बिजनेस स्टैंडर्ड - तेल की तीखी धार, चिंता में कंपनियां और सरकार
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तेल की तीखी धार, चिंता में कंपनियां और सरकार

ज्योति मुकुल और अरिंदम मजूमदार /  January 07, 2018

कच्चे तेल की कीमतें चढऩे से सरकार का वित्तीय गणित बिगडऩे की आश्ंाका तो बढ़ ही गई है, साथ ही उद्योग जगत भी इसकी चपेट में आ सकता है। खास कर विमानन उद्योग को अपेक्षाकृत महंगे कच्चे तेल की आंच अब झेलनी पड़ रही है, जिससे उनकी परिचालन लागत धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। पिछले सप्ताह कच्चे तेल की कीमतें 66 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी। विमान ईंधन (एटीएफ) की कीमतें इस समय 57,349 रुपये प्रति किलोलीटर पहुंच गई हैं, जो पिछले तीन साल का उच्चतम स्तर है। इसी तरह, डीजल का मूल्य भी 60.12 रुपये (दोनों मूल्य दिल्ली के) के अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। सरकार की वित्तीय स्थिति पहले ही नाजुक है, इसलिए शुल्कों में फेरदबल की गुंजाइश भी बहुत नहीं बची है। ऐसे में महंगे ईंधन का दौर एक बार फिर दस्तक देने लगा है। 

 
सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए कच्चे तेल की कीमत 55 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान लगाया था। हालांकि कीमतों में तेजी सरकार के लिए उतनी पीड़ादायक साबित नहीं हुई है, क्योंकि कच्चा तेल दिसंबर 2017 तक औसतन 54 डॉलर प्रति बैरल रहा है। चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीने में केरोसिन और रसोई गैस पर सब्सिडी 120 अरब रुपये (बजट अनुमान 250 अरब रुपये) पहुंच गई। सरकार ने मध्यम अवधि के व्यय ढांच के तहत शुरू में 2018-19 में पेट्रोलियम सब्सिडी कम होकर 180 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया था। अब इस अनुमान में संशोधन की दरकार होगी। चालू वर्ष के रुझान के मद्देनजर अगले साल के लिए बजट में कच्चे तेल की औसत कीमत 65 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान तय किया जा सकता है। 
 
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि सरकार पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के दायरे में लाने के लिए सैद्घांतिक रूप से सहमत है। प्रधान ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के एक कार्यक्रम में कहा था, 'देश में इस बात पर आम सहमति बन रही है कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी में लाया जाय। जीएसटी परिषद इस पर चर्चा कर रही है।' वैसे सरकार को ईंधन कीमतें विनियंत्रित किए जाने से लाभ मिलता दिख रहा है। सरकार ने 2010 से ये सुधार शुरू किए हैं। सरकार ने एक सीमा से अधिक आय और खपत वाले लोगों को रसोई गैस सब्सिडी देनी भी बंद कर दी है। अब सब्सिडी 12 रसोई गैस सिलिंडर पर ही उपलब्ध है और इसका लाभ वहीं उठा सकते हैं, जो सालाना 10 लाख रुपये से कम कमाते हैं।  
 
तेल की खुदरा कीमतें बढऩा उद्योग जगत के लिए जरूर चिंता का विषय है। वे एक सीमा तक ही बढ़ी लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं। खासकर विमानन क्षेत्र की बात करें तो 2015 से इनकी हालत सुधरनी शुरू हुई थी। विमान कंपनी की कुल लागत में जेट र्इंंधन की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत होती है। स्पाइसजेट के मुख्य कार्याधिकारी अजय सिंह ने कहा कि विमान किराये में तत्काल बढ़ोतरी तो नहीं होगी, लेकिन ईंधन के दाम बढऩे से दीर्घ अवधि में असर जरूर होगा। सिंह ने कहा, 'विमानन कंपनियों के लिए चौथी तिमाही मोटे तौर पर कम कमाई वाली होती है। यात्रा तारीख के आस-पास खरीदे गए टिकटों की कीमत अधिक रह सकती है।' 
 
एक महागनर से दूसरे महानगर को जोडऩे वाले मार्गों पर किराया बढ़ाना भी विमानन कंपनियों के लिए उतना आसान नहीं है। प्रतिस्पद्र्धा बढऩे से मुंबई-दिल्ली मार्ग पर हवाई किराया कभी-कभी राजधानी एक्सप्रेस की 2एसी श्रेणी से भी नीचे रहता है, ऐसे में किराया बढ़ाने से पहले कंपनियां दूसरे खर्च नियंत्रित करने के बारे में सोचेंगी। विश्लेषकों का कहना है कि विमानन कंपनियां तेजी से क्षमता बढ़ा रही हैं, इसलिए किराया बढ़ाना उनके लिए आसान नहीं होगा। उदाहरण के लिए पिछले एक महीने में भारतीय विमानन कंपनियों ने बेड़े में विमानों की संख्या में इजाफा तेज कर दिया है। इंडियो और गो एयर जैसी कंपनियों ने दिसंबर 2017 में समाप्त हुई तिमाही में विमानों की संख्या बढ़ाई है। 
 
