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डेटा में सेंध... आधार की चिंता छोडि़ए, पहले मोबाइल संभालिए

अर्णव दत्ता / नई दिल्ली January 12, 2018

जब भी हम नया स्मार्टफोन खरीदते हैं तो ऐप स्टोर में सबसे पहले फेसबुक और व्हाट्सऐप सर्च कर उसे डाउनलोड और इंस्टॉल करते हैं। कई बार हम अपनी सुविधा के लिए थर्ड पार्टी के भी कई ऐप भी इंस्टॉल करते हैं जो अब हमारी रोजाना जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। हालांकि ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन पेच यह है कि हम शायद ही कभी उनकी परमिशन पॉलिसी पढ़ते हैं। अगर आप फेसबुक जैसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले ऐप की परमिशन पॉलिसी को गौर से पढ़ें तो इससे कई लोग सकते में आ सकते हैं। निर्बाध फेसबुक की सेवाओं का अधिकतम लाभ उठाने के लिए आपको ऐप को हैंडसेट में स्टोर सभी आंकड़ों और जानकारी तक पहुंच की अनुमति देनी पड़ती है। इतना ही नहीं, ऐप मोबाइल के कैमरे और कॉल तक भी पहुंच चाहता है। और आपको बताए बिना यह हर बार इस फीचर को एक्सेस करता है। फेसबुक आपके स्वामित्व वाला ऐप है लेकिन कई थर्ड पार्टी ऐप की भी यही परमिशन पॉलिसी है।
 
एक अरब से अधिक भारतीयों के आधार आंकड़ों को संभालने वाली संस्था भारतीय विशिष्टï पहचान पत्र प्राधिकरण (यूआईडीएआई) से जानकारी लीक होने की खबर से खलबली मची हुई है। इससे ये सवाल भी खड़े हो रहे हैं कि व्यक्तिगत आंकड़े कितने सुरक्षित हैं। लेकिन आपका मोबाइल ही आपकी सारी व्यक्तिगत जानकारी लीक कर सकता है। अगर आपका हैंडसेट हैक हो गया तो आपकी बायोमीट्रिक जानकारी जैसे फिंगर प्रिंट और रेटिना स्कैन से लेकर क्रेडिट कार्ड नंबर और पासवर्ड तक बिक्री के लिए उपलब्ध हो सकते हैं।
 
कुछ साल पहले तक यह इतना बड़ा खतरा नहीं था। तब यह स्थिति थी कि अगर आप किसी को अपना मोबाइल फोन देते थे, तभी वह आपकी जानकारी देख सकता था। लेकिन आईएमएसआई कैचर (इंटरनैशनल मोबाइल सबस्क्राइबर आइडेंटिटी कैचर) की घटती कीमत और कई तरह के मालवेयर ने आम यूजर की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। किसी मोबाइल नेटवर्क का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति की पहचान के लिए आईएमएसआई का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है और अवैध बाजार में इसकी कीमतों में लगातार कमी आ रही है। इससे विश्लेषक और विशेषज्ञ चिंता में हैं। 
 
आईडीसी में वरिष्ठï मार्केट विश्लेषक गुरपाल सिंह के मुताबिक किसी यूजर की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाला उपकरण अब बहुत सस्ता हो गया है, इसलिए खतरा तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, 'मोबाइल फोन में मौजूद किसी भी जानकारी तक दूर बैठे-बैठे पहुंच बनाई जा सकती है। एक बार मालवेयर या फिर कोई एडवांस्ड वायरस आपके सिस्टम में घुस जाता है तो यह आपकी सारी जानकारी को कॉपी करके भेज  सकता है।' ये घटनाएं दुर्लभ नहीं हैं। नॉटर्न मोबाइल सर्वे के मुताबिक भारत में मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वालों में से एक तिहाई यानी 34 फीसदी को मालवेयर या वायरस हमलों का सामना करना पड़ा है। इसी तरह 21 फीसदी मोबाइलधारकों के क्रेडिट कार्ड या बैंक खाते का दुरुपयोग हुआ है। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जिन्हें हैकिंग और व्यक्तिगत जानकारी लीक होने की समस्या झेलनी पड़ी है। हर पांच में से एक मोबाइलधारक (करीब 19 फीसदी) की निजता का उल्लंघन हुआ है।
 
मोबाइल इस्तेमाल करने वालों में से करीब 50 फीसदी ने प्रमोशनल टेक्स्ट या ईमेल भेजने की अनुमति दे रखी है, इसलिए खतरे का स्तर बढ़ता ही जा रहा है। सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आई है कि 47 फीसदी यूजर ने मुफ्त ऐप के बदले अपने संपर्क और मोबाइल डेटा तक पहुंच की छूट दे रखी है। 40 फीसदी ने कैमरा, बुकमार्क और ब्राउजर हिस्ट्री तक पहुंच की अनुमति दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि तस्वीरों, दस्तावेजों और वित्तीय जानकारी के लीक होने की स्थिति में इनकी भरपाई हो सकती है लेकिन अगर बायोमीट्रिक डेटा की सूचना लीक हो गई तो उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। अब अधिकांश स्मार्टफोन में फिंगर प्रिंट स्कैनर और आइरिस स्कैनर जैसे अतिरिक्त फीचर हैं। मोबाइल में स्टोर इस तरह की बायोमीट्रिक जानकारी हैकरों के हाथ लग सकती है। दिक्कत यह है कि अगर यह जानकारी किसी के हाथ लग गई तो इसे पासवर्ड और खातों की जानकारी की तरह बदला नहीं जा सकता है। 
 
क्विक हील टैक्नोलॉजीज के संयुक्त प्रबंध निदेशक और मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी संजय काटकर ने कहा, 'डिजिटल सुरक्षा अब भी कई लोगों के लिए मायने नहीं रखती है। उन्हें वायरस आने से ज्यादा इस बात की चिंता रहती है कि कहीं नए फोन पर स्क्रैच न आ जाए। डेस्कटॉप और लैपटॉप की सुरक्षा का तो लोग ध्यान रखते हैं लेकिन मोबाइल फोन की सुरक्षा को अभी लंबा रास्ता तय करना है। लोगों और कंपनियों को यह समझना चाहिए कि वायरस, मालवेयर और इंटरनेट के खतरे केवल कंप्यूटरों तक ही सीमित नहीं हैं।'
 
मोबाइल हैकरों की नजर अब कंपनियों पर भी है। विशेषज्ञों के मुताबिक कर्मचारियों को कार्यस्थल पर मोबाइल लाने की अनुमति दिए जाने से कंपनियों पर भी खतरा मंडरा रहा है क्योंकि कर्मचारी अपने मोबाइल पर आधिकारिक जानकारी एक्सेस कर रहे हैं। कर्मचारियों के मोबाइल की व्यक्तिगत और आधिकारिक जानकारी तक निर्बाध पहुंच है और उनके वायरस से प्रभावित वेबसाइटों की चपेट में आने का खतरा है। इससे फर्जी और गलत मंशा वाले ऐप ऐसा कहर बरपा सकते हैं। सभी तरह के मोबाइल हैंडसेट इस्तेमाल करने वाले लोग ऐसी हैकिंग का निशाना बन सकते हैं लेकिन ऐंड्रॉयड जैसे ओपन ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलने वाले फोन को ज्यादा खतरा है। 
Keyword: Aadhar, Bank Link, subsidy, data,
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