बिजनेस स्टैंडर्ड - एकीकृत ऊर्जा नीति
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एकीकृत ऊर्जा नीति

संपादकीय /  January 15, 2018

तीन सालों तक कमजोर तेल कीमतों का जो लाभ भारत को मिला वह अब समाप्त होता दिख रहा है। वर्ष 2014-15 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के कार्यकाल के पहले वर्ष कच्चे तेल के भारतीय बास्केट की कीमत घटकर 84 डॉलर प्रति बैरल रह गई थी। यह कीमत उससे पिछले साल की तुलना में करीब 20 फीसदी कम थी। वर्ष 2015-16 में सालाना गिरावट की दर बढ़कर 45 फीसदी हो गई और भारतीय बास्केट की औसत कीमत 46 डॉलर प्रति बैरल तक लुढ़क गई। उसके अगले वर्ष इसमें मामूली सुधार हुआ और यह 48 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची लेकिन तेल क्षेत्र और सरकार दोनों इससे लाभान्वित होते रहे। 

 
तेल कंपनियों का मुनाफा लगातार बढ़ता गया और जनवरी 2016 तक पेट्रोल और डीजल की कीमतों में मई 2014 की तुलना में 17 से 22 फीसदी की गिरावट आई। केंद्र सरकार का पेट्रोलियम उत्पादों का सब्सिडी बिल भी वर्ष 2013-14 के 85,000 करोड़ रुपये से घटकर वर्ष 2016-17 में 27,000 करोड़ रुपये रह गया। इस अवसर का लाभ उठाते हुए पेट्रोलियम उत्पादों पर कर भी बढ़ाया गया ताकि कच्चे तेल की घटती कीमतों का लाभ लिया जा सके। इन तीन वर्षों में उत्पाद शुल्क संग्रह की समेकित सालाना वृद्धि दर 46 फीसदी रही। इस प्रकार अर्थव्यवस्था राजकोषीय मजबूती की राह पर बढ़ती रही।
 
इस पूरी प्रक्रिया में बदलाव की शुरुआत वर्ष 2017-18 के आरंभ में हुई। चालू वर्ष के शुरुआती नौ महीनों के दौरान कच्चे तेल के भारतीय बास्केट का औसत मूल्य बढ़कर 53.58 डॉलर प्रति बैरल हो गया। नवंबर और दिसंबर महीने में लगातार यह कीमत वर्ष में पहली बार 60 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई। जनवरी 2016 की तुलना में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में भी 18-35 फीसदी की रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई। उस वक्त कच्चे तेल की कीमतें बीते तीन सालों के न्यूनतम स्तर पर थीं। कीमतों में और ज्यादा बढ़ोतरी होती लेकिन सरकार ने गत अक्टूबर में इसमें दखल दिया और पेट्रोल डीजल पर उत्पाद शुल्क को कम किया। इसकी वजह से सालाना 26,000 करोड़ रुपये की राजस्व हानि हुई। कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों के चलते ही सरकार का पेट्रोलियम सब्सिडी बिल भी इस वर्ष नवंबर के अंत तक 13 फीसदी बढ़ गया।
 
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा बढ़े हुए स्तर से गिरावट का कोई संकेत नहीं है। ऐसे में यह वक्त इस बात का है कि सरकार अपना पूरा ध्यान अपनी ऊर्जा नीतियों को नए सिरे से तैयार करने पर केंद्रित करे ताकि मौजूदा हालात के लिहाज से बेहतरीन नीतियां तैयार की जा सकें। अधिकांश संकेतकों पर यकीन करें तो आने वाले कुछ दशकों के दौरान देश की ऊर्जा संबंधी मांग बहुत तेजी से बढ़ेगी। इस अवधि में यह मांग दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में तेज होगी। ऊर्जा आयात पर इसकी निर्भरता में भी इजाफा होगा। आने वाले कुछ वर्षों के दौरान देश के नीति निर्माताओं के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी। तकनीकी विकास और स्थायित्व के मसले और अधिक महत्त्वपूर्ण होकर सामने आएंगे। साथ ही सरकार के समक्ष मौजूद ऊर्जा उत्पादों के मूल्य निर्धारण और राजकोषीय नीति से जुड़े विकल्पों का भी सरकार को समुचित इस्तेमाल करना होगा। ऐसे में आवश्यकता इस बात की होगी कि सरकार एक एकीकृत ऊर्जा नीति तैयार करे ताकि नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र की व्यवहार्यता और उसके मापन तथा स्थायित्व के  लक्ष्य की प्राप्ति की व्यापक चुनौती को हासिल करने की दिशा में बढ़ा जा सके। इसमें कोई देरी बरदाश्त नहीं की जा सकती।
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