बिजनेस स्टैंडर्ड - लचीला दिवालिया कानून
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लचीला दिवालिया कानून

संपादकीय /  January 03, 2018

संसद ने ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) में संशोधन के लिए पेश प्रस्ताव को पारित कर दिया है। यह संशोधन विधेयक दिवालिया प्रक्रिया पर अमल करने की राह में खड़े अवरोधों को दूर करने के इरादे से लाया गया था। इससे दिवालिया कानून में आया लचीलापन यह इशारा करता है कि सरकार कर्ज में फंसी परिसंपत्तियों को उबारने एवं दोबारा कामकाज लायक बनाने या फिर उनकी बिक्री कर दूसरे काम में लाने को लेकर काफी गंभीर है। समस्या यह है कि सरकार को एक साथ विभिन्न उद्देश्यों एवं गतिरोधों का सामना करना पड़ रहा है जिससे हालात तनी हुई रस्सी पर चलने जैसे हो गए हैं।

 
सबसे पहले सरकार को यह संभावना मजबूत करने की जरूरत है कि इन परिसंपत्तियों की बिक्री या उनका परित्याग करने के बजाय उन्हें नई जिंदगी देने की कोशिश की जाएगी। उसके बाद उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि कर्जदार परिसंपत्तियों की बहाली या बिक्री के लिए डिजाइन व्यवस्था में ऋणदाताओं को नीलामी में अधिकतम संभव बोली मिल सके। यह ढांचा सभी ऋणदाताओं के बीच एक बचाव योजना पर सहमति बनने की संभावना भी तलाशेगा। इसका भी ध्यान रखा जाएगा कि लेनदारों की समिति में बेहतर सौदे की आस में उसे लटकाने की कोशिश न की जाए। अंत में, यह सुनिश्चित करने की भी जरूरत है कि बोली प्रक्रिया के जरिये कोई नैतिक संकट न पैदा हो। इसका मतलब है कि कंपनी चलाने में नाकाम होने की वजह से कर्ज का भुगतान नहीं कर पाए लोगों को दिवालिया प्रक्रिया के दौरान कम भाव पर उसका नियंत्रण मिलने की स्थिति न बने।
 
इन सभी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सरकार तेज गति से कदम उठाने के लिए बाध्य हुई है। आईबीसी कानून के पुराने संस्करण से ऐसी आशंकाएं पैदा हुई थीं कि कर्जदार परिसंपत्ति के लिए कुछ बोलियां सुनिश्चित करने में लगे बैंकों और परिसंपत्तियों को बहुत कम भाव पर खरीदने की मंशा रखने वाले प्रवर्तकों के बीच कोई अनकहा समझौता न हो जाए। सरकार ने इस आशंका को दूर करने के लिए एक अध्यादेश जारी किया है जिसमें ऐसे प्रवर्तकों को बोली प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है। संशोधनों के पारित होने से इस अध्यादेश को भी संसद की मंजूरी मिल गई है। लेकिन अध्यादेश के बाद ऐसी आशंकाएं जताई गईं थी कि कंपनी के प्रवर्तकों को नीलामी से बाहर रखना काफी सख्त कदम है और इससे निर्दोष कॉर्पोरेट गारंटर भी बोली प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगे। इससे दिवालिया होने की मांग रखने वाली छोटी एवं मझोली कंपनियां बुरी तरह प्रभावित होने की बात भी कही गई। 
 
लिहाजा सरकार ने आईबीसी संशोधन विधेयक में इन प्रावधानों को बदल दिया ताकि छोटी एवं मझोली इकाइयों के हितों को संरक्षित रखा जा सके। इसके साथ ही अब कॉर्पोरेट गारंटरों को केवल उन्हीं कंपनियों की बोली प्रक्रिया से प्रतिबंधित किया गया है जिनकी गारंटी उन्होंने दी थी। यह तय करने की भी कोशिश है कि दोषी प्रवर्तकों को बाहर रखने के चक्कर में परिसंपत्ति पुनर्निर्माण फर्म और परिसंपत्ति निवेश फंड ही बाहर न रह जाएं। इस बीच नियामक संस्था भारतीय ऋणशोधन एवं दिवालिया बोर्ड वह प्रावधान हटाने की कोशिश कर रहा था जिसमें किसी कर्जदार परिसंपत्ति की बिक्री की सूरत में उसकी कीमत का खुलासा अनिवार्य किया गया था। ऐसी आशंका थी कि कम मूल्य होने पर बोलीकर्ता कम बोली लगाने के लिए प्रेरित होंगे। लेकिन अब ऋणदाताओं को इस मूल्य के बारे में बताया जाएगा और उसके कम होने से वे किसी भी कर्ज समाधान योजना पर सहमत होने के लिए तैयार हो जाएंगे ताकि उस परिसंपत्ति को बचाया जा सके। इन सभी बदलावों का असर देखा जाना अभी बाकी है लेकिन बदलाव करने में सरकार का तेजी दिखाना एक भरोसा जरूर पैदा करता है। वैसे दिवालिया प्रक्रिया पर आगे करीबी नजर रखी जाएगी।
Keyword: insolvency law, parliament, IBC,,
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