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क्या जिग्नेश मेवाणी में है कांशीराम जैसी कूवत?

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  January 07, 2018

हमारी राष्ट्रीय राजनीति में क्या दलित एक कारक के रूप में उभर रहे हैं? क्या यह वही सामाजिक-राजनीतिक कारक है जिसे हम पीछे दलित अभिकथन के रूप में जानते आए हैं या फिर इसमें आगामी समय की चुनावी राजनीति में बदलाव लाने की ताकत भी है? अगर ऐसा है तो क्या इसमें इतनी क्षमता है कि यह मई 2019 तक कायम रहे या फिर उसके पहले ही इसकी धार कुंद हो जाएगी?  इससे जुड़े कुछ अन्य प्रश्न भी हैं? मसलन क्या जिग्नेश मेवाणी इस नए कारक के प्रतीक हैं? राजनीतिक संदर्भ में बात करें तो नया कांशीराम कौन है या महेंद्र सिंह टिकैत या कर्नल (सेवानिवृत्त) किरोड़ी सिंह बैंसला की तरह नई सनसनी कौन होगा? कांशीराम ने हिंदी प्रदेश की राजनीति पर बहुत गहरा असर डाला। अन्य दो के पास भी जाट और गूजरों का व्यापक समर्थन था लेकिन वे जल्दी ही खो गए। 

 
देश के कुल मतदाताओं में करीब 16.6 फीसदी दलित हैं। वे मुस्लिमों की तुलना में कहीं मजबूत वोट बैंक हैं। सन 1989 के पहले के दौर में कांग्रेस तमिलनाडु, केरल और बाद में पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को छोड़कर उनको हल्के में ही लेती थी। बाद में मुस्लिमों और पिछड़े वर्ग के साथ कांग्रेस के दलित मतों में भी गिरावट आई।  हालांकि मुस्लिमों के उलट दलितों ने कभी रणनीति बनाकर मतदान नहीं किया और न ही उन्होंने किसी एक दल को चुनने या दूसरे को सत्ता से बाहर रखने के लिए मतदान किया। इससे भाजपा उभरकर सामने आ सकी। उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई प्रमुख राज्यों में दलितों ने कांग्रेस की जगह दूसरे दलों को वोट दिया। यह बात भी भाजपा के पक्ष में गई। कुछ दलित मोदी के प्रति आकर्षण की वजह से भाजपा की ओर झुके। दलितों का वोट इतना बंट गया कि वे राष्ट्रीय राजनीति में अपना कद गंवा बैठे। 
 
मुस्लिमों से अलग विभिन्न राज्यों में दलितों का वोट काफी बंटा हुआ है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य स्थानों पर उसमें चुनावी नतीजों को बदलने की क्षमता नहीं है। कागज पर देखें तो पंजाब में सर्वाधिक 32 फीसदी दलित हैं। परंतु इनमें से भी ज्यादातर सिख हैं और दो दलों की चुनावी राजनीति वाले इस राज्य में अक्सर चुनाव जातीय पहचान पर आधारित नहीं होते। फिर भी किसी भी राज्य में अगर ये वोट एक साथ किसी पक्ष में जाएं तो संतुलन बदल देते हैं। हमने ऊपर जो सवाल उठाए उनसे एक सवाल निकलता है। क्या आज की दलित पहचान और उसका नेतृत्व जिसे फिलहाल जिग्नेश मेवाणी का नाम दिया जा सकता है, वह जरूरी मजबूती लाने में कामयाब होगा? अगर ऐसा होता है तो एक बड़ी हलचल पैदा होगी। 
 
मेवाणी के संभावित उभार से एक बात स्पष्ट है कि राज्यव्यापी अपील वाले एक करिश्माई नेता का उदय हुआ है। दलितों के बिखराव को देखते हुए किसी भी दल को एक ऐसे नेता की आवश्यकता होगी जो उन्हें एकजुट कर सके। सन 1970 के दशक के मध्य तक बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस के लिए यह भूमिका निभाई। उसके बाद कांग्रेस कोई बड़ा दलित नेता उभारने में नाकाम रही। लोकसभा में सदन के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े दलित हैं लेकिन वे न तो सशक्त हैं और न ही करिश्माई। इस मोर्चे पर भाजपा की स्थिति और खराब है। फिलहाल देश में किसी अल्पसंख्यक, दलित या आदिवासी के पास अहम मंत्रालय नहीं है। जम्मू कश्मीर तथा पूर्वोत्तर की प्रतीकात्मकता को छोड़ दिया जाए तो वे कहीं मुख्यमंत्री तक नहीं हैं। यहां मेवाणी के लिए अवसर है और मोदी शाह इस चुनौती को समझते हैं। वे किसी भी आशंका से जल्द से जल्द निपटना चाहेंगे। ऊना में दलितों पर हुए हमले के बाद मेवाणी का उभार हुआ। चूंकि गुजरात में दलित आबादी बहुत अधिक नहीं है इसलिए उन्हें राजनीति में गंभीरता से नहीं लिया गया। उनकी शुरुआती राजनीति जेएनयू की विचारधारा से प्रेरित लग रही थी जो चुनाव से घृणा करती है। परंतु उनके चुनाव लडऩे का निर्णय करते ही यह बदल गया। इसके बाद वह एक बड़े राष्ट्रीय दल से जुड़ गए। इस बात ने उनको यह वैधता दी कि वे अपना संदेश देश के अन्य राज्यों तक ले जा सकें। उन्होंने इसकी शुरुआत महाराष्ट्र से की है। 
 
मेवाणी युवा हैं, मुखर हैं, निर्भय हैं, सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं तथा राजनीतिक और विचाराधारा के स्तर पर लचीले हैं। इसे ऐसे समझें कि फिलहाल भाजपा ही उनकी दृष्टि में इकलौती बड़ी शत्रु है जिससे निपटने के लिए वे बाकियों से मेलजोल के हिमायती हैं। उनमें कुछ कमियां भी हैं। वह एक छोटे प्रांत से आते हैं, वाम झुकाव वाले हैं जो कि जेएनयू और कुछ अन्य जगहों के अलावा कारगर नहीं है। परंतु उनके जैसे छोटे राज्य से आकर भी देश के सबसे बड़े राज्य की राजनीति बदलने वाले नेता का एक उदाहरण कांशीराम के रूप में हमारे सामने है।
 
कांशीराम चंडीगढ़ के निकट रोपड़ जिले के रहने वाले थे। वह डीआरडीओ में वैज्ञानिक थे। उन्होंने आंबेडकर को पढऩा शुरू किया और अनुसूचित जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक कर्मचारियों का संगठन बामसेफ बनाया। शुरू में वह सुर्खियां बटोरते नजर आए। सन 1980 के आखिरी दिनों में जब अस्थिरता का दौर था तब उन्होंने विविध बंटे हुए समूहों को एक साथ लाने का काम किया। इनमें सिख अलगाववादी भी शामिल थे। अब उन्हें भीड़ जुटाने में भी कामयाबी मिल रही थी। तब कोई उन्हें चुनौती नहीं मान रहा था। कांशीराम ने इनका साथ वैसे ही छोड़ दिया जैसे बाद में अरविंद केजरीवाल ने अन्ना हजारे का। मेवाणी को अगर अपनी राजनीति को आगे ले जाना है तो शायद उनको उमर खालिद का साथ छोडऩा होगा। कांशीराम ने 30 साल पहले यह समझ लिया था कि हिंदी प्रदेश से इतर दलित राजनीति नहीं हो सकती। वह धर्म और राष्ट्रवाद के साथ द्वंद्व करके भी नहीं उभर सकती। न तो उन्होंने और न ही मायावती ने हिंदू धर्म का त्याग किया। वह अपनी बैठकों में कहा करते, 'हमारी लड़ाई हिंदू देवताओं से नहीं, मनुवादियों से है जो हमें उन ईश्वरों से दूर रखते हैं। हम अपने देवताओं को उन पर क्यों छोड़ें? वे तो यही चाहते हैं।' 
 
वह कहते कि मनुवादी गौतम बुद्ध की प्रतिमा को आराम से अपने मंदिरों में स्थान दे देंगे। तैंतीस करोड़ देवताओं में एक और बढ़ जाएगा तो क्या फर्क पड़ेगा। उनकी पहली बड़ी राजनीतिक धमक सन 1988 में इलाहाबाद उपचुनाव में नजर आई। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स कांड में रिश्वत का आरोप लगाते हुए राजीव गांधी के मंत्रिमंडल और लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था और वह इसी घोटाले के बाद अमिताभ बच्चन द्वारा खाली की गई इलाहाबाद सीट से चुनाव लडऩा चाह रहे थे। यहां कांशीराम की दलित राजनीति की पहली झलक देखने को मिली। वह कहते कि आप 40 सालों से जानवरों की तरह जी रहे हैं मैं आपको मनुष्य बनाने आया हूं। इस अभियान से तीन चीजें निकल कर आईं जो बाद में उनकी राजनीति की निर्धारक बनीं और उनकी शिष्या मायावती को उत्तर प्रदेश में सत्ता मिली। पहली बात, उन्होंने अलगाववादी दिखने वाले हर व्यक्ति से दूरी बना ली। फिर चाहे वह सिमरनजीत सिंह मान हों या सुभाष घीसिंग। दूसरा, उन्होंने बार-बार अपने परिवार की राष्ट्रवादी और सैन्य विरासत का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि प्रथम विश्वयुद्ध में उनके परिवार के आठ, दूसरे विश्वयुद्ध में दो और ऑपरेशन ब्लूस्टार में भी दो सदस्य मारे गए। उनका चुनाव अभियान सैन्य पृष्ठभूमि पर आधारित था। 
 
उन्होंने पेंटिंग ब्रिगेड, पैंफलेट ब्रिगेड और यहां तक कि एक बेगिंग स्क्वाड भी बनाई जिसका काम था दलित बस्तियों में जाकर योगदान के रूप में छुट्टे बटोरना। वह हमसे कहते कि यहां महत्त्व पैसे का नहीं है बल्कि अगर एक सफाईकर्मी हमें एक रुपया देता है तो इसका अर्थ यह है कि वह कांग्रेस को वोट देने के लिए हजार रुपये की पेशकश ठुकरा सकता है। तीसरी और सबसे अहम बात, उन्होंने बहुजन समाज के छत्र तले अन्य समुदायों को भी एकजुट किया। इस तरह उन्होंने नारा दिया वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा। बाद में उन्हें और मायावती को लगा कि सत्ता में आने के लिए उन्हें मुस्लिमों और अन्य उच्च वर्णों का भी साथ चाहिए। इस तरह उन्हें सत्ता मिली। इसे दोहराना आसान नहीं लेकिन असंभव भी नहीं है। कांशीराम जबरदस्त समझ वाले राजनेता थे। वह दलित कौटिल्य थे जिनकी चंद्रगुप्त थीं मायावती। क्या मेवाणी में वह कौशल, प्रतिभा, एकाग्रता और महत्त्वाकांक्षा है जिससे वह हिंदी हृदयप्रदेश में आ सकें?
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