बिजनेस स्टैंडर्ड - शब्द में बदलाव करने का नहीं कोई महत्व
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शब्द में बदलाव करने का नहीं कोई महत्व

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  January 11, 2018

बीते कई सौ सालों में दुनिया के अधिकांश देश उस द्वंद्व से गुजरते रहे हैं जिसे माक्र्सवादी 'राज्य निर्माण' कहते हैं। यह माक्र्सवादी अध्ययन की एक पूरी शाखा का नाम है। इस मामले में भी भारत की समस्या एकदम उलट रही है। सन 1947 में हमें एक मजबूत राज्य विरासत में मिला था लेकिन तमाम जानी और अनजानी वजहों से हम एक सुसंगत राष्ट्र बनाने में नाकाम रहे।  कांग्रेस ने इसे राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा क्योंकि मोहम्मद अली जिन्ना ने एक धर्म आधारित मुल्क की मांग की थी। भारत की विविधता ने कांग्रेस के रुख में मददगार भूमिका निभाई। ब्रिटिशों की अनपेक्षित विदाई से उपजी शुरुआती दिक्कतों ने भी यही किया। सन 1980 के दशक के अंत तक कश्मीर को छोड़कर राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया कमोबेश पूरी हो चुकी थी। देश के पूर्वोत्तर के इलाके पर भी लगातार यह दबाव बनाया जाता रहा कि वह भारतीय राष्ट्र का हिस्सा बन जाएं। यह दबाव काफी हद तक सिखों पर बनाए गए दबाव के समान ही था जिनमें से कुछ ने एक सिख राष्ट्र (खालिस्तान) की मांग के साथ पूरे 1980 के दशक में अशांति फैलाते रहे। 

 
भारत अब एक संपूर्ण राष्ट्र राज्य बन चुका था। एक ऐसे समय में जबकि अन्य राज्य या तो ढह रहे थे या उन्हें नए सिरे से परिभाषित किया जा रहा था, यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। इस उपलब्धि के सबसे अहम योगदानकर्ताओं में से एक बात यह भी थी कि तमाम भारतीय राजनीतिक दलों ने राष्ट्रीय स्तर पर या राज्य स्तर पर किसी एक धर्म को स्वीकार नहीं किया और भारत के एक राज्य के रूप में विकास में धर्म को एकदम बेमानी रखा गया। इसका यह मतलब नहीं कि कांग्रेस राजनीति में धर्म को नहीं लाई, जाहिर है उसने ऐसा किया लेकिन उसने यह भी सुनिश्चित किया कि धर्म को संविधान के प्राथमिक संस्करण में प्रतीकात्मक से ज्यादा स्थान नहीं मिले। 
 
राष्ट्र और राज्य
 
कुछ हिंदू सामाजिक और राजनीतिक समूह हमेशा से इस रुख को चुनौती देते आए हैं। उनका कहना है कि भारत इकलौती ऐसी जगह है जहां 100 करोड़ हिंदू रहते हैं इसलिए इसे हिंदू राष्ट्र होना चाहिए।  जो बात एकदम जाहिर नजर आ रही हो उस पर जोर देना न केवल अनावश्यक है बल्कि वह कहीं न कहीं गहरी असुरक्षा का भी बोध कराता है। उदाहरण के लिए आरएसएस हिंदुओं का शायद सबसे बड़ा समूह है उसे 'राष्ट्रीय उद्देश्य' की चिंता है। उसे लगता है कि देश में इसका अभाव है। उसका मानना है कि देश को हिंदू राष्ट्र घोषित करने से एक राष्ट्रीय उद्देश्य तैयार होगा। क्या वाकई ऐसा होगा? इस बीच राष्ट्र की बात करें तो इसका अर्थ राज्य नहीं होता। अधिकांश आलोचकों को इन दोनों के बीच का भेद ही नहीं पता। हालांकि अब तक भाजपा या आरएसएस ने हिंदू राज्य शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है। उन्हें इस बात का जवाब देना होगा कि क्या वे इन दोनों को एक ही समझते हैं और इनका इस्तेमाल एक दूसरे के स्थान पर कर रहे हैं? मुझे ऐसा नहीं लगता है। परंतु अगर इस बारे में एक स्पष्टïीकरण दे दिया जाए तो बेहतर होगा। संभव है इनके कुछ लोग अनजाने में ऐसा कर रहे हैं। परंतु अगर ऐसा है तो भी कोई बहुत चिंतित होने की बात नहीं है। 
 
इसकी वजह यह है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 यह सुनिश्चित करता है कि राज्य अपने नागरिकों के बीच धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान आदि किसी के आधार पर भेद नहीं करेगा। यह भेदभाव न होने की पर्याप्त गारंटी मानी जा सकती है। मुझे नहीं लगता कि भाजपा की सरकार या कोई अन्य सरकार अगर संविधान में से धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाकर हिंदू राष्ट्र शब्द लिखवा दे तो भी वह उपरोक्त भावना को नहीं बदल सकती। जाहिर है भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करना एक थोथी कवायद बनकर रह जाएगा। अकेले इसी वजह से भी ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। यह उतना ही निरर्थक होगा जितना कि कांग्रेस द्वारा संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ा जाना। ऐसा करने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि इसकी बदौलत भारत कम या ज्यादा धर्मनिरपेक्ष नहीं हो गया।
 
बारो का शोध
 
इस संदर्भ में मैं चाहूंगा कि आप सब रॉबर्ट बारो का लेखन पढ़ें। उन्हें इस वर्ष अर्थशास्त्र के नोबल का दावेदार माना जा रहा है। उन्होंने राज्यों के धर्मों का विस्तार से अध्ययन किया है। उनके अध्ययन के दायरे में 188 देशों के आंकड़े शामिल हैं। उन्होंने इस संबंध में कुछ रोचक निष्कर्ष दिए हैं। उनका कहना है कि धर्म किसी राज्य की आर्थिक वृद्घि पर कोई असर नहीं डालता है। आर्थिक वृद्घि धर्म को लेकर तो प्रतिक्रिया नहीं देती लेकिन धार्मिकता को लेकर वह सकारात्मक होती है।  वह यह भी कहते हैं कि धर्मिकता का गहन अनुपालन राज्य के धर्म से सकारात्मक ढंग से जुड़ा हुआ है और इस संबंध का काफी हिस्सा राज्य की धार्मिकता को लेकर धार्मिक गहनता से संबंधित होता है, बजाय कि इसके उलट होने के। कहा जा सकता है कि भाजपा और आरएसएस इसी से संचालित हो रहे हैं लेकिन यह स्पष्टï नहीं है कि किस दिशा में। अंत में बारो कहते हैं कि राज्य का धर्म उस वक्त अधिक संभावित होता है जबकि राज्य की आबादी एकेश्वरवादी होती है। हमें यह बात मुस्लिम मतावलंबियों में नजर आती है।  ऐसे में कहा जा सकता है कि एकेश्वरवाद, हिंदुत्व और मुस्लिम, इन तीनों शब्दों से कम से कम भाजपा के भीतर कुछ लोगों के बीच विचार प्रक्रिया आरंभ होनी चाहिए।
Keyword: india, secular, BJP, congress, hindu,,
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