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अचानक गिरावट के लिए तैयार रहे बाजार

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  January 14, 2018

जनवरी कई मायनों में महत्त्वपूर्ण महीना है। इस वक्त विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) अपनी व्यापक वैश्विक नीति और अनुमान तैयार करने का काम करते हैं। तीसरी तिमाही के कारोबारी नतीजे भी अभी आने शुरू होते हैं। चूंकि बजट का समय भी 1 फरवरी कर दिया गया है इसलिए तमाम अफवाहें भी सुनने को मिलती हैं।  आम सहमति की बात करें तो एफपीआई वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर आशावादी हैं और उनको देश की आर्थिक वृद्घि दर पर भी पूरा भरोसा है। अधिकांश लोगों को भारतीय शेयर बाजार से ठीकठाक पूंजीगत लाभ की उम्मीद है। माना जा रहा है कि निफ्टी और सेंसेक्स में करीब 10 फीसदी का इजाफा होगा। 

 
आठ या नौ महीनों के आंकड़ों के आधार पर बजट में काफी संतुलन कायम करना होगा। इस बीती अवधि में अर्थव्यवस्था जीएसटी क्रियान्वयन के असर से पार पाने की कोशिश करती नजर आई। अगली कुछ तिमाहियों में इसमें स्थिरता देखने को मिलेगी। अर्थव्यवस्था को कृषि क्षेत्र के संकट से भी गुजरना पड़ा है।  जीएसटी कर संग्रह और ऋण समायोजन सहज ढंग से नहीं हो सका है। इसमें छह माह का और वक्त लग सकता है। हमारे पास अब तक मासिक कर संग्रह की साफ जानकारी नहीं है। ऐसे में राजस्व अनुमान लगाना आसान नहीं है। अब तक राजस्व संग्रह पूरे वर्ष के लक्ष्य का 48 फीसदी है। केंद्रीय व्यय 2017-18 के अनुमान को पार कर गया है। ऐसे में राजकोषीय स्थिति के तनाव में रहना लाजिमी है। राजकोषीय घाटा भी लक्ष्य से परे जाएगा। परंतु कितना यह नहीं पता। अगले वित्त वर्ष में चुनावी बातों का ध्यान रखना होगा। ऐसे में सरकार से सामाजिक व्यय में कटौती की उम्मीद करना बेमानी होगा। निवेशक भी यह जानने में रुचि रखेंगे कि वर्ष 2018-19 में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य क्या रहता है। क्या बजट में कॉर्पोरेट कर दरों में कमी की जाएगी? तमाम आशावादी ऐसे भी हैं जिन्हें  उम्मीद है कि राजकोषीय घाटा बढऩे से वित्त मंत्री इसके विपरीत परामर्श देंगे। वहीं निराशावादियों का कहना है कि लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ पर कर लगाया जा सकता है। वर्ष 2017-18 में जीडीपी के अग्रिम अनुमान कमजोर हो सकते हैं और बाजार को इसका अंदाजा है। आठ महीनों के आधार पर वास्तविक जीडीपी वृद्घि का अनुमान 6.5 फीसदी है। पहली छमाही कमजोर रही है लेकिन अब सुधार के संकेत मिल रहे हैं। 
 
