बिजनेस स्टैंडर्ड - पश्चिमी सोच में रंगे हमारे पूर्वग्रह
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पश्चिमी सोच में रंगे हमारे पूर्वग्रह

अजित बालकृष्णन /  January 01, 2018

परित्यक्तों, छोटे कारोबारों और ब्लॉकचेन रिकॉर्ड के संदर्भ में हमें पश्चिमी सोच से परे देखने की जरूरत है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजित बालकृष्णन

 
पिछले महीने वाराणसी की अपनी पहली यात्रा से लौटते समय जब मैं हवाईअड्डे पर स्थित किताबों की दुकान पर सरसरी नजर दौड़ा रहा था तो एक किताब को देखते ही मेरी आंखों में चमक आ गई। इस किताब ने अपनी जिंदगी में बनाई मेरी कई अवधारणों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।  लेकिन पहले इसके संदर्भ की बात करते हैं। मैं हमेशा से कुत्ते पालने का शौकीन रहा हूं। मुंबई में आशियाना बनाने के साथ ही मैंने डैकसंड नस्ल के एक कुत्ते को गोद लिया था। कुत्ता पालनेे के किसी भी दूसरे शौकीनों की तरह मैं भी इस छोटे कुत्ते को सुबह और रात में बाहर घुमाने ले जाता था, उसकी खिलाता-पिलाता था, उसने नहलाता था और हमारे बिस्तर पर भी वह साथ में ही सोता था। जब एक दशक बाद उसकी मौत हो गई तो मैं बीगल नस्ल के एक और कुत्ते को लेकर आया। वह भी मेरे पास करीब दस साल रहा था और उसके नहीं रहने पर मैं बासेट हाउंड नस्ल के 'चर्चिल' को अपने घर ले आया था। जब एक दशक बाद चर्चिल भी हमारा साथ छोड़कर चला गया तो हमने एकदम नया काम किया। उस बार हमने अलीबाग इलाके में घूमते हुए मिले एक परित्यक्त कुत्ते को अपनाया था। इस तरह के कुत्तों को 'पाई' या 'परिआ' भी कहते हैं क्योंकि उनकी कोई खास नस्ल नहीं होती है। माना जाता है कि ऐसे कुत्ते शुद्ध नस्ल वाले कुत्तों के अनियोजित संसर्ग का नतीजा होते हैं।
 
हम जिस संकर कुत्ते को अपने घर लेकर आए थे वह एक मादा थी और हमने उसका नाम जिलजिल रखा था। उसमें कुछ बेहद अलग आदतें थी, जैसे वह मेरे पिछले कुत्तों की तरह मांस नहीं खाती थी। दूसरा, हमारे दरवाजे पर लगी घंटी बजते ही वह काफी सक्रिय हो जाती थी और हरेक को संदेह की नजर से देखती थी जबकि मेरे पुराने कुत्ते तो हरेक मेहमान का स्वागत करने को तैयार रहते थे। तीसरा, जब मैं बैठकर किताब पढ़ रहा हूं या ड्रिंक ले रहा होता था तो उस समय जो कोई भी मेरे नजदीक आने की कोशिश करता था तो जिलजिल आक्रामक हो जाती थी। मेरे जैसे तमाम कुत्ता-प्रेमियों का मानना था कि पपी जिलजिल की ठीक से देखभाल नहीं होने से उसका बरताव ऐसा हो गया था। इसके अलावा जिलजिल की जो पूंछ रस्सी की तरह पतली होती थी, वह कुछ हफ्तों में ही किसी पंखे की तरह घनी हो गई थी। आम तौर पर ऐसा शुद्ध नस्ल वाले कुत्तों में ही होता है। फिर हमने यही अंदाजा लगाया था कि जरूर जिलजिल के पुरखों में से किसी बढिय़ा नस्ल का घनी पूंछ वाला कुत्ता रहा होगा।
 
लेकिन जब मेरे हाथ में वाराणसी हवाईअड्डे पर वह किताब आई तो मेरी ये सारी धारणाएं खंडित होती हुई नजर आने लगीं। एस थियोडर भास्करन की लिखी किताब 'द बुक ऑफ इंडियन डॉग्स' के शुरुआती पन्नों में ही मुझे एक ऐसे कुत्ते की तस्वीर दिखी जो हूबहू जिलजिल जैसा था। किताब में उसे 'बखरवाल' नस्ल का कुत्ता बताया गया था। लेखक के मुताबिक आम तौर पर गुज्जर जैसे चरवाहा समुदाय के लोग अपने मवेशियों की सुरक्षा बखरवाल नस्ल के कुत्तों का इस्तेमाल करते थे। साफ है कि यह पूरी तरह भारतीय नस्ल के कुत्ते होते हैं, न कि किसी विदेशी नस्ल के कुत्तों की संकर प्रजाति। उस समय मेरे जेहन में यह सवाल उठा कि जिलजिल की मांस खाने के प्रति अनासक्ति की वजह कहीं उसके पुरखों का बकरियों और भेड़ों की रखवाली करने के नाते पैदा हुआ लगाव ही तो नहीं था।
 
