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नकली साड़ी के धागे में उलझी असली बनारसी साड़ी

बीएस संवाददाता / वाराणसी January 01, 2018

नकली साडिय़ों के कारण असली विश्व प्रसिद्ध बनारसी साडिय़ां अपनी पहचान खो रही है। इसकी खास वजह यह है कि रेशमी धागों के बजाय इसमें अब नायलॉन और पॉलिएस्टर का इस्तेमाल होने लगा है। वहीं हथकरघे की जगह विद्युतचालित करघे पर 80 से 85 प्रतिशत साडिय़ां इसी धागे से बनाई जा रही हैं जिससे हथकरघा उद्योग, बनारसी साड़ी उद्योग के साथ बुनकरों को बड़ा झटका लगा है। बदलते वक्त के साथ बाजार के साथ कदमताल नहीं कर पाने के कारण बनारसी साड़ी की छवि धूमिल हो रही है। इसे वैश्विक पहचान बौद्धिक संपदा अधिकार के तहत जीआई का दर्जा तो मिल गया लेकिन जागरूकता का अभाव एवं सख्ती नहीं होने कारण यह उद्योग पिछड़ता जा रहा है। वहीं नकली साडिय़ों ने ही बनारस में ही असली बनारसी साडिय़ों को गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया है। आज की युवा पीढ़ी भी नकली की पहचान नहीं कर पा रहे हैं तथा नकली साडिय़ों को ही असली बनारसी साड़ी मान रहे हैं। 
 
वाराणसी के बुनकरों ने बताया कि पिछले कई वर्षों से असली रेशम की बनी बनारसी साड़ी के उत्पादन में काफी गिरावट आई है।  सिंथेटिक धागों से बनी नकली साडिय़ां मात्र 200 रुपये में बन रही है। इस वजह से बाजार में अब 85 प्रतिशत नकली साडिय़ों का कब्जा हो गया है।  जीआई विशेषज्ञ व राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार से सम्मान प्राप्त डॉ रजनीकांत ने बताया कि बौद्धिक संपदा अधिनियम के तहत 2009 में बनारसी साडिय़ों और ब्रोकेड को जीआई हासिल हो गया है। इसके बावजूद नकली साडिय़ां भी बनारसी साड़ी के नाम पर बिक रही है। उन्होंने कहा कि जीआई नियमों का कड़ाई के साथ पालन और सख्ती से कानून लागू किए जाने से इस उद्योग को फिर से पंख लग जाएंगे। 
 
वहीं कई दशक से बनारस में साड़ी की बुनाई, ब्रोकेड व विभिन्न तरह के रेशमी और सूती वस्त्रों को हैंडलूम से बनाने की परंपरा रही है। पहले यह विधि अकड़ा-मंडा, नाका-जाला-टाका विधि से तैयार की जाती थी। आज भी पूरी दुनिया में बनारस के हाथ से बिनकारी का उत्कृष्ट नमूना जाना जाता है। समय की मांग के साथ जकार्ड का चलन बढ़ा है और पूरा का पूरा विज्ञान, तकनीक इस जकार्ड के माध्यम से बनारस वस्त्र उद्योग में शामिल हुई है।  बनारसी साडिय़ों के प्रमुख कारोबारी राजन बहल ने बताया कि सरकार बुनकरों की बेहतरी के लिए लाख जतन कर रही है, लेकिन नकली साडिय़ों पर रोक के बिना बुनकरों के हालात सुधरना मुश्किल है। नकली रेशमी साडिय़ों की रफ्तार वाराणसी के बुनकरों की हालत खराब कर रही है। 
 
एक अन्य साड़ी कारोबारी मोहनलाल सरावगी ने बताया कि हर किसी को सस्ती साड़ी चाहिए। यही वजह है कि नकली बनारसी साड़ी धड़ल्ले से बिक रही है। पिछले पांच वर्षों में असली बनारसी साड़ी का निर्यात का ग्राफ 8,000 करोड़ रुपये से घटकर 1,000 करोड़ पर आ गया है। असली बनारसी साड़ी की पहचान उसमें लगे जीआई टैग से की जा सकती है, लेकिन कुछ कारोबारी जीआई टैग का इस्तेमाल नहीं करते हैं। 
Keyword: banarasi saree, silk,,
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