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बजट में लुभावनी घोषणाओं से सरकार को होगा सियासी लाभ?

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  January 10, 2018

वर्तमान समय में बहुत लोगों की यह राय है कि केंद्र सरकार की तरफ से वित्त वर्ष 2018-19 के लिए पेश किया जाने वाला बजट लोकलुभावन होगा। इसके पक्ष में यह दलील दी जा रही है कि मोदी सरकार के कार्यकाल का यह अंतिम पूर्ण बजट होगा। लिहाजा वित्त मंत्री अरुण जेटली मतदाताओं को लुभाने के लिए अपने बजट भाषण में कई तोहफों और रियायतों की घोषणा कर सकते हैं। लेकिन इस तरह की धारणाएं बजट निर्माण को प्रभावित करने वाले कारकों को समझ पाने में हमारी अधूरी एवं पुरानी सोच पर आधारित हैं। असल में वर्ष 2019 में होने वाले आम चुनाव की तारीखें और मोदी सरकार के अंतिम पूर्ण बजट की तारीखें एक-दूसरे से इतनी अलग हैं कि जेटली पर अगले महीने लोकलुभावन बजट पेश करने का कोई दबाव नहीं होना चाहिए। इसके बजाय जेटली अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी लगने वाली योजनाएं एवं प्रस्ताव पेश कर सकते हैं, भले ही इनमें से कुछ कदम अलोकप्रिय ही क्यों न हों?

 
अगले आम चुनाव मई 2019 में होने तय हैं और उनकी तारीख को पहले किए जाने की कोई संभावना नहीं है। अर्थव्यवस्था अभी तक नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से हुई उथल-पुथल से पूरी तरह उबर नहीं पाई है। आर्थिक वृद्धि अभी तक रफ्तार नहीं पकड़ पाई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के भाव बढऩे से घरेलू स्तर पर मुद्रास्फीति को बढ़ाने वाले दबाव भी बढ़  सकते हैं। यह भी कह सकते हैं कि लोकसभा चुनाव जितनी देरी से कराए जाते हैं, सरकार के लिए अर्थव्यवस्था की बेहतर तस्वीर पेश करने का उतना ही बेहतर मौका मिल पाएगा।
 
अगर सरकार सियासी फायदे के लिए इस साल पेश होने वाले  बजट में रेवडिय़ां बांटने का फैसला करती है तो इन रियायतों के ऐलान और मतदान के समय में लंबा फासला होने से सरकार को वे सारे राजनीतिक लाभ नहीं मिल पाएंगे जिनके बारे में वह सोच रही होगी। किसी भी मतदाता को मत देते समय यह याद नहीं रहेगा कि सरकार ने 15 महीने पहले उसे क्या रियायतें दी थीं? जीएसटी के क्रियान्वयन ने भी उन अपेक्षाओं को बल दिया है कि सरकार बजट में कुछ रियायतें देकर मतदाताओं का भरोसा हासिल करना चाहेगी। लेकिन अप्रत्यक्ष करों पर फैसला करने की केंद्र सरकार की शक्तियों में अब काफी कटौती हो चुकी है। सीमा शुल्क को छोड़कर बाकी सभी अप्रत्यक्ष करों के बारे में कोई भी फैसला जीएसटी परिषद करती है जिसमें राज्यों के वित्त मंत्री भी शामिल होते हैं। अब जेटली के पास वह विशेष शक्ति नहीं रह गई है कि वह उत्पाद शुल्क एवं सेवा कर की दरों में किसी तरह की रियायत दे सकें।
 
जीएसटी परिषद के फैसले बजट के दायरे से बाहर हैं और केंद्र सरकार अपने राजनीतिक लाभ के लिए अकेले इनका श्रेय नहीं ले सकती है। यहां तक कि प्रत्यक्ष करों की दरें भी काफी हद तक कुछ साल पहले निर्धारित स्तर पर स्थिर हो चुकी हैं और वित्त मंत्री के पास प्रत्यक्ष कर के मामले में बड़े बदलाव करने की गुंजाइश नहीं रह गई है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रक्रियागत राहत देने या छूट का दायरा बढ़ाने जैसी छिटपुट घोषणाएं ही कर सकते हैं। फिर भी वित्त मंत्री अपने बजट भाषण में विभिन्न योजनाओं, परियोजनाओं और नीतियों के संदर्भ में व्यय बढ़ाने की घोषणाएं कर सकते हैं। यह सच है कि कर बदलावों के लिहाज से केंद्रीय बजट की अहमियत लगातार कम होती जा रही है। इसके उलट बजट अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में किए जाने वाले सरकारी व्यय के लिहाज से अधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है। इस तरह वर्ष 2018-19 के बजट में किसानों की हालत सुधारने या वित्तीय क्षेत्र उबारने के लिए लाई जाने वाली योजनाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
 
वास्तव में इस तरह की कवायद केवल बजट तक ही सीमित नहीं रहेगी। बजट के बाद भी सरकार को अर्थव्यवस्था से जुड़े मसलों पर ध्यान देने की जरूरत होगी। बहरहाल वित्त मंत्री को आम चुनाव के पहले अगले साल अपना अंतरिम बजट पेश करते समय इस बात की पूरी आजादी होगी कि वह लुभावनी योजनाओं और कार्यक्रमों का ऐलान कर सकें। चुनाव के ठीक पहले ऐसी लोकलुभावन घोषणाओं का राजनीतिक लाभ उठा पाना कहीं अधिक आसान होगा।  अगर अंतरिम बजट की परंपरा उन्हें राजकोषीय बोझ डालने वाली नई योजनाओं का ऐलान करने से रोकती है तो फिर जेटली एक और तरीका अपना सकते हैं। तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने भी जनवरी 2004 में यही तरीका अपनाया था। उनकी तरह जेटली भी फरवरी 2019 में अंतरिम बजट पेश करने से कुछ दिन पहले ही नई योजनाओं एवं कार्यक्रमों की घोषणा कर सकते हैं। इस तरह जेटली यह सुनिश्चित कर सकेंगे कि उनकी तरफ से घोषित रियायतों का आम चुनाव के दौरान मतदान करने वाले लोगों पर सकारात्मक असर पड़ेगा।
 
अंत में, इन तमाम संभावनाओं एवं आशंकाओं के बीच अगर जेटली फरवरी 2018 में एक लोकलुभावन बजट पेश करते हैं तो इससे दो तरह के हालात पैदा हो सकते हैं। पहला, मोदी सरकार यह उम्मीद कर रही है कि केंद्रीय बजट में घोषित होने वाली योजनाओं का सकारात्मक असर पड़े ताकि कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत आठ राज्यों में होने वाले चुनावों में उसे फायदा मिले। दूसरा, जमीनी स्तर पर राजनीतिक घटनाक्रम का नए सिरे से आकलन करने के बाद आम चुनावों को निर्धारित समय से पहले संपन्न कराने की योजना बनाई जाए।
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