बिजनेस स्टैंडर्ड - पिछला साल मौसम की मार और लाचार किसान के नाम
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पिछला साल मौसम की मार और लाचार किसान के नाम

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  January 01, 2018

मेरे हिसाब से 2017 का 'पर्सन' ऑफ दी इयर मौसम रहा। इस वर्ष का प्रमुख चेहरा किसान रहा, जिसने बेमौसम बारिश और सूखे जैसे मौसमी बदलावों की मार झेली है। यह वह साल है, जब भारत में बाढ़ आने के समय सूखा पड़ा और सूखा रहने के समय बाढ़ आई। यह निराशा के सीजन का समय है और यह वह समय है कि हम इसे पहचानें ताकि हम बेहतर और त्वरित कदम उठा सकें।  लेकिन 'मौसम' की यह मुख्य खबर हमारे समाचारों के शोरगुल में गुम हो गई हैै। हमें अक्सर यह खबर बहुत ज्यादा पढऩे को नहीं मिलती, जिसके तीन मुख्य कारण हैं। पहला, अभी यह स्वीकार नहीं किया गया है कि मौसम में बदलाव हो रहा है। मौसम वैज्ञानिक अपने चारों तरफ की दुनिया को लेकर सुनिश्चित नहीं हैं। वे कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहते हैं। दूसरा, हमारे पास उन लोगों की बातें सुनने का कोई जरिया नहीं है, जो आधिकारिक और तथाकथित 'वैज्ञानिक तथ्यों' पर आधारित नहीं हैं। इस तरह बदलाव को महसूस कर रहे किसानों के नजरिये को खारिज कर दिया जाता है या उसे नहीं सुना जाता है। हालांकि यह सही है कि वे जलवायु परिवर्तन जैसा परिष्कृत शब्द नहीं जानते हैं। उनके लिए मौसम, मौसम है और इसका बदलाव उनके लिए मुश्किलें ला रहा है। तीसरा, यह खबर हमें आमतौर पर सुनने को इसलिए नहीं मिलती है क्योंकि यह तभी सुनाई देती हैं जब इससे शहर, या मध्यम वर्ग प्रभावित होते हैं या किसान आत्महत्या को मजबूत होते हैं या स्थिति बहुत विकराल हो जाती है। यह खबर रोजमर्रा की दैनिक घटनाओं यानी उन बदलावों को लेकर है, जो हम देख रहे हैं। यह खबर दूरस्थ इलाकों और लोगों के बारे में है। यह खबर हमारी खबर नहीं है।  

 
लेकिन यह होनी चाहिए। यही वजह है कि यह मेरे नजरिये से 2017 की सबसे बड़ी खबर हमारे शहरों में जहरीला और जानलेवा प्रदूषण नहीं है। यह प्रदूषण चिंताजनक है। बहुत चिंताजनक है। लेकिन यह उससे आधा भी चिंताजनक नहीं है, जो मौसमी बदलावों की आपदा देशभर के ग्रामीण इलाकों में व्यापक मानवीय तकलीफ ला रही है।  यह उचित समय है कि नीति में इस अंतर को पहचाना जाए और इस नए सामान्य स्तर को समझा जाए। एक ऐसा सामान्य स्तर, जहां प्रकृति मानव के खिलाफ हो गई है। इस  'सामान्यता' की वजह यह है कि हम लोगों ने प्रकृति का शोषण किया है। हमारी अर्थव्यवस्थाएं और हमारी संपत्ति बनाने के लिए जैव ईंधन को जला रहे हैं। इन उत्सर्जनों से आज मौसम बदल गया है और विनाशकारी बन गया है। 
 
इसलिए 2017 उन विरोधाभासों के बारे में है, जो हमें आने वाले वर्षों में और ज्यादा प्रभावित करेंगे। जरा सोचिए, देश के कुछ हिस्सों में फसल का ज्यादा उत्पादन होना कैसे किसानों के लिए मुसीबत बन गया। फसल ज्यादा पैदा होने के बाद भी किसान मुश्किल में थे। क्यों? इसकी वजह थी कि ज्यादा उत्पादन से उनकी उपज की कोई कीमत नहीं थी। लेकिन यह केवल प्रचुर मात्रा में उत्पादन की कहानी नहीं है। असल तथ्य यह है कि बारिश नहीं होने या मौसम खराब होने के कारण कई सीजनों में कमजोर उत्पादन के बाद इस बार भारी उत्पादन हुआ। इसी से दिक्कतें पैदा हो गईं। कई सीजनों में कम उत्पादन के बाद उन्हें अच्छी फसल मिलने से वे अपने घाटे की भरपाई कर सकते थे, अपने ऋण चुका सकते थे। लेकिन अब उनकी उपज की कोई कीमत नहीं थी। यह विसंगति नहीं है। विसंगति नया सामान्य स्तर कायम होना है। 
 
आज हमारी यह त्रासदी है कि हमारे किसान दो वैश्विक घटनाक्रम के शिकार हैं। आप इन्हें 'विदेशी हाथ' कह सकते हैं। पहला, उत्सर्जन को उस स्तर और रफ्तार से कम करने पर जलवायु परिवर्तन पर बातचीत का असफल होना, जिससे विश्व के सबसे गरीब लोग प्रभावित नहीं होंगे। दूसरा, वैश्विक व्यापार समझौते को लेकर हो रही बातचीत का असफल होना। इससे विश्व के सबसे गरीब और हाशिये पर खड़े लोगों को वैश्विक उचित व्यापार पद्धतियों के विरोधी के तौर पर देखा जा रहा है।  हमारी असली समस्या यह है कि हमारी आवाज दब गई है। हम वैश्विक मंच पर ये मसले उठा भी नहीं पा रहे हैं और न ही अपना पक्ष रख पा रहे हैं। सवाल है क्यों? इसकी वजह यह है कि वैश्विक मीडिया हमारी पहुंच से बाहर है, जो अपनी असहिष्णुता और अपनी स्थिति को लेकर ही उलझा हुआ है। उसमें बाहर की आवाजों के लिए कोई जगह नहीं है। इसकी वजह यह है कि हमारा अनुसंधान अपर्याप्त है। इस मामले में हम खुद दुनिया से कटे हुुए हैं। हमारे सोशल मीडिया से निकलने वाली खबरों की दुनिया में मौसम जैसी खबरों की कोई जगह नहीं है। वर्ष 2018 में हमें इस चुनौती पर चर्चा करनी चाहिए। हम अपनी दुनिया का इतना ध्रुवीकरण नहीं कर सकते कि हम बाहर हो रहे बदलावों को भांप भी न सकें। 
 
यह कहने की जरूरत नहीं है कि शहरी भारत मौसमी बदलावों और प्रदूषण से इतना प्रभावित नहीं हुआ है। इस मामले में शहरी और ग्रामीण भारत के बीच कोई खाई नहीं है। लेकिन यह साफ है कि ग्रामीण संकट बढऩे से आवास, पानी, सीवेज, कूड़ा, और प्रदूषण जैसी शहरी दिक्कतों में और इजाफा होगा। अगर मौसम और अन्य वजहों से कृषि क्षेत्र का संकट बढ़ता है तो लोग रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ कूच करेंगे। यह कहा जाता है कि पिछले एक दशक में भारत की शहरी आबादी में भारी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन परिभाषाओं और गिनती के अभाव में हम यह नहीं जानते हैं। ग्रामीण और शहरी भारत आपस में जुड़ा हुआ है। इनमें कोई खाई नहीं है। यह 2018 की चुनौती है और हम यहां पहुंच चुके हैं। 
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण,,
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