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स्वैच्छिक है आधार का प्रयोग

चिराग मडिया /  01 10, 2018

आधार का जनाधार

वकीलों का कहना है कि आधार को सेवाओं से नहीं जोड़ने पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान नहीं है
कल्याणकारी योजनाओं को आधार से जोड़ने की समयसीमा बढ़ाकर 31 मार्च हुई
कुछ कंपनियां सेवाओं के लिए आधार देने को कर रही हैं बाध्य
बीमा, म्युचुअल फंड, छोटी बचत योजनाएं और बैंक खातों को आधार से जोड़ा जाना है
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण भारत के निवासियों को जारी करता है आधार कार्ड

एक ओर सरकार ने विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार संख्या को जोडऩे की समयसीमा बढ़ाकर 31 मार्च कर दी है, वहीं दूसरी ओर अनेक कंपनियां सेवाओं के लिए आधार कार्ड की जानकारी देने के लिए बाध्य कर रही हैं। पिछले सप्ताह कुछ मीडिया रिपोर्टों में बताया जा रहा था कि सिग्ना टीटीके हेल्थकेयर इंश्योरेंस ने एक पॉलिसीधारक के परिवार को स्पष्ट रूप से कहा कि आधार कार्ड नहीं होने के कारण उनको कैशलैस उपचार की सुविधा नहीं मिलेगी।

सिग्ना टीटीके हेल्थ इंश्योरेंस के मुख्य कार्याधिकारी और प्रबंध निदेशक संदीप पटेल कहते हैं, 'उस व्यक्ति की पत्नी चेन्नई के फोर्टिस अस्पताल में भर्ती थीं। सिग्ना टीटीके हेल्थ इंश्योरेंस ने तुरन्त ही आवेदन की पूर्व-पुष्टि कर दी थी। इस प्रक्रिया के तहत तीन कागजात जमा कराने आवश्यक थे, अस्पताल का बिल, जांच रिपोर्ट और आधार/पैन एवं फॉर्म 60। हमें बताया गया कि मरीज का आधार कार्ड नहीं बना है। हमारे यहां कैशलैस क्लेम को पूरा करने के लिए विभिन्न स्तर हैं और पर्याप्त दस्तावेज मिलने के 10 मिनट के अंदर ही हमने उनका क्लेम स्वीकृत कर दिया था।'

हालांकि, वकीलों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि विभिन्न सेवाओं के लिए आधार जमा करना बाध्यकारी नहीं है। सिटिजन फोरम फॉर सिविल लिबर्टीज (सीएफसीएल) के संयोजक गोपाल कृष्णा कहते हैं, 'हमें यह समझना चाहिए कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में यह नहीं कहा गया है कि आधार का प्रयोग आवश्यक है। न्यायालय 2013 से लगातार यह कहता आ रहा है कि आधार सवैच्छिक है, अनिवार्य नहीं। आधार को आवश्यक रूप से मांगने वाली कंपनियां विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से न्यायालय के आदेश को चकमा देने का प्रयास कर रही हैं।'

इससे पहले, सरकार ने विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार को जोडऩे की समयसीमा बढ़ाकर 31 मार्च 2018 कर दी है। इनमें मुफ्त रसोई गैस (एलपीजी), केरोसीन, उर्वरक सब्सिडी और लाक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) समेत अनेक योजनाएं शामिल हैं। यहां तक कि अनेक वित्तीय उत्पाद, जैसे बीमा, म्युचुअल फंड, छोटी बचत योजनाएं और बैंक खाता जैसी दूसरी श्रेणियों में भी निवेशक अथवा पॉलिसीधारक को अपने निवेश या खाते के साथ आधार को जोडऩा होगा। गौरतलब है कि भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) भारत के निवासियों को आधार कार्ड जारी करता है।

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि आधार संख्या द्वारा जुटाए गए आंकड़ों से कंपनियां अपनी कारोबारी गतिविधियां बढ़ा सकती हैं। एक स्वतंत्र कानूनी शोधकर्ता उषा रामनाथन कहती हैं, 'वर्तमान माहौल में कई कंपनियां आंकड़े एकत्रित करने को एक अवसर के रूप में देख रही हैं और यदि यह एक नया औजार बना तो इसका मतलब होगा, व्यापार और लाभ। कुछ लोगों को लगता है कि आधार संबंधित जानकारी जुटाने का काम खुद सरकार को करना चाहिए था। कई लोगों के लिए यह मात्र रोजाना के ऑर्डर पूरा करने जैसा है। इस सबके बीच एक चीज साफ है कि कानून की जगह सरकार को कंपनियों से जुड़े मामले देखने चाहिए।'