एसबीआई कैप्स के संतोष सरदेसाई ने एक शोध रिपोर्ट में लिखा, 'अभी एटीएफ एयरलाइन के राजस्व का 30 फीसदी है और एटीएफ की कीमतों में 20 फीसदी की बढ़ोतरी के लिए यात्रियों की संख्या में औसतन 7 से 7.5 फीसदी की वृद्घि चाहिए। अभी यात्रियों की वृद्घि दर 16 से 17 फीसदी है और इसमें कमी से उद्योग के प्रतिफल पर असर पड़ेगा जिससे अंतत: उनका मुनाफा प्रभावित होगा।' विस्तारा के मुख्य कार्याधिकारी लेस्ली थंग ने कहा, 'ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी किसी को अच्छी नहीं लगती है और खासकर बहुत कम मुनाफे पर परिचालन करने वाली विमानन कंपनियों को तो बिल्कुल भी नहीं। जब ईंधन की कीमतें कम थीं तो हमने इसका कुछ अग्रिम सौदे कर लिए थे।' विस्तारा की इन गर्मियों में अपने अंतरराष्टï्रीय परिचालन के विस्तार की योजना है। थंग ने कहा कि उनकी कंपनी विमान का इस्तेमाल बढ़ाने और मरम्मत लागत में कमी जैसे उपायों से परिचालन लागत को काबू में रखने की कोशिश करेगी। ईंधन की कीमतों में तेजी से सरकार विमानन कंपनी एयर इंडिया के विनिवेश में एक और समस्या जुड़ सकती है। कंपनी की वित्तीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है क्योंकि उसने लगातार दो वित्त वर्षों के दौरान परिचालन लाभ अर्जित किया है। लेकिन ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से उसकी पहले से डांवाडोल वित्तीय स्थिति और डगमगा सकती है। कंपनी का ईंधन बिल इस साल 31 मार्च तक करीब 20 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 75.9 अरब रुपये पहुंच सकता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2017 में यह 63.3 अरब रुपये था।
 
डीजल की ऊंची कीमत से भी अन्य उद्योगों और कृषि जिसों की परिवहन लागत बढ़ रही है। उदाहरण के लिए डीजल की कीमतों में करीब 7 फीसदी बढ़ोतरी के कारण अधिकांश सीमेंट कंपनियों को वित्त वर्ष 2018 की पहली छमाही में मालभाड़े पर ज्यादा खर्च करना पड़ा। पेट कोक और बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी ने इन कंपनियों के वित्तीय दबाव को बढ़ा दिया। इक्रा रेटिंग्स के वरिष्ठï उपाध्यक्ष और समूह प्रमुख सब्यसाची मजूमदार ने कहा, 'वित्त वर्ष 2018 में भी बिजली, ईंधन और मालभाड़े की लागत के ऊंची बने रहने की संभावना है, इससे आने वाली तिमाहियों में सीमेंट कंपनियों के परिचालन लाभ पर दबाव बना रहेगा। इसलिए सीमेंट की कीमतों में बढ़ोतरी की कंपनियों की क्षमता लाभप्रदता के परिपेक्ष्य से अहम है।' सार्वजनिक दबाव के कारण पिछले साल 3 अक्टूबर को केंद्र सरकार ने ब्रांडेड और गैर ब्रांडेड पेट्रोल एवं डीजल पर उत्पाद शुल्क में 2 रुपये प्रति लीटर की कमी की थी। प्रधान ने कहा, 'हमने राज्यों से भी मूल्य वद्र्घित कर (वैट) में कमी करने का अनुरोध किया है।'
 
अनुमान के मुताबिक इससे सरकारी खजाने को सालाना 260 अरब रुपये और अक्टूबर, 2017 के बाद दो तिमाहियों में 130 अरब रुपये का नुकसान होगा। अगर उत्पाद शुल्क में एक बार फिर कटौती की जाती है तो इस वित्त वर्ष के बाकी महीनों में सरकार को 65 अरब रुपये का अतिरिक्त नुकसान होगा। सरकार ने बजट में राजकोषीय घाटे को जीडीपी का 3.2 फीसदी रखने का लक्ष्य निर्धारित किया था और इसे हासिल करने के लिए उसे कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। ऐसे में उत्पाद शुल्क में एक और कटौती का फैसला लेना उसके लिए आसान नहीं होगा।
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