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तनातनी दूर होने से ही पूरी होगी त्वरित न्याय की आस

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  December 31, 2017

सरकार और न्यायपालिका के बीच तनातनी की स्थिति दशकों पुरानी बात है। इसका नतीजा यह हुआ है कि लाखों लोगों को न्याय पाने के लिए वर्षों से अदालतों के दरवाजे पर इंतजार करना पड़ा है। भीड़ भरी जेलों में भी बंद हजारों विचाराधीन कैदियों को अदालती सुनवाई शुरू होने की बाट जोहनी पड़ती है। कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव के चार मुख्य बिंदु रहे हैं। इन मुद्दों का समाधान नहीं निकाले जाने तक न्याय प्रणाली में गिरावट जारी रहेगी। देश के कई मुख्य न्यायाधीश इस बारे में चेतावनी देते रहे हैं।

 
पहला मसला उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण संबंधी मामलों पर नियंत्रण के लिए दोनों के बीच जारी तनातनी से जुड़ा है। उच्चतम न्यायालय ने शीर्ष अदालतों में नियुक्ति के लिए न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन संबंधी अधिनियम को वर्ष 2015 में निरस्त घोषित कर दिया था। वह चाहता था कि शीर्ष न्यायिक पदों पर नियुक्ति के संबंध में बनी 22 साल पुरानी कॉलेजियम व्यवस्था को ही कुछ पारदर्शिता के साथ बरकरार रखा जाए। उसने नियुक्ति प्रक्रिया संबंधी ज्ञापन पर सरकार और न्यायपालिका के बीच सहमति बनाने का प्रस्ताव भी रखा था। लेकिन तीन साल बाद भी इस पर कोई सहमति नहीं बन पाई है।
 
इसका भविष्य पर गहरा असर पडऩे वाला है। उच्चतम न्यायालय में फिलहाल न्यायाधीशों के छह पद रिक्त हैं और नए साल में सात और न्यायाधीश भी सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसे में जल्दी नियुक्ति नहीं होने पर 31 न्यायाधीशों की कुल क्षमता वाली सर्वोच्च अदालत में करीब आधे पद रिक्त हो जाएंगे। नियुक्ति प्रक्रिया संबंधी ज्ञापन पर गतिरोध कायम रहने से ही न्यायिक नियुक्तियों में देरी हो रही है। देश के 24 उच्च न्यायालयों में भी 1,079 स्वीकृत पदों में से 400 से भी अधिक न्यायिक पद रिक्त चल रहे हैं। कई उच्च न्यायालयों में तो मुख्य न्यायाधीश भी नियुक्त नहीं हैं, लिहाजा उन्हें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीशों से काम चलाना पड़ रहा है। निचली अदालतों की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है।
 
न्यायाधिकरणों के मामले में तो स्थिति और भी खराब है। एक भी न्यायाधिकरण खोज पाना मुश्किल होगा जिसमें सभी पद भरे हों। सेवानिवृत्त नौकरशाहों और राजनीतिक रसूख रखने वाले लोगों के बीच इन पदों पर चल रही खींचतान के चलते कई अधिकरणों में आधे से भी अधिक पद खाली पड़े हुए हैं। इन अधिकरणों की वार्षिक रिपोर्ट में भी ढांचागत सुविधाओं एवं स्टाफ के लिए जरूरी फंड जारी करने में केंद्र एवं राज्य सरकारों की तरफ से  कोताही बरतने की बात कही जाती रही है। न्यायपालिका के लिए बजट निर्धारण भी लंबे समय से सरकार के साथ तनातनी की एक बड़ी वजह रही है। न्यायाधीशों ने कई बार इसे रेखांकित किया है कि बजट में न्यायपालिका के लिए केवल 0.2 फीसदी हिस्सा ही आवंटित होना बहुत कम है। कई बड़ी कंपनियों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की कीमत भी कई बार इस बजट आवंटन से अधिक होती है। राज्यों के बजट में भी न्यायिक गतिविधियों के लिए आवंटित राशि काफी कम होती है।
 
सरकार दर्जनों की संख्या नए कानून बना रही है लेकिन इन नए कानूनों से अदालतों पर पडऩे वाले बोझ और उसकी लागत को लेकर कुछ नहीं कहा गया है। मसलन, चेक बाउंस को जबसे आपराधिक कृत्य करार दिया गया है तब से निचली अदालतें इन मामलों से अटी पड़ी हैं। अदालतों में लंबित मुकदमों में सबसे बड़ा पक्षकार सरकार होती है लेकिन ये मामले कई बार लंबे समय तक लटकाए जाते हैं। अक्षमता या जानबूझकर देर करने की रणनीति के चलते ये मुकदमे लटकने के लिए अदालतें कई बार सरकार की कड़ी आलोचना भी कर चुकी हैं। 
 
वहीं सरकारोंं और कानून-निर्माताओं का कहना है कि अदालतें जनहित याचिकाओं के जरिये उनके कामकाज में दखल कर रही हैं। हालांकि न्यायाधीशों ने जनहित याचिकाओं पर अपने रुख को सही ठहराते हुए कहा है कि वे नागरिकों को संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों की गारंटी देने के लिए बाध्य हैं। न्यायपालिका के मुताबिक अगर कोई नागरिक जीवन एवं स्वतंत्रता, विचारों की अभिव्यक्ति और संंपोषणीय विकास जैसे मूलभूत अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत करता है तो जरूरी कदम उठाना उनका उत्तरदायित्व बनता है। वैसे इन याचिकाओं पर आए न्यायिक निर्देशों के अनुपालन में सरकार का रुख अक्सर टालमटोल करने का ही रहता है। पुलिस सुधारों की दिशा में प्रकाश सिंह मामले में 10 साल पहले आया फैसला इसका सटीक उदाहरण है।
 
दोनों के बीच कई बार अपने दायरे को लेकर भी तनातनी की स्थिति बनी है। देश की शीर्ष जांच एजेंसी सीबीआई को सत्ताधारी लोगों ने अपने फायदे के लिए गलत तरीके से काम करने के लिए बाध्य किया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि जैन हवाला केस, बोफोर्स केस और हाल ही में 2जी स्पेक्ट्रम जैसे चर्चित मामलों में अभियोजन पक्ष की दलीलें धराशायी हो गईं। कहा जाता है कि सत्ता में बैठे लोग अपने फायदे के लिए जांच को अपने हिसाब से मोड़ देते हैं जिससे अदालतों में सुनवाई के दौरान सीबीआई को मात खानी पड़ती है। ऐसा होने पर मीडिया के जरिये होने वाला ट्रायल ही हावी होने लगता है और इस स्थिति में सरकार को बढ़त मिल जाती है। आखिर अदालतें प्रतिक्रिया नहीं दे सकती हैं और न ही सूचनाएं बाहर आ सकती हैं।
 
सवाल यह है कि क्या सरकार के तीनों अंगों के बीच चल रही खींचतान कम होगी और वे न्यायिक प्रणाली को इस दलदल से बाहर निकालने के लिए मिलजुलकर प्रयास करेंगे? फिलहाल तो सरकार का ध्यान मुख्य रूप से कंपनी एवं वाणिज्यिक मामलों पर ही नजर आता है। लेकिन अदालतों के बाहर लगी आम लोगों की लाइन तो वैसी ही खड़ी है। ये लोग कुछ उसी धैर्य से न्यायिक सुधारों का इंतजार कर रहे हैं जो उन्होंने नोटबंदी के दौरान अपने पुराने नोट बदलते समय दिखाया था।
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