दूसरी छमाही में 7 फीसदी की वृद्घि दर मिल सकती है। दिसंबर में विनिर्माण और सेवा दोनों में जोरदार सुधार देखने को मिला। प्रमुख क्षेत्रों की वृद्धि दर में उल्लेखनीय तेजी आई है। कम आधार प्रभाव की बात करें तो विनिर्माण और सेवा सकारात्मक ढंग से चौंका सकते हैं। इस बात के संकेत भी हैं कि कॉर्पोरेट निवेश में सुधार हो रहा है लेकिन ऐसे भी संकेत हैं कि खपत में कमी आ रही है। कृषि की हालत बहुत खराब है। फसल का रकबा पिछले साल से कम होने के कारण इस वर्ष भी हालात में सुधार नहीं होने वाला। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था नोटबंदी और जीएसटी के असर से पूरी तरह तरह उबरी है या नहीं, यह भी स्पष्ट नहीं है। इसका दबाव उन क्षेत्रों पर पड़ेगा जिनकी मूल्य शृंखला में असंगठित क्षेत्र का योगदान है। कृषि के पिछडऩे पर कृषि ऋण माफी होगी, मनरेगा का बजट बढ़ेगा, न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफा होगा, बिजली नि:शुल्क होगी या उस पर सब्सिडी होगी वगैरह। गुजरात विधानसभा चुनाव ने दिखाया कि ग्रामीण क्षेत्रों की निराशा मतदाताओं को प्रभावित करती है। सत्तारूढ़ भाजपा को गांवों में भारी हार का सामना करना पड़ा। अगर गांवों में नाराजगी बढ़ती है तो राजकोषीय विस्तार करना होगा। परंतु इससे लोगों को पैसा मिलेगा और खपत बढ़ेगी।
 
मुद्रास्फीति भी दिक्कत दे सकती है। अगर रबी की फसल कमजोर रही तो खाद्यान्न कीमतें बढ़ सकती हैं। ईरान में हुए विरोध प्रदर्शन के बाद कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं। ओपेक देशों ने भी उत्पादन कम किया है और इसलिए आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें ज्यादा बनी रहीं। भारत में मुद्रास्फीति नियंत्रण में नजर आ रही है लेकिन चुनाव के पहले सरकारें इसे लेकर खासी संवेदनशील हो जाती हैं।  वैश्विक स्तर पर देखें तो विकसित देशों का प्रदर्शन अच्छा है। अमेरिका सुधार के प्रयास में है। यूरोक्षेत्र पिछले एक दशक के सबसे अच्छे साल में है जबकि जापान दो दशक के सबसे बेहतर समय से गुजर रहा है। ब्रिटेन कमजोर कड़ी बना हुआ है और वहां ब्रेक्सिट से जुड़ा संकट बरकरार है। अमेरिकी डॉलर अन्य मुद्राओं की तुलना में काफी कमजोर हुआ है। हालांकि फेडरल रिजर्व ने नीतिगत दरों को कड़ा करते हुए संकेत दिया है कि वह आगे भी ऐसा करेगा। यूरोपीय केंद्रीय बैंक और बैंक ऑफ जापान से लोगों को यही आशा है कि वे नकदी कम करेंगे और दरों में इजाफा होगा। यूरोपीय केंद्रीय बैंक ने जनवरी से अपनी आर्थिक प्रोत्साहन की व्यवस्था कम की है लेकिन नकदी की कमी अब तक प्रभाव छोडऩे में नाकाम रही है। ईरान के हालात ने कच्चे तेल के बाजार पर असर डाला है। उत्तर कोरिया का मिसाइल परीक्षण भी चिंता का विषय बना हुआ है। उत्तर कोरिया के राष्ट्राध्यक्ष और अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बीच परमाणु बटन को लेकर सार्वजनिक बहसबाजी हुई। हालात ऐसे हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। 
 
वर्ष 2017 इक्विटी निवेशकों के लिए बहुत अच्छा था। हर क्षेत्र में उन्हें अच्छा प्रतिफल मिला। एमएससीआई के विश्व शेयर सूचकांक ने, जो 47 देशों के शेयरों की ट्रैकिंग करता है, इस साल लाभांश समेत 24 फीसदी से अधिक प्रतिफल दिया। जिंसों की बात करें तो औद्योगिक धातुओं मसलन तांबे ने बढिय़ा कारोबार किया। तकनीकी तौर पर देखा जाए तो भारतीय सूचकांकों ने नए साल में अपना उच्चतम स्तर प्राप्त किया और रुझान मजबूत हैं। हर तरह का मूल्यांकन उच्चतम स्तर पर है। ऐसे में समझदार निवेशक वही है जो अचानक गिरावट के लिए तैयार रहे।
Keyword: share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर,,
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