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लोक लुभावन बजट से पार नहीं होती चुनावी नैया

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  January 02, 2018

अरुण जेटली अब तक अच्छे वित्त मंत्री साबित हुए हैं। हालांकि उनकी तमाम कुशलताओं के बावजूद मौजूदा वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टीं (भाजपा) के नेतृत्व वाली राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने चालू वित्त वर्ष के बजट में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.2 प्रतिशत तय किया था। हालांकि इसके लिए चिंतित होने की जरूरत नहीं है। मामूली या नाममात्र अंतर से लक्ष्य चूक ना कोई बड़ी मुसीबत नहीं लाने जा रहा है और वैसे भी एकदम सटीक गणना तो लगभग असंभव होती है। आंकड़ों में कई बार संशोधन होते रहते हैं।

 
आखिर वित्त वर्ष 2018-19 में राजकोषीय घाटे का आंकड़ा कितना बढ़ेगा? फिलहाल तो हमें यह मालूम नहीं है, लेकिन एक  अनुमान तो जरूर लगाया जा सकता है। जब तीन साल बाद बजट के आंकड़े आएंगे तो यह कम से कम 1 प्रतिशत बढ़कर 5 प्रतिशत के करीब या इससे अधिक रह सकता है। किसी आम चुनाव से ठीक पहले वर्ष में एक खास बात दिखती है। दोबारा सत्तारूढ़ होने के लिए राजनीतिक दल कोई कसर नहीं छोड़ते हैं और इसी मारामारी में करदाताओं की रकम पानी की तरह बहाई जाती है। दिलचस्प बात तो यह है कि राजनीतिक दलों को भी भान है कि अधिक रकम फूंकने से कोई मदद नहीं मिलती है, लेकिन वह ऐसा करने से बाज नहीं आते हैं। इतिहास इस बात का गवाह रहा है। 
 
वर्ष 1971 के बाद अब तक मात्र दो सरकारें (इसमें 1998 में अल्प अवधि की भाजपा सरकार शामिल नहीं है) रही हैं, जिन्हें जनता ने दोबारा सत्ता की कमान थमाई है। पहली ऐसी सरकार 1984 में बनी थी और दूसरी सरकार 2009 में आई थी। 1984 में कांग्रेस को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पैदा हुई सहानुभूति का लाभ मिला था। 2009 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार इसलिए दोबारा सत्ता में आने में सफल रही क्योंकि उसने अपने पहले कार्यकाल में करदाताओं की रकम बड़ी निर्ममता से खर्च की थी। यह कहानी केवल पांचवें साल की नहीं थी, बल्कि पूरे कार्यकाल के दौरान खजाना खोल दिया गया। सोनिया गांधी का भारतीय अर्थव्यवस्था में यह सबसे बड़ा योगदान था। 
 
इस तरह, हम कह सकते हैं कि आम चुनाव से पूर्व लोकलुभावन बजट तैयार करने की नीति केवल एक बार निशाने पर लगी है और वह साल है 1970। इंदिरा गांधी पर उस समय समाजवाद का खुमार इतना चढ़ा था कि खजाना लुटाकर वह मार्च 1971 में मतदाताओं को अपने पाले में करने में सफल रहीं। 
 
नहीं लिया सबक
 
1979 में चरण सिंह ने एक अति लोक लुभावन बजट पेश किया था। इसका केवल इतना असर हुआ कि वह अपनी सीट किसी तरह बचाने में कामयाब रहे। सरकार सत्ता से बेदखल हो गई। 1984 का बजट भी ठीक ऐसा ही था। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आवंटन दोगुना कर दिया गया था। ग्रामीण भूमिहीन रोजगार के लिए रकम चौगुनी कर दी गई थी। हैरान हो गए न ! आंकड़े यही कहते हैं। उस समय अगला आम चुनाव 1989 में होना था, लेकिन राजीव गांधी 1988 में ही चुनाव कराना चाहते थे, इसलिए 1988 का बजट भी आकर्षक बनाया गया था। इस बीच, उन्होंने 1988 में चुनाव कराने का इरादा टाल दिया, जिससे एक के बाद एक दो लोकलुभावन बजट ने करदाताओं की रकम में जमकर सेंध लगाई। 1989 में तत्कालीन वित्त मंत्री ने दोनों हाथों से धन लुटाया और अनगिनत घोषणाएं कीं और रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, सिंचाई आदि पर व्यय बढ़ा दिया। सरकार को इससे कोई लाभ नहीं मिला और कांग्रेस चुनाव में औंधे मुंह गिरी। 1996 में भी यही कहानी दोहराई गई। मैं इसकी गहराई में नहीं जाऊंगा। एक बार फिर कांग्रेस चुनाव में परास्त हुई।
 
वर्ष 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने वेतन आयोग से लोगों को लुभाने की कोशिश जरूर की थी, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। वर्ष1999 के आम चुनाव की कहानी कुछ दूसरी थी। सरकार लोकसभा में मात्र एक मत से गिर गई थी, इसलिए बजट पर जोर नहीं पड़ा। 2004 में भाजपा ने पिछली सरकारों की गलतियां दोहराईं। 2003 के बजट भाषण का कुछ हिस्सा पूरी तरह मतदाताओं को नजर में रखते हुए तैयार किया गया था। मतदाताओं पर इसका कोई असर नहीं हुआ, लेकिन वाजपेयी सरकार जरूर सत्ता से हट गई। अब देखने वाली बात यह होगी कि जेटली 2018-19 के बजट में लोकलुभावन घोषणाओं से कितनी दूरी बरत पाते हैं। मोदी सरकार मतदाताओं को खुश नहीं रखने की गलती कर चुकी है। इसकी भरपाई क्या यह अगले साल भारी व्यय से करेगी?
 
बेतुके कदम
 
आखिर सरकारें ऐसी गलतियां क्यों करती रहती हैं? एक के बाद एक भारत सरकार को क्यों लगता है कि चुनाव से ठीक पहले साल में लोकलुभावन बजट और आकर्षक घोषणाएं मतदाताओं को उनकी तरफ खीचेंगी? इनका केवल एक निष्कर्ष निकल सकता है। जिन सरकारों से तार्किक होने की सबसे ज्यादा उम्मीद होती हैं, वे वास्तव में तर्क के पैमाने पर खरी नहीं उतरती हैं। तर्कसंगत होने का अर्थ पुरानी गलतियों को नहीं दोहराना, खासकर बार-बार करने से बाज आना है।  यह परिभाषा बहुत अधिक सुर्खियों में नहीं रहे कार्नेगी-मेलन यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री जॉन मुथ ने दी थी। उन्होंने 1960 के दशक में एक किताब लिखी थी, जिसे अर्थशास्त्र में रैशनल एक्सपेक्टेशन थियरी (तर्गसंगत अपेक्षाओं का सिद्धांत) का एक मजबूत आधार माना गया। उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलना था चाहिए था, लेकिन नहीं मिला। कई साल बाद मुथ के सिद्धांत को विकसित करने वाले रॉबर्ट लुकास को पुरस्कार जरू र मिल गया। 
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