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आर्थिक सूचना के खुलासे कर-चोरों के लिए अभिशाप

पार्थसारथि शोम /  December 31, 2017

दुनिया भर में कर प्रशासन अघोषित संपत्ति का पता लगाने में विफल रहा है। ऐसे में लीक सूचनाएं काफी कारगर हो सकती हैं। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
सूचनाएं लीक करने का सबसे नया मामला 'द पैराडाइस पेपर्स' का है जिसमें विदेशी कानूनी फर्म ऐपलबी से मिले 1.34 करोड़ दस्तावेजों को जर्मनी के एक समाचारपत्र में प्रकाशित किया गया। इनमें अधिक मूल्य वाली करीब 1.20 लाख कारोबारी इकाइयों और शाही घरानों के सदस्य, राजनेता एवं अन्य हस्तियों के निवेश एवं फंडिंग ढांचे से जुड़ी जानकारियां शामिल हैं। दुनिया भर के 380 खोजी पत्रकारों के समूह इंटरनैशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आईसीआईजे) की खोजपरक रपटों ने भारत समेत कई देशों को इनकी आधिकारिक जांच करने के लिए बाध्य कर दिया है। अभी तक एजेंडा तय करने वाले कारक के रूप में मीडिया संगठनों की भूमिका का पूरी तरह आकलन नहीं किया गया है लेकिन आईसीआईजे की यह पहल निश्चित रूप से इसकी बेहतरीन मिसाल नजर आती है। फोर्ड फाउंडेशन और प्यू जैसे संगठनों से मदद पाने वाले आईसीआईजे की रपटें बीबीसी, ली मोंड और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे समाचारपत्रों में प्रकाशित हुई हैं।
 
फिर भी, सवाल है कि लीक सूचनाओं की वैधता को किस हद परखा जा सकता है? इस पूरी प्रक्रिया में कितना वक्त लगेगा? यह ऐसी स्थिति है जिससे एक गंभीर शोधकर्ता को जूझना ही होगा। बोस्टन यूनिवर्सिटी की डाएन रिंग ने इस मसले पर अपनी सहयोगी शू-यी ओई के साथ अध्ययन किया है। शोध के इस नए क्षेत्र के बारे में अध्ययन रिपोर्ट 'लीक-ड्रिवेन लॉ' को हाल ही में लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में पेश किया गया। ऐसी जानकारियां लीक करने वाले लोग अधिकतर अनाम होते हैं। इनके अलावा हैकर भी ऐसी सूचनