बिजनेस स्टैंडर्ड - नोटबंदी से पहले ही घटने लगी थी नकदी की मांग
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, January 19, 2018 02:51 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम अर्थव्यवस्था खबर

नोटबंदी से पहले ही घटने लगी थी नकदी की मांग

अद्वैत राव पलेपू /  January 14, 2018

नोटबंदी की घोषणा किए जाने से पहले ही लोगों की नकदी की मांग हर महीने कम हो रही थी। यह बात दर्शाती है कि या तो लोग मंदी से जूझ रहे थे या फिर वे डिजिटल भुगतान को तवज्जो देते हुए उसकी ओर रुख कर रहे थे। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के एक विश्लेषण के आंकड़े ऐसा बता रहे हैं। 2016 के पहले छह महीनों के दौरान धन आपूर्ति के घटक -'लोगों के पास मुद्रा' (सीडब्ल्यूपी) की गिरावट दर बढ़ गई और इसके बाद इसमें नकारात्मक वृद्धि हुई। यह बात आरबीआई के नकद भुगतान को नियंत्रित करने के इरादे के बजाय मांग को प्रतिबिंबित करती है।

 
नई दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है कि चलन में जो मुद्रा होती है, वह मूल रूप से इस प्रश्न पर निर्भर करती है कि आपकी जरूरत कितनी है और अगर मांग कम हो रही है या लोग खरीदारी कम कर रहे हैं, तो आरबीआई को अतिरिक्त नकदी की आपूर्ति करने की जरूरत नहीं होगी। असंगठित क्षेत्र की नकदी पर अधिक निर्भरता को ध्यान में रखते हुए अर्थशास्त्रियों का कहना है कि आंकड़े दर्शाते हैं कि नोटबंदी की घोषणा किए जाने से भी पहले 2016 में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में मंदी थी। नकदी की मांग में गिरावट मंदी का एक संकेत होता है क्योंकि कुल लेन-देन में खासा योगदान दिखा रहे भुगतान के डिजिटल तरीके हाल ही में शुरू हुए हैं। कुमार कहते हैं कि पिछले 15-16 महीनों में जो हुआ, वह यह है कि मुद्रा की मांग में गिरावट आई है क्योंकि संगठित क्षेत्र में अधिक डिजिटलीकरण है, जबकि असंगठित क्षेत्र में कमी है।
 
8 नवंबर, 2016 की नोटबंदी ने लोगों के पास उपलब्ध मुद्रा को हटाना शुरू कर दिया। इस महीने की शुरुआत में लोगों के पास 17,013.8 अरब रुपये थे जो महीने के आखिर तक घटकर 7,809.5 अरब रुपये रह गए। हालांकि सरकार, आरबीआई और बैंकों ने जोर-शोर से डिजिटल भुगतान के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया, लेकिन नोटबंदी ने लोगों को भुगतान के डिजिटल माध्यम अपनाने को मजबूर कर दिया। बैंकरों के मुताबिक, इस कदम ने डिजिटलीकरण के लिए बैंकों के लगातार तीन साल के अभियान को बचा लिया, लेकिन विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि परिचालन की 86 प्रतिशत मुद्रा को रद्द करना और अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाना क्या इसकी सही कीमत थी।
 
सीडब्ल्यूपी धन आपूर्ति का एक ऐसा घटक होता है जिस पर आरबीआई का सीधा नियंत्रण नहीं होता। इसके स्थान पर यह शीर्ष बैंक खुले-बाजार परिचालन या नकदी आरक्षित अनुपात (सीआरआर) और तरलता आरक्षित अनुपात के समायोजन का उपयोग करता है। उदाहरण के लिए आरबीआई मौजूदा चार प्रतिशत सीआरआर को बढ़ा सकता है और बैंकों की तरलता को कम कर सकता है, जिससे उनके ऋण देने पर नियंत्रण लगता है और इस तरह सीडब्ल्यूपी सीमित होती है। बैंकों की जमा और मांग के साथ-साथ सीडब्ल्यूपी तथा भारतीय रिजर्व बैंक के पास 'अन्य' जमा राशियां मुद्रा आपूर्ति के 'एम3' उपाय को पूरा करती हैं। एम3 मुद्रा आपूर्ति का सबसे व्यापक उपाय होता है और इसमें संस्थागत मनी मार्केट फंड और दूसरी तरल परिसंपित्तयां शामिल हो सकती हैं। आरबीआई के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि एक महीने पहले की तुलना में दिसंबर 2016 में सीडब्ल्यूपी का प्रतिशत परिवर्तन गिरकर (-) 54.1 प्रतिशत पर आ गया और जनवरी में 0.3 प्रतिशत बढ़कर यह 7,829.1 अरब रुपये पर पहुंच गई। इस कम आधार के मद्देनजर फरवरी 2017 में सीडब्ल्यूपी बढ़कर 25.2 प्रतिशत या 8,803 अरब हो गई। इसका अर्थ यह है कि 2016 में जनवरी में लोगों ने नकदी के लिए जो मांग की थी, वह दिसंबर 2016 में गिरकर लगभग आधी रह गई।
 
वर्ष 2017 के दौरान सीडब्ल्यूपी साल भर 6.4 प्रतिशत की औसत से सकारात्मक रूप से बढ़ती रही, लेकिन मासिक दर में गिरावट रही। दिसंबर 2017 में सीडब्ल्यूपी नोटबंदी से पहले के स्तर की तुलना में 94.6 प्रतिशत पर रही। हालांकि, अगर हम सीडब्ल्यूपी की एम3 से तुलना करें तो लोगों की बैंकों में जितनी जमाएं थीं, उस संबंध में लोगों की नकदी की मांग से बेहतर स्थिति का पता चलता है। सीडब्लूपी/एम3 का अनुपात दो सालों के दौरान कमोबेश समान रहा। सीडब्ल्यूपी/एम3 अनुपात जुलाई 2016 में 7.2 प्रतिशत से बढ़कर जनवरी 2017 में 15.4 हो गया और फिर पुनर्मुद्रीकरण से अर्थव्यवस्था में अपेक्षित नकदी आने से गत वर्ष जुलाई में आठ प्रतिशत गिर गया। ऐसा लगता है कि आर्थिक मंदी की वजह से नोटबंदी के बिना ही लोगों की नकदी की मांग कम हो जाती। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, ऐसा लगता है कि भुगतान के डिजिटल रूपों को नोटबंदी से प्रोत्साहन के बावजूद 2017 के दौरान नकदी की मांग 2016 से (सीडब्ल्यूपी/एम3) अधिक थी।
Keyword: demonetization, note, rupee,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या कुछ वस्तुओं पर जीएसटी घटाने से और घट जाएगा राजस्व?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.