2013 में न्यायालय ने कहा था कि किसी भी व्यक्ति को केवल इस आधार पर किसी सेवा से नहीं रोका जा सकता कि उसके पास आधार कार्ड नहीं है। अगस्त 2015 में अदालत ने आदेश दिया कि विशिष्ट पहचान संख्या (आधार संख्या) का प्रयोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली और रसोई गैस वितरण के अलावा किसी दूसरी जगह नहीं हो सकता और यहां भी इनका प्रयोग स्वैच्छिक होगा। अक्टूबर 2015 में 4 अन्य योजनाओं मनरेगा, सामाजिक सुरक्षा पेंशन, भविष्य निधि (पीएफ) खाता और जन धन योजना के लिए आधार के प्रयोग की अनुमति दे दी।

कार्यकर्ताओं का कहना है कि आधार के लिए सरकार द्वारा बढ़ाया गया दायरा उन लोगों के लिए है जिनके पास आधार कार्ड है और उसे सेवाओं से जोडऩा चाहते हैं। यह उन पर लागू नहीं होता, जिनके पास आधार नहीं है। साथ ही, आधार को नहीं जोडऩे की स्थिति में कानूनी कार्रवाई का भी कोई प्रावधान नहीं है।

अब आधार नहीं, वर्चुअल आईडी से होगा सत्यापन

नागरिकों की गोपनीय जानकारियों की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों के बीच भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) 'वर्चुअल आईडी' की अवधारणा लेकर आया है जिसके जरिये किसी व्यक्ति का आधार क्रमांक साझा किए बगैर ही सत्यापन समेत कई कार्य किए जा सकते हैं। यूआईडीएआई की वेबसाइट पर जाकर कोई भी आधार कार्डधारक अपना वर्चुअल आईडी बना सकता है। यह 12 अंकों वाले आधार क्रमांक की ही तरह 16 अंकों वाली एक संख्या होगी। किसी नागरिक की वर्चुअल आईडी के साथ उसकी बायोमेट्रिक्स भी लेकर कोई भी एजेंसी उसकी पहचान सुनिश्चित कर सकती है। 

प्राधिकरण के अधिकारियों नेे बुधवार को बताया कि कोई भी आधार क्रमांक रखने वाला व्यक्ति अपनी वर्चुअल आईडी बना सकता है और वर्चुअल आईडी बनाने की संख्या को लेकर कोई पाबंदी नहीं है। हालांकि नई आईडी बनते ही पुरानी आईडी अपने-आप निरस्त हो जाएगी। इस व्यवस्था का फायदा यह होगा कि वर्चुअल आईडी एवं बायोमेट्रिक्स के एक साथ इस्तेमाल से मोबाइल कंपनी या किसी अन्य प्राधिकृत एजेंसी को उपभोक्ता का नाम, पता व फोटो हासिल हो जाएगा जो सत्यापन करने के लिए पर्याप्त है। हालांकि यह आधार क्रमांक साझा करने से अलग है।

आधार क्रमांक मिलने से कोई भी एजेंसी उसका बेजा इस्तेमाल कर सकती है जबकि वर्चुअल आईडी का वजूद सीमित तक ही रहेगा। प्राधिकरण की तरफ से जारी परिपत्र के मुताबिक आधार के वर्चुअल आईडी की व्यवस्था 1 मार्च से शुरू हो जाएगी। सत्यापन के लिए आधार का इस्तेमाल करने वाली सभी एजेंसियों के लिए वर्चुअल आईडी को स्वीकार करना 1 जून से अनिवार्य हो जाएगा। इसका पालन नहीं करने वाली एजेंसियों को आर्थिक दंड का भी सामना करना होगा।

प्राधिकरण ने यह कदम आधार से जुड़े आंकड़ों की गोपनीयता बढ़ाने और नागरिकों की निजी जानकारियों को सुरक्षित रखने के मकसद से उठाया है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब लोगों की निजी एवं जनसांख्यिकीय आंकड़े जमा करने और उनके दुरुपयोग को लेकर चिंताएं उठने लगी हैं। इससे विभिन्न एजेंसियों द्वारा आधार संख्या संग्रहीत करने की प्रवृत्ति में भी कमी आएगी। दरअसल सत्यापन करने वाली एजेंसियां कार्डधारक के बदले खुद वर्चुअल आईडी नहीं बना सकेंगी।  एक दूरसंचार कंपनी ने कहा कि प्राधिकरण ने उपभोक्ता के बारे में जरूरी सूचनाओं से संबंधित सीमित जानकारियां देने की भी व्यवस्था शुरू की है। 'सीमित केवाईसी' के तहत किसी प्राधिकृत एजेंसी को आधार कार्डधारक की सीमित जानकारी ही मिल पाती है।
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