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दिवालिया संहिता से तय होगा बैंकों का भाग्य!

अद्वैत राव पलेपू /  January 04, 2018

सरकार फंसे कर्ज के खरीदारों को कर रियायतें देने पर विचार कर सकती है, क्योंकि नहीं तो वे इन फंसी परिसंपत्तियों पर अधिक हेयरकट की मांग कर सकते हैं। विधि कंपनी एजेडबी ऐंड पार्टनर्स के संस्थापक भागीदार बहराम नवरोज वकील ने अद्वैत राव पलेपू के साथ बातचीत में कहा कि इसके परिणामस्वरूप बैंकों का पूंजीगत आधार कमजोर होगा जिससे सरकार पर पुन: रकम लगाने का दबाव पड़ेगा। पेश हैं उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश:

 
आप अब तक की इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी (रिजोल्यूशन) कोड (आईबीसी) प्रक्रिया को किस तरह से देखते हैं?
 
कुल मिलाकर, अभी यह परिचालन के पहले वर्ष में है और मैं इसे लेकर उत्साहित हूं। जहां तक इससे जुड़े फैसले का सवाल है तो मेरा मानना है कि हर कोई इसे सही मान रहा है। उन्होंने उन लक्ष्यों पर अमल किया है जिन्हें पाने की हम कोशिश कर रहे हैं। माना जा रहा है कि 'बिग 12' खाते इस संदर्भ में बेहद अहम होंगे। 
 
वष 2017 के अंत तक आईबीसी में केंद्र सरकार द्वारा लगातार संशोधन के बारे में आपका क्या कहना है?
 
अमेरिका में भी कानून में 300 संशोधन किए गए और इस एक वर्ष में काफी कुछ बदलाव आया है। उदाहरण के लिए, शेयरधारक मंजूरी हासिल करने को लेकर समस्या सामने आई। इसी तरह, करों, प्रतिस्पर्धा आयोग, सेबी, पिछली देनदारियों, आकस्मिक देनदारियों, क्षेत्र-केंद्रित लाइसेंस और परमिट आदि को लेकर भी सवाल खड़े हुए। इसलिए, इन सभी को ध्यान में रखकर वे लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कानून को अधिक सक्षम बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं।
 
क्या अब क्षेत्र-केंद्रित संशोधन किए जाने की संभावना है?
 
मैं नहीं मानता कि यह क्षेत्र-केंद्रित होगा। नियामक चाहे जो भी हो, चाहे वह भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) हो या भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई), अब तेज मंजूरी प्रक्रिया होगी। इसलिए यदि नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) कहता है कि 30 दिन में आपको परिचालन ऋणदाताओं को भुगतान करना होगा तो उन 30 दिनों के अंदर सभी मंजूरियां (नियामकों, ट्राई या सीसीआई से) लेने की जरूरत होगी। या तो आपको सभी मंजूरियां समय पर लेने की जरूरत होगी, या कुछ मामलों में छूट मिल सकती है।
 
फंसे कर्ज की खरीदारी को लेकर कर अधिकारियों का नजरिया कैसा रहेगा?
 
कुछ खबरों में कहा गया है कि सरकार कुछ रियायत देने पर विचार कर रही है। बैंक के लिए हेयरकट बढ़ाने के लिए सरकार को पूंजी लगाने की जरूरत होगी। इसलिए आप इसे चाहे कर राजस्व के तौर पर समझें या बैंक पूंजीकरण के तौर पर। सरकार कर रियायत को सकारात्मक तौर पर देख सकती है। 
 
आईबीसी ने बैंकों का नियमित व्यवसाय किस तरह से प्रभावित किया है?
 
दो बड़े बदलाव आए हैं। पहला है स्पष्टïता के संदर्भ में। किसी खास कंपनी को बहुत ज्यादा हेयरकट देने का भय हमेशा बना रहा। अब चाहे हम इसे पसंद करें या नहीं, केंद्रीय सतर्कता आयोग या भारतीय नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक (सीएजी) वास्तविकता हैं। दूसरा, आईबीसी बेहद महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि आपको एनसीएलटी की मंजूरी मिली है, जिस पर आपने अमल किया है। 
 
इरादतन दिवालया को रोकने वाले केंद्र सरकार के अध्यादेश के बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
 
मेरा मानना है कि यह सरकार का विशेषाधिकार है। यह निर्णय सरकार द्वारा सामाजिक मुद्दों और ऐतिहासिक नजरिये को ध्यान में रखकर लिया गया है। 
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