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समीक्षा करे यूआईडीएआई

संपादकीय /  January 09, 2018

गत 4 जनवरी को 'द ट्रिब्यून' समाचार पत्र ने एक खबर छापी कि कैसे अज्ञात विक्रेता व्हाट्स ऐप के जरिये कथित तौर पर महज 500 रुपये में लोगों की आधार संख्या उपलब्ध करा रहे हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया कि नाम, पता, फोन नंबर जैसी लोगों की तमाम निजी जानकारियां भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के पोर्टल के जरिये आसानी से जुटाई जा सकती हैं। यह भी कहा गया कि महज 300 रुपये में इन जानकारियों के प्रिंट आउट बेचे जा रहे हैं। यह चौंकाने वाली खबर थी लेकिन यूआईडीएआई ने इस पर जो प्रतिक्रिया दी वह और भी दुखी करने वाली थी। पहले तो उसने माना कि यह एक भारी उल्लंघन है लेकिन बाद में उसने इससे इनकार कर दिया। इतना ही नहीं उसने समाचार पत्र और संवाददाता के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा दी।

 
प्राथमिकी के मुताबिक द ट्रिब्यून ने एक ऐसी सेवा खरीदी जो अवैध रूप से दी जा रही थी और जिसके चलते देश के 100 करोड़ से अधिक लोगों के आधार नंबर की जानकारी ली जा सकती थी। प्राथमिकी में यह भी लिखा गया है कि कैसे संवाददाता ने कुछ ऐसे लोगों से संपर्क कायम किया जिन्होंने अवैध रूप से आधार की व्यवस्था में सेंध लगाई थी। आरोप लगाया गया कि यह सब एक आपराधिक षड्यंत्र का हिस्सा था। हालांकि स्टिंग आधारित पत्रकारिता को लेकर नैतिकता के कुछ प्रश्न खड़े होते हैं लेकिन द ट्रिब्यून की रिपोर्ट में ऐसे अहम मुद्दे सामने थे जिनका संबंध देश की करोड़ों की आबादी से है। यह पैसे लेकर आधार नंबर और उससे जुड़ी जानकारी देने का मामला था। रिपोर्ट छापने से पहले यूआईडीएआई की प्रतिक्रिया भी ली गई थी और उसमें किसी आधार नंबर की कोई जानकारी नहीं छापी गई थी। ऐसे में यूआईडीएआई की प्रतिक्रिया उसकी हताशा दिखाती है। इससे पता चलता है कि संस्थान सच का सामना करना नहीं चाहता। सबसे अहम बात यह है कि यह प्राथमिकी प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है जबकि यूआईडीएआई का कहना है कि इसे इस दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। यूआईडीएआई को कम से कम प्राथमिकी वापस लेकर एक व्यापक आंतरिक जांच करानी चाहिए और नतीजों को सार्वजनिक करना चाहिए। विभिन्न पत्रकार संगठनों द्वारा प्राथमिकी की निंदा करने के बाद केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ट्वीट किया कि केंद्र सरकार मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है। यह बात काबिलेतारीफ है। हालांकि यूआईडीएआई ने अब तक प्राथमिकी वापस नहीं ली है।
 
अपनी स्थापना के बाद से ही यूआईडीएआई ने बार-बार कहा है कि आधार सुरक्षित है। मौजूदा मामले में भी यूआईडीएआई का यह कहना सही है कि बिना बायोमेट्रिक डाटा के फोन नंबर और पते जैसी जानकारी का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता है। वैसे भी यह जानकारी पहले ही टेलीमार्केटिंग करने वालों तथा अन्य डाटाबेस में उपलब्ध थी। परंतु ऐसे भी लोग हैं जो शुरू से ऐसे दावों को लेकर शंकालु रहे हैं क्योंकि तकनीक बहुत तेजी से बदलती है और हैकिंग की आशंका हमेशा है। इतना ही नहीं हमारे देश में अब तक निजी डाटा संरक्षण की कोई प्रभावी व्यवस्था अब तक नहीं है। कुलमिलाकर यूआईडीएआई ने समाचार पत्र को लेकर जो प्रतिक्रिया दी है वह व्यक्तिगत आंकड़ों और उनके दुरुपयोग की आशंका के प्रति उसकी उपेक्षा को ही दिखाती है। उदाहरण के लिए महज एक वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश से ऐसी खबरें आई थीं कि कैसे पीछा करने वाले अपराधियों ने लड़कियों के मोबाइल नंबर खरीदे थे ताकि वे उनको परेशान कर सकें। यूआईडीएआई के पास एक अरब से अधिक लोगों की नितांत निजी जानकारी है। अधिकांश लोगों ने अपनी अन्य जानकारी मसलन बैंक खाते आदि भी आधार से जोड़ रखे हैं। यह पूरी व्यवस्था आधार में लोगों के विश्वास पर आधारित है। इसे लोगों को निराश नहीं करना चाहिए।
Keyword: UIDAI, aadhar,,
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