बिजनेस स्टैंडर्ड - बजट की प्राथमिकताएं
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बजट की प्राथमिकताएं

संपादकीय /  January 16, 2018

वर्ष 2018-19 के आम बजट की तैयारी जोरों पर है। इस दौरान सरकार की मुख्य राजनीतिक चिंताएं क्या रहने वाली हैं यह भी स्पष्टï नजर आ रहा है। खासतौर पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह साफ कर दिया है कि कृषि क्षेत्र, जहां बहुत बड़ी तादाद में लोग रोजगारशुदा हैं, उसे प्राथमिकता मिल सकती है। जेटली ने गत सप्ताह जोर देकर कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेज गति से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और इसकी वृद्घि ने विभिन्न क्षेत्रों में लोगों को लाभान्वित किया है। परंतु इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि अधिकतर आबादी कृषि क्षेत्र पर निर्भर है और जब तक लाभ स्पष्टï और प्रत्यक्ष नहीं हों तब तक वृद्घि का क्या लाभ और उसे कैसे उचित ठहराया जाए? 

 
इन बातों के आधार पर यह समझा जा सकता है कि सरकार के राजनीतिक निहितार्थ क्या हो सकते हैं? गुजरात में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में बहुत मामूली जीत से यह संकेत मिलता है कि ग्रामीण इलाकों में बढ़ता असंतोष भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक भाग्य को प्रभावित कर रहा है। वर्ष 2018 में कई महत्त्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और वर्ष 2019 के आम चुनाव भी बहुत दूर नहीं हैं। ऐसे में अगर कृषि क्षेत्र को महत्त्व दिया जाता है तो इसमें चिंतित होने वाली बात नहीं। निश्चित तौर पर जेटली का यह कहना भी सही है कि भारत का विकास वास्तव में ऐसा होना चाहिए कि देश के लाखों लोग जो कृषि पर निर्भर करते हैं उन्हें उचित रूप से आजीविका मिले। 
 
बहरहाल, यह भी अहम है कि ग्रामीण इलाकों को आर्थिक वृद्घि का उचित लाभ सुनिश्चित करने के लिए सही कदम उठाए जाएं। जेटली ने एक समस्या की ओर ध्यान आकृष्टï करते हुए कहा कि कृषि उपज की कम आरंभिक कीमत किसानों और उत्पादकों को प्रभावित कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं अतीत में यह वादा कर चुके हैं कि किसानों की आय दोगुनी की जाएगी। यह बात अहम है कि कृषि क्षेत्र की आय में ऐसी बढ़ोतरी बढ़ती उत्पादकता की वजह से आए न कि सरकारी मदद की वजह से। अतीत में हम देख चुके हैं कि कैसे सरकारी मदद का उलटा असर हुआ। 
 
इसके चलते मुद्रास्फीति की स्थिति बनी और अपनी अलग आर्थिक और राजनीतिक परेशानियां खड़ी हुईं। कृषि ऋण माफी और अन्य तरह की सब्सिडी या फिर सरकार द्वारा प्रत्यक्ष अंतरण के जरिये भी यह काम नहीं होना चाहिए। न ही सरकारी बैंकों के जरिये कृषि क्षेत्र को वृद्घि प्रदान करने का प्रयास होना चाहिए। राजकोषीय और वृद्घि के गणित की बात करें तो फिलहाल हम इस स्थिति में ही नहीं हैं कि ऐसा कोई प्रयोग करें। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की पिछली सरकार ने वर्ष 2008-09 में राजकोषीय घाटे में भारी इजाफा कर दिया था। इसके तुरंत बाद हुए चुनाव में संप्रग को जीत मिली। लेकिन देश की अर्थव्यवस्था और राजनीतिक भविष्य को इसका नुकसान उठाना पड़ा। 
 
आने वाले वर्षों में सरकार को बजट निर्माण तथा अन्य नीतिगत कवायदों में कृषि को लेकर मध्यम और लंबी अवधि की प्राथमिकताएं तय करनी होंगी। कृषि संकट का एकमात्र स्थायी हल ग्रामीण और अद्र्घ शहरी इलाकों में युवाओं को रोजगार दिलाना है। एक तरह से देखें तो उद्योग जगत पर केंद्रित बजट ऐसा बजट है जो कृषि को प्राथमिकता देगा। शहरी क्षेत्र को यह इजाजत होनी चाहिए कि वह पर्याप्त तेजी से बढ़े ताकि रोजगार बढ़े। देश के खेतों में काम कर रहे लोगों को उससे बाहर बेहतर रोजगार देने की आवश्यकता है। इससे ग्रामीण क्षेत्र पर दबाव कम होगा और उत्पादकता के साथ वहां आय और समृद्घि बढ़ेगी। यही इकलौता दीर्घकालिक और स्थायी हल है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बजट इसी दिशा में होगा।
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