हवाईअड्डे पर उस किताब के पन्ने पलटते समय मैं एक तरह से अचंभित हो चुका था। पालतू कुत्तों के बारे में मेरी कई धारणाएं एक-एक कर खंडित हो रही थीं। मुझे यह भी पता चला कि कुत्तों को पालतू बनाने की शुरुआत आम धारणा के मुताबिक यूरोप से नहीं हुई थी। कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने 38 देशों के करीब 5,000 कुत्तों का डीएनए अध्ययन करने के बाद यह नतीजा निकाला है कि कुत्तों को पालतू बनाने की शुरुआत मध्य एशिया खासकर मंगोलिया और नेपाल के बीच वाले इलाके में हुई थी। मोहनजोदड़ो की खुदाई में पट्टïा पहने हुए कुत्तों की टेराकोटा मूर्तियां भी मिली हैं। इससे पता चलता है कि संभवत: पालतू कुत्ते का वजूद भारत में 3,500-1,700 ईसा पूर्व के काल में भी था।
 
उसी समय मैं यह सोचने के लिए मजबूर हो गया कि बिल्कुल सच मानी जाने वाली हमारी कितनी धारणाएं पश्चिमी मान्यताओं की सोचे-समझे बगैर की गई नकल मात्र हैं। मसलन, आज के समय में बड़े-बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर की मौजूदगी को आधुनिकता की निशानी माना जाता है जबकि हमारे यहां की सर्वव्यापी किराना दुकानों को तुच्छ किस्म के 'आवारा' कुत्तों की तरह देखा जाता है। इसी तरह विदेशी पैसे पर चल रहीं ई-कॉमर्स कंपनियों के फुटबॉल के आकार वाले गोदामों को भी प्रगति की निशानी के तौर पर देखा जाता है। क्या यह संभव है कि डैकसंड ंह, बीगल और बासेट हाउंड जैसे कुत्तों की तरह विशालता और लंबवत एकीकरण भी विकास और समसामयिकता के महज भ्रम हैं? 
 
इंटरनेट की शुरुआत के समय इसे जनसमूहों को मिलने वाले एक ऐसे हथियार के तौर पर देखा गया था जो उन्हें विकेंद्रित तरीके से अभिव्यक्ति की आजादी देगा। माना गया था कि इंटरनेट के आने से कुछ गिने-चुने 'संपादकों' के नियंत्रण में चलने वाले केंद्रीकृत सूचना भंडारों पर लगाम लगेगी। फिर आपके जेहन में यह सवाल खड़ा हो सकता है कि इंटरनेट ने खुद को इतनी जल्दी एक ऐसे उद्योग में कैसे तब्दील कर लिया है जिसमें विजेता को ही सारा हिस्सा मिलता है? आज अमेरिका की चार-पांच बड़ी कंपनियों का ही समूची इंटरनेट दुनिया पर वर्चस्व है। इसका जवाब संभवत: मध्यकालीन वित्तीय प्रणाली में है जो मध्यकाल की ही उस सोच पर काम करती है कि जीतने वाले के हिस्से में सबकुछ आएगा। विजेता को सबकुछ दिए जाने की यह विश्वास प्रणाली वर्तमान वित्तीय प्रणाली को अक्षुण्ण रखने में संकेद्रित भूमिका निभाता है। इसी तरह खोए-खोए रहने वाले नीति-निर्माता भी इसे स्तंभित होकर देखते हैं। उन्होंने अभी तक यह समझा ही नहीं है कि प्रमुख नियामकीय गतिविधि यह सुनिश्चित करने की है कि नेटवर्क इफेक्ट्स (किसी वस्तु या सेवा के अधिक इस्तेमाल से बढऩे वाला उसका मूल्य) से कुछ लोगों के प्रभुत्व की स्थिति न पैदा हो। हमारा प्रतिस्पद्र्धा कानून (मोटे तौर पर भारत में इस्तेमाल होने वाला आर्थिक सिद्धांत) अब भी बीसवीं सदी के मध्य के औद्योगिक काल में उलझा हुआ है। हमारे सभी आर्थिक सिद्धांतकारों और नियामकों को नेटवर्क इफेक्ट्स के पीछे के आर्थिक सिद्धांत को समझने के लिए खुद को उन्नत करने की जरूरत है।
 
भारत का भविष्य इसके करीब पांच करोड़ सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम इकाइयों (एमएसएमई) में छिपा हुआ है। ये इकाइयां विनिर्माण और सेवा दोनों क्षेत्रों में काम करती हैं लेकिन उन्हें आर्थिक पैमाने पर तुच्छ ही माना जाता है। इन इकाइयों को 'आधुनिक' बनाने के लिए उनका 'पंजीकरण' करने का तरीका गलत है। अगर उन्हें पंजीकरण के लिए बाध्य किया जाता है तो एमएसएमई क्षेत्र निचले स्तर की नौकरशाही की उगाही की जद में आ जाएगा। उनकी मदद का सही तरीका यह है कि उनके नियमन के लिए जल्दी से ब्लॉकचेन जैसी प्रणाली तैयार की जाए। यह एक ऐसी नियमन प्रणाली होगी जिसमें घटनाओं को दर्ज कर और अन्य प्रबंधकीय गतिविधियों के विवरण की मदद से विकेंद्रित सहमति बनाई जा सकती है। इस तरह शिनाख्त प्रबंधन, लेनदेन की प्रक्रिया और विवरणिका उद्गम का रिकॉर्ड रखना आसान होगा। लेकिन केंद्रीकृत नौकरशाही के जरिये ऐसा नहीं किया जा सकता है।
Keyword: MSME, SME, india,,
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