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कर लगाइए, डराइए नहीं

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  January 05, 2018

वित्त मंत्री ने गुरुवार को संसद में एक चर्चा में हिस्सा लेते हुए जो तीन दावे किए, हो सकता है कि वे सही हों। उन्होंने कहा कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) जैसे सुधार मध्यम एवं दीर्घ अवधि में अच्छे नतीजे देंगे, भारत पिछले तीन वर्षों से दुनिया की सर्वाधिक तीव्र विकास वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है और हालिया आर्थिक आंकड़े आर्थिक गतिविधियों में तेजी का इशारा कर रहे हैं। दुर्भाग्य से इनमें से कोई भी बात अपना पांचवां और इस सरकार का अंतिम बजट तैयार करने में जुटे वित्त मंत्री के सामने मौजूद चुनौतियों की जटिलता को कम नहीं करती है।

 
पहली चुनौती तेल की बढ़ती कीमतों से जुड़ी है। किसी ने भी नहीं सोचा था कि कच्चा तेल 68 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच जाएगा। समय के साथ ही साफ हो पाएगा कि इसका घरेलू तेल कीमतों एवं मुद्रास्फीति, पेट्रोलियम उत्पादों पर देय करों में कटौती का बजट और व्यापार घाटे पर क्या असर पड़ता है? हालांकि पहले की तरह इनसे स्थूल-आर्थिक स्थायित्व के खतरे में पडऩे की आशंका अभी नहीं दिख रही है लेकिन इनका आर्थिक वृद्धि पर असर पड़ेगा। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वर्ष 2014-16 की अवधि में तेल कीमतों के 110 डॉलर से 30 डॉलर प्रति बैरल पर आ जाने से बोनस आर्थिक वृद्धि हुई थी लेकिन कीमतें बढऩे से यह नीचे आ जाएगी। वर्ष 2015-16 के दौरान सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि 7.9 फीसदी की ऊंचाई तक पहुंच गई थी। मुद्रास्फीति बढऩे का खतरा इसलिए भी अधिक है कि खाद्य कीमतें बढ़ी हुई हैं। इस वजह से भारतीय रिजर्व बैंक के लिए निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती कर पाना नामुमकिन लग रहा है। 
 
नियोजित अनुमान से अधिक राजकोषीय घाटा होने के भी आसार दिख रहे हैं जिससे केंद्र एवं राज्यों का पहले से ही बढ़ रहा घाटा और भी बढ़ेगा। इससे बॉन्ड की पहले से ही ऊंची दरों के और अधिक होने की संभावना दिख रही है। आखिर महंगा पैसा तीव्र विकास की संभावना को भी कम करता है। चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि का 'अग्रिम' अनुमान 6.5 फीसदी है जो 6.7 फीसदी के पिछले अनुमान से कम है। अगले वित्त वर्ष में भी आर्थिक वृद्धि के अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के 7.4 फीसदी के अनुमान से कम ही रहने के आसार हैं लेकिन कम आधार-मूल्य होने और निर्यात गतिविधियों में वृद्धि से इसके सात फीसदी का दायरा पार कर जाने की संभावना जरूर है। भले ही यह राहत की बात होगी लेकिन सच यह है कि निवेश का आंकड़ा एक दशक पहले के स्तर पर पहुंचता दिख रहा है और उपभोक्ता गतिविधियों के भी स्थिर रहने का खतरा है। 
 
ऐसी स्थिति में अधिक राजस्व उछाल की उम्मीद करना बेमानी होगा। वैसे अगर सरकार आम चुनावों के पहले के साल में कुछ घोषणाओं के बारे में सोचती है तो इसकी जरूरत पड़ेगी। इसका मतलब है कि खर्च पर लगाम लगानी सरकार की सबसे बड़ी अहमियत होनी चाहिए। दरअसल यह भी अभी साफ नहीं है कि जीएसटी राजस्व 91,000 करोड़ रुपये के स्तर तक कब पहुंच पाता है?  इस साल आर्थिक मनोदशा एवं प्रदर्शन में बदलाव होने की उम्मीद की गई थी लेकिन तस्वीर उतनी आकर्षक नहीं होने से वित्त मंत्री को अभी तक आजमाए न गए राजस्व स्रोतों के बारे में भी सोचना पड़ेगा। शेयरों पर लंबी अवधि में हुए पूंजीगत लाभ पर कर लगाना इसका सबसे स्वाभाविक जरिया हो सकता है। ऐसा होने से शेयरों पर पूंजीगत लाभ कर अन्य संपत्तियों पर लागू कर के बराबर हो जाएगा। अनुमान है कि शेयरों पर पूंजीगत लाभ कर नहीं लगाने से हजारों करोड़ रुपये की कर हानि हो रही है। केवल एक ही श्रेणी के निवेशकों को मिला कर-अवकाश जारी रखना न तो तर्कसंगत और न ही उचित है।
 
हालांकि इस तरह का कर लगाना जोखिमों से परे नहीं होगा। शेयर बाजार पर इसका असर होना तो जाहिर है लेकिन विदेशी निवेशक भी निवेश के लिए कहीं और देख सकते हैं। अगर इसका असर गहरा रहता है तो नकारात्मक धन प्रभाव उपभोग और वृद्धि पर भी असर डालेगा। वैसे इन दोनों जोखिमों से निपटने के तरीके मौजूद हैं। जैसे, मुद्रास्फीति तटस्थीकरण के साथ पूंजीगत लाभ कर को विलंबित एवं चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा सकता है। इसे इस तरह लगाया जा सकता है कि किसी भी साल में इसका निवेशकों पर कम बोझ ही पड़े ताकि बाजार में अधिक उठापटक न हो और निवेशक दूर न भागने लगें। शुरुआती दर तीन फीसदी भी हो सकती है जिसे आने वाले वर्षों में दो चरणों में 10 फीसदी तक किया  जा सकता है।
Keyword: arun jaitley, GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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