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उर्वरक सब्सिडी की मुश्किलें डीबीटी से होंगी दूर!

नीलकंठ मिश्रा /  01 08, 2018

उर्वरक पर दी जाने वाली सब्सिडी सीधे खाते में भेजने से एक साथ कई कमियांं दुरुस्त की जा सकती हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
भारतीय किसान की दुर्गति भारतीय अर्थव्यवस्था की कुछ स्थायी निश्चितताओं में से एक है। ब्याज दरों पर अनुमान और आर्थिक वृद्धि जैसे बाकी मामलों में तो लोगों की राय अलग हो सकती है लेकिन इस पर सभी एकमत हैं।  बॉन्ड प्रतिफल में बनी अस्थिरता की तरह कोहरा भी अब काफी घना हो चुका है। ऐसे समय में बहस का मुद्दा यह है कि केंद्र सरकार कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस चुनौती से निपटने के लिए क्या उपाय करती है? सहमति इस पर बन रही है कि सरकार आने वाले बजट में राजकोषीय व्यय बढ़ाने का तरीका अपना सकती है। आखिर अगले आम चुनावों के पहले यह आखिरी पूर्ण बजट होगा। लेकिन किसी को भी यह साफ नहीं है कि सरकार इस फिजूलखर्ची के लिए कौन सा माध्यम खोजती है?
 
मेरा मानना है कि आम धारणा के उलट न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने से कोई खास फायदा नहीं होगा। एमएसपी के दायरे में न केवल देश के कुल कृषि उत्पादों का एक तिहाई हिस्सा ही आता है बल्कि उन उत्पादों के एक तिहाई की ही सरकारी खरीद हो पाती है। अंतिम उपभोक्ता इन कृषि उत्पादों का जो मूल्य चुकाता है उसका बड़ा हिस्सा किसानों को मिलने की व्यवस्था से ही बात बनेगी। खासकर फलों और सब्जियों के मामले में किसान को अपनी उपज का बहुत कम मूल्य ही मिल पाता है जबकि मुर्गियों और अंडों के मामले में स्थिति बेहतर है। इसके लिए राज्य के स्तर पर बड़े संरचनात्मक सुधार करने की जरूरत है। नई सोच से उपजी फसल मूल्य आश्वासन योजना को मध्य प्रदेश में ठीक-ठाक कामयाबी मिली है लेकिन इसे अन्य राज्यों में लागू करने के लिए वक्त चाहिए होगा। यह भी हो सकता है कि यह योजना दूसरे राज्यों में उतनी असरदार न हो। खुद बदलाव की प्रक्रिया से गुजर रही फसल बीमा योजना केवल फसली नुकसान की ही भरपाई करती है और इसमें कृषि उत्पाद मूल्य की निश्चितता भी नहीं होती है। एक तरीका यह हो सकता है कि सीधे किसानों के बैंक खाते में फंड भेजा जाए लेकिन यह देखने से कहीं ज्यादा जटिल है और इस सरकार के अपने ही सिद्धांतों के खिलाफ है।
 
ऐसी स्थिति में किसानों की आय को बढ़ा पाना खासा मुश्किल लग रहा है। लेकिन क्या सरकार खेती में आने वाली लागत को कम कर सकती है? खेती में मजदूरी के अलावा सबसे बड़ा खर्च उर्वरक का होता है। खरीफ और रबी दोनों सीजन की फसलों को तैयार करने में उनकी कुल लागत का एक-तिहाई उर्वरक का ही होता है। खास बात यह है कि उर्वरकों से संबंधित सभी गतिविधियां पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रहती हैं। खाद बनाने में लगने वाले रसायनों की कीमत से लेकर तैयार खाद का मूल्य एवं वितरण भी सरकार के नियंत्रण में होता है। भारत 1977 से ही उर्वरक सब्सिडी देता रहा है। हालत यह है कि पिछले चार दशकों से हरेक साल खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी का बिल जीडीपी का 0.6 से लेकर 0.8 फीसदी रहता आया है। लेकिन सरकार को भी अहसास हो चुका है कि खादों पर अधिक नियंत्रण से कोई खास फायदा नहीं हुआ है। वर्ष 2016 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया था कि यूरिया खाद के लिए दी गई सरकारी सब्सिडी का केवल 35 फीसदी हिस्सा ही इसके लक्षित लाभार्थियों तक पहुंच पाया था। बाकी सब्सिडी में हेरफेर की गई, उसे दोबारा उद्योगों तक पहुंचा दिया गया या फिर काला बाजार में बेच दिया गया। हालत यह थी कि करीब आधे किसानों को निर्धारित एमएसपी से अधिक मूल्य पर यूरिया खरीदना पड़ा। इसका एक नकारात्मक पहलू यह भी रहा है कि अत्यधिक सरकारी नियंत्रण और सब्सिडी की राशि वापस मिलने में देरी के चलते निजी क्षेत्र प्रवेश करने से कतराता रहा है।
 
उर्वरक क्षेत्र फिलहाल तीन बड़े बदलावों से गुजर रहा है। पहला, उर्वरकों की वैश्विक कीमतें आज पहले की तुलना में काफी कम हो चुकी हैं। इसके अलावा फॉस्फेट और पोटाश उर्वरकों की कीमतें भी कम होने से इस साल उर्वरक सब्सिडी (जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर) वर्ष 1983 के बाद के न्यूनतम स्तर पर आ चुकी हैं। वैश्विक उर्वरक कीमतों में हालिया तेजी के बावजूद इस साल उपार्जित सब्सिडी बजट खर्च की तुलना में कम ही रहेगी जिसका मतलब है कि उर्वरक कंपनियों को मिलने वाले एरियर में कमी होगी। दूसरा बदलाव यह है कि नाइट्रोजन और फॉस्फोरस उर्वरकों का चीन से होने वाला निर्यात भी अब गिरता नजर आ रहा है। इसकी वजह यह है कि चीन बाहर जाकर प्रदूषण फैलाने वाले 'ब्लू स्काइज' उत्पादों के उत्पादन में अब कमी ला रहा है।
 
तीसरा बदलाव अत्यधिक रोचक एवं अंदरूनी नीतिगत मामले से जुड़ा हुआ है। उर्वरकों के लिए प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) योजना लाने के लिए पिछले कुछ समय से कई प्रायोगिक परियोजनाएं चल रही हैं। इनमें उर्वरकों की खुदरा बिक्री करने वाली दुकानों को पीओएस मशीनों से लैस किया गया है और हरेक प्रामाणिक खरीद के एवज में सब्सिडी की रकम उवर्रक उत्पादक के खाते में जमा की जाती है। बहुत लोगों का मानना था कि सब्सिडी व्यवस्था में बदलाव का असर वर्ष 2021 से पहले महसूस नहीं हो पाएगा। लेकिन महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में डीबीटी की प्रायोगिक परियोजनाओं को सभी जिलों में लागू किया जा चुका है। गत अक्टूबर में सभी जिलों में उर्वरक सब्सिडी को सीधे खाते में स्थानांतरित करने की योजना का क्रियान्वयन शुरू हुआ था और इतने कम समय में ही आधे से अधिक उर्वरक विक्रेता आधार क्रमांक के जरिये प्रामाणिक बिक्री सुनिश्चित करने लगे हैं। इस तरह डीबीटी के जरिये उर्वरक सब्सिडी की योजना को देश भर में लागू करने की सोच चुनौतीपूर्ण होते हुए भी कपोल-कल्पना भर नहीं है।
 
जहां तक पुराने बकाये का सवाल है तो कम सब्सिडी बोझ होने से शुरुआती राजकोषीय असर भी कम होगा और आने वाले समय में सरकार मृदा स्वास्थ्य कार्ड के जरिये उर्वरकों की बिक्री पर भी नियंत्रण करना चाहती है। आधे किसानों को पहले एमएसपी से अधिक कीमत पर यूरिया खरीदना पड़ता था लेकिन अब उन्हें सीधे ही सब्सिडी मिल सकेगी। सरकार जरूरत महसूस होने पर अधिक राहत भी दे सकेगी। व्यापक स्तर पर देखें तो उर्वरक सब्सिडी का डीबीटी भुगतान उर्वरक क्षेत्र में निजी निवेश के लिए अनुकूल राह तैयार करेगा। इससे उर्वरक आयात में कमी भी लाई जा सकेगी क्योंकि सरकार अपनी भूमिका केवल सब्सिडी भुगतान तक ही सीमित कर लेगी।
 
(लेखक क्रेडिट सुइस के अर्थशास्त्री एवं रणनीतिकार-भारत हैं)
Keyword: agri, farmer, subsidy, DBT,
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