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सवाल के घेरे में निजी अस्पताल कैसे हो उनकी प्रतिष्ठा बहाल?

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  January 08, 2018

निजी अस्पतालों के बारे में चर्चा करते वक्त हम अक्सर एक बात की अनदेखी कर देते हैं कि वे भी कारोबार कर रहे हैं और उन्हें भी अपने कारोबार को चलाने और अधिक निवेश जुटाने के लिए उचित मुनाफे की जरूरत है। यह बात समझी जा सकती है। परंतु अगर निवेश की अभिरुचि को देखा जाए तो कहा जा सकता है कि निजी अस्पताल किसी भी तरह अपने निवेशकों को नाखुश नहीं करते। क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक मांग से निपटने के लिए निजी अस्पतालों में बिस्तरों की तादाद में भारी इजाफा किया जा रहा है। 

 
बड़ी कॉर्पोरेट शृंखलाएं भी अपनी क्षमताओं में वर्ष 2018-19 के दौरान 25 फीसदी तक का इजाफा कर रही हैं। इसमें करीब 5,000 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। यह राशि मार्च 2017 तक के तीन साल में किए गए औसत सालाना पूंजीगत व्यय से 50 फीसदी अधिक है।  निजी अस्पताल मैक्स हॉस्पिटल, शालीमार बाग का उदाहरण भी देते हैं और कहते हैं कि मौजूदा व्यवस्था उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करती है। उनकी बात में दम है। दिल्ली सरकार ने समयपूर्व पैदा हुए एक बच्चे को जिंदा रहते हुए भी मृत घोषित करने पर मैक्स अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर दिया था। यह कदम निश्चित रूप से अतिरंजित था। इसमें दो राय नहीं है कि इस अस्पताल के चिकित्सकों और कर्मचारियों को कहीं अधिक पेशेवर व्यवहार करना चाहिए था और उन्हें उनकी गलती के लिए दंडित किया जाना चाहिए लेकिन इसका हल यह नहीं है कि अन्य मरीजों के लिए अस्पताल ही बंद कर दिया जाए। 
 
इस दलील में भी दम है कि ऐसे कदम उठाते समय बहुत आसानी से इस बात की अनदेखी कर दी जाती है कि एक के बाद एक तमाम सरकारें गुणवत्तापूर्ण और सस्ती स्वास्थ्य सुविधा दे पाने में नाकाम रहीं। देश में हर 90,000 लोगों के लिए एक सरकारी अस्पताल है। मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के मिशन से हम अभी काफी दूर हैं।  यह भी सच है कि देश के निजी अस्पतालों की छवि कोई बहुत अच्छी नहीं रही है और उनको लेकर भरोसे की जो कमी देखने को मिल रही है उसके लिए वे खुद काफी हद तक जिम्मेदार हैं। उन पर नियमित रूप से जरूरत से ज्यादा बिलिंग का आरोप लगता रहता है और वे क्षेत्र विशेष पर कब्जे के साथ एकाधिकार की स्थिति निर्मित करते हैं। देश की दो बड़ी निजी अस्पताल शृंखलाओं से जुड़ी घटनाओं पर दृष्टिï डालते हैं। 
 
राष्ट्रीय औषधि मूल्य प्राधिकरण (एनपीपीए) ने पाया कि गुरुग्राम स्थित फोर्टिस अस्पताल ने डेंगू के मरीज को दी जाने वाली दवाओं पर 1700 गुना तक ज्यादा कीमत वसूल की। फोर्टिस ने इसका विरोध किया और कहा कि उसने किसी दवा के अधिकतम खुदरा मूल्य से ज्यादा दाम नहीं लिए, इसलिए किसी भी दृष्टिï से औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश का उल्लंघन नहीं हुआ है। अस्पताल का कहना सही है कि उसने मौजूदा नियमों का पालन किया लेकिन तथ्य यह है कि दवा निर्माण कंपनियां तथा अन्य चिकित्सा उपकरण बनाने वाली कंपनियां अधिकतम खुदरा मूल्य पर भारी रियायत देती हैं। इसके चलते अस्पतालों को भारी लाभ कमाने का अवसर मिलता है। इस कमी को दूर किया जाना चाहिए। एक अन्य उदाहरण पर नजर डालते हैं। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के उपमहानिदेशक की एक जांच में पाया गया कि पटपडग़ंज स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल डिस्पोजेबल सीरिंज की बिक्री में 275 से 525 प्रतिशत तक का लाभ कमा रहा था। आरोप था कि अस्पताल अपनी दुकान से इन्हें खरीदने के लिए मरीजों पर गलत तरीके से दबाव बना रहा था। इस बात का बचाव नहीं हो सकता है कि निजी अस्पताल अपने मरीजों को उत्पादों का पांच गुना तक चुकाने पर मजबूर करते हैं।
 
एनपीपीए ने गत वर्ष व्यापार मार्जिन का जो विश्लेषण पेश किया था उसके मुताबिक नियामक के पास ऐसे आंकड़े हैं जो बताते हैं देश में बिकने वाली हजारों दवाओं के ब्रांड में अधिकतम ख्ुादरा मूल्य पर 30 फीसदी से 800 फीसदी तक का मुनाफा लिया जा रहा है। एनपीपीए ने यह भी कहा कि औसत मार्जिन का स्तर बताता है कि यह बाजार व्यवस्था विफल है और यहां असमानता और अनैतिक व्यवहार देखने को मिल रहा है।  सवाल यह है कि तरीका क्या है? अगर अधिकतम खुदरा मूल्य से जुड़े कानून की भी बात करें तो क्या निजी अस्पताल अपनी मूल्य निर्धारण व्यवस्था मे थोड़ी तार्किकता लाएंगे? मौजूदा व्यवस्था में शुरुआती स्तर पर आत्मनियमन की मदद से कुछ सुधार करना होगा।
 
समस्या एकदम स्पष्टï है क्योंकि शल्य चिकित्सा की प्रक्रिया और उपचार की विधि को लेकर कोई स्पष्टï दिशानिर्देश नहीं हैं। यह आम धारणा है कि निजी अस्पतालों में जरूरत से परे उपचार को प्रोत्साहन दिया जाता है और चिकित्सकों पर इस बात का दबाव होता है कि वे जांच और शल्य चिकित्सा का मशविरा दें। इससे चिकित्सकों को भी कमीशन मिलता है और अस्पताल को भी पैसे कमाने में मदद मिलती है। रक्त की जांच के नतीजों में छेड़छाड़, अनावश्यक सी-सेक्शन और गर्भाशय निकालने और गर्भवती महिलाओं के गर्भपात का जोखिम बताते हुए सर्विकल स्टिच लगाने जैसे मामले इसमें शामिल हैं। बड़े शहरों में ऐसी हर घटना से इतर छोटे कस्बों में ऐसे सैकड़ों अस्पताल हैं जहां चिकित्सकीय अनदेखी और जरूरत से ज्यादा पैसे वसूलने के मामले आए दिन देखने को मिलते हैं। इन मामलों की कभी चर्चा नहीं होती है क्योंकि ये राष्ट्रीय मीडिया की दृष्टिï से दूर होते हैं।  अपनी एक जांच रिपोर्ट में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग कहता है, 'अस्पताल एक कारोबारी की तरह व्यवहार कर रहा था जहां उसने बाजार से सस्ती दर पर सीरिंज खरीदे और अपने मरीजों को गैरवाजिब ढंग से अत्यधिक मुनाफा कमाकर बेच दिया।' निजी अस्पतालों के सामने एक बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वे अपनी लगातार कम होती हुई प्रतिष्ठïा को किसी तरह वापस लाएं।
Keyword: health, hospital, NCR,,
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