वाले पीठ का स्वरूप भी तय नहीं हो सका है। अयोध्या मामले में आने वाले फैसले का भी देश के राजनीतिक परिदृश्य पर गहरा असर पडऩे की संभावना है। खासकर अगले साल आम चुनाव होने से अयोध्या मुद्दे पर आने वाला फैसला काफी महत्त्वपूर्ण होगा।
 
उच्चतम न्यायालय एक और विवादित मसले पर सुनवाई कर रहा है। विशिष्ट पहचान की 'आधार' योजना की वैधता की निजता के अधिकार के संदर्भ में परख की जाएगी। न्यायालय इस दावे का परीक्षण करेगा कि क्या आधार योजना वाकई नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करती है? ऐसी रिपोर्ट आई है कि महज चंद रुपये देकर नागरिकों के आधार कार्ड से जुड़ी जानकारियां आसानी से हासिल की जा सकती हैं। सूचना लीक होने के इस मामले में प्राथमिकी भी दर्ज की गई है। एक अन्य पीठ निजता के अधिकार से ही जुड़े एक और मामले की सुनवाई करने वाला है। इस मामले में सोशल मीडिया पर उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारियां एकत्र करने और उन्हें मार्केटिंग कंपनियों को देने का आरोप लगा है। फेसबुक, व्हाट्सऐप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस मामले में सवालों के घेरे में खड़े किए गए हैं। सार्वजनिक मंचों के बजाय अब सोशल मीडिया के अधिक ताकतवर हो जाने से उच्चतम न्यायालय का जो भी फैसला आएगा, उसका काफी दूरगामी असर पड़ेगा। यह फैसला राजनीतिक दलों को अपने चुनाव अभियान की शैली बदलने के लिए भी मजबूर कर सकता है।
 
शीर्ष अदालत के समक्ष लंबित दो अन्य अहम मसले पूर्वोत्तर राज्यों में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों की समस्या से जुड़े हुए हैं। असम में रहने वाले भारतीय नागरिकों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार किया जा रहा है और उच्चतम न्यायालय ने उसके आंकड़े जारी करने को कहा था। लेकिन पहली सूची का प्रकाशन होने से संदेह और बढ़ गया है। अदालत म्यांमार से आए रोहिंग्या शरणार्थियों के मसले पर भी विचार करने वाली है। दक्षिण भारत के चार राज्यों के निवासियों को कावेरी नदी जल बंटवारे पर आने वाले फैसले का बेसब्री से इंतजार है। संवैधानिक पीठ ने कई महीने पहले इस मामले पर सुनवाई पूरी कर ली थी और अब उसे केवल फैसला सुनाना है। एक और मामला दिल्ली सरकार के कामकाज में उपराज्यपाल के बार-बार दखल देने की शिकायत से जुड़ा हुआ है। इनके अलावा लव जिहाद और पारसी महिलाओं की पुरुषों से समानता के लिए लड़ी जा रही कानूनी जंग जैसे सामाजिक महत्त्व के मामले भी विचाराधीन हैं।
 
ये सभी सवाल काफी राजनीतिक अहमियत रखते हैं और सर्वाधिक शक्तिशाली लोकतांत्रिक संस्था होने के नाते उच्चतम न्यायालय के फैसले की बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी। बदलाव की बयार बहाने में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका संदेह से परे है। यहीं पर हमारे विमर्श का दूसरा मुद्दा खड़ा होता है कि क्या न्यायाधीशों को मुश्किल वक्त में भी तटस्थ बने रहना चाहिए? आपातकाल के समय मूलभूत अधिकारों को लेकर खड़े हुए संवैधानिक विवाद के दौरान न्यायाधीशों पर दबाव के आगे झुकने के आरोप लगाए गए थे। मुख्य न्यायाधीश पी एन भगवती ने एक चि_ïी में कहा था, 'अब यह सर्वविदित है कि न्यायिक विवेक कोई निर्धारित विवेक नहीं है और हरेक न्यायाधीश के नजरिये और सोच में भेद के चलते वह दूसरे न्यायाधीश के विवेक से अलग होता है। किसी न्यायाधीश के सामाजिक दर्शन को निर्धारित करने वाले उसके पूर्वग्रह एवं पूर्वानुराग और उसके विचार जैसे तमाम कारक उसे दूसरे न्यायाधीश से अलग बना देते हैं।' हालांकि ऐसा होना कोई आश्वस्तिकारक भाव नहीं जगाता है।
Keyword: supreme court, justice,,
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