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मीडिया और मनोरंजन उद्योग नए साल में हो पूरी तरह मुक्त

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  January 05, 2018

अंग्रेजी, हिंदी, कन्नड़ और अन्य भाषाओं में करीब एक दर्जन न्यूज चैनल नफरत और फर्जी खबरें परोसने में सक्रिय हैं। उनके लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का फिल्म देखना बैंकों के संकट, ठहरे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर, बेरोजगारी, आम भारतीयों को जलाकर या पीटपीटकर मारे जाने की घटनाओं और बढ़ते भ्रष्टाचार से बड़ा मुद्दा है। सैकड़ों वेबसाइटें व्हॉट्सऐप, फेसबुक आदि माध्यमों के जरिये फर्जी खबरें फैलाती हैं। इसलिए मेरी नए साल की पहली कामना यह है कि विज्ञापनदाताओं, निवेशकों और दर्शकों को राष्ट्रहित में ऐसे चैनलों से अपना पिंड छुड़ाना चाहिए।

 
फर्जी खबरों, सोशल मीडिया इनके प्रचार-प्रसार और समाज पर इनके प्रभाव के बारे में पूरी दुनिया में चिंता है और कई स्थानों पर तो इस पर शोध भी हो रहा है। सोशल मीडिया सनकी लोगों का अड्डा बन गया है। लंबे समय तक यह माना जाता था कि इसका कोई महत्त्व नहीं है क्योंकि यह जमीन पर हिंसा का संकेत नहीं है। लेकिन अब ऐसा कतई नहीं है। फर्जी और भड़काऊ वीडियो प्रसारित किए जाने से देश में कई लोगों की पीटपीटकर हत्या हुई है। ब्रिटेन में ब्रेक्सिट और अमेरिका में नस्लवाद पर चल रही बहस के बारे में भी यह सच है। कई लोकतांत्रिक देशों में नफरत, हिंसा और भय का माहौल है और इनके कारण ऑनलाइन खोजे जा सकते है।
 
नफरत फैलाने वाले बयानों पर कार्रवाई के लिए यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और यहां तक कि अमेरिका ने भी गूगल, फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कड़ी नजर रखनी शुरू कर दी है।  भारत में बूम, एसएसमहोक्सस्लेयर, मिनिस्ट्री ऑफ फैक्ट्स और एएलटीन्यूज फर्जी खबरों का खुलासा करती हैं। लेकिन व्यापक तौर पर या तो नफरत फैलाने वाले ब्रांडों में निवेश कर उनका प्रोत्साहन किया जा रहा है या फिर उनकी ज्यादतियों को नजरअंदाज कर एक तरह से उन्हें मौन सहमति दी जा रही है। फिर भी एक काल्पनिक रानी पर आधारित फिल्म पद्मावती को कई राज्य सरकारों ने देखे बिना ही प्रतिबंधित कर दिया। पिछले सप्ताह केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की एक विशेष समिति ने कुछ बदलावों के साथ इसे रिलीज करने को मंजूरी दे दी। 
 
अब मैं अपनी दूसरी कामना की बात करती हूं। हमारे पास एक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय था जिसने मीडिया एवं मनोरंजन कारोबार के 126,200 करोड़ रुपये पहुंचने की महत्त्वाकांक्षी कल्पना की थी। इस तरह यह कारोबार जीडीपी का 0.9 फीसदी तक पहुंच जाता। यह मंत्रालय जानता था कि रचनात्मक उद्योगों के लिए उनकी रचनात्मक आजादी कितनी जरूरी है। ऐसे उद्योगों को ज्यादा स्क्रीनों, वितरण के ज्यादा मौकों और बेहतर मुद्रीकरण की जरूरत है, सेंसरशिप की नहीं।  एक फिल्म से 200 से 400 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार और कई लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। इस तरह फिल्मों से लाखों रोजगार पैदा होते हैं और हजारों करोड़ रुपये का कर मिलता है। भारतीय फिल्मों ने 2016 में 14,230 करोड़ रुपये की कमाई की जिसमें से करीब तीन-चौथाई बॉक्स ऑफिस से आई। फिल्मों से दो-तीन गुना ज्यादा रोजगार और कर पैदा हो सकता है लेकिन देश में पर्याप्त संख्या में स्क्रीनों की कमी है। चीन में जहां 1.38 अरब आबादी के लिए 40,000 स्क्रीन है जबकि भारत में 1.2 अरब लोगों के लिए केवल 9,000 स्क्रीन हैं। संयोग से 2011 में चीन में भी भारत के बराबर स्क्रीन थे लेकिन फिर वहां की सरकार ने इसमें भारी निवेश का फैसला किया और आज चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फिल्म बाजार है।
 
लेकिन चीन की तुलना में भारत एक मामले में लाभ की स्थिति में है। भारत के पास रचनात्मक रूप से मजबूत स्थानीय उद्योग है जबकि चीन में हॉलीवुड का दबदबा है। पद्मावती और रचनात्मक आजादी पर दूसरे हमलों से देश की यह ताकत कमजोर हुई है और भारत पाकिस्तान की राह पर जा रहा है जिसके पास अभिव्यक्ति के लिए कोई मीडिया उद्योग नहीं है। उदारीकरण के बाद भारत की पहचान एक ऐसे देश के रूप में उभरी जिसने दुनिया के कुछ उत्कृष्टï मैनेजरों, तकनीकविदों, डॉक्टरों और रचनात्मक प्रतिभाओं को पैदा किया। इस पहचान को जारी रखने के लिए उस तरह की आजादी जरूरी है जिनके दम पर भारत यहां तक पहुंचा है। लोकतंत्र में जितनी आजादी होगी, मीडिया उद्योग उतना ही बड़ा और लाभकारी होगा। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अमेरिका है।
 
मेरी तीसरी कामना यह है कि हम भी अमेरिकी मीडिया और मनोरंजन उद्योग की तरह बनें जहां न्यूज और मनोरंजन उद्योगों का आकार जीडीपी का 3.7 फीसदी से अधिक है, वे भारी संख्या में रोजगार देते हैं और रचनात्मक आजादी को सुनिश्चित करने के लिए वहां एक संस्थागत व्यवस्था है। अमेरिका में अगर किसी टॉक शो का प्रस्तोता राष्ट्रपति का मजाक उड़ाया जाता है तो उसे गिरफ्तारी या फिर शो बंद होने की की चिंता नहीं करनी होती है। संविधान से लेकर प्रेस से जुड़ी संस्थाएं और न्यायपालिका इस आजादी का समर्थन करती हैं।
 
इस स्तर पर पहुंचने के लिए भारत को एक सुचारु रूप से काम करने वाला लोकतंत्र बनने की जरूरत है जो फिल्मकारों या पत्रकारों को निशाना बनाने के बजाय खुद पर हंसने के लिए पर्याप्त सुरक्षित हो। लेकिन इसके लिए पूरी तरह मुक्त मीडिया और मनोरंजन उद्योग की जरूरत है। उम्मीद है कि नए साल में मेरी ये कामना पूरी होंगी।
Keyword: media, entertainment, GDP,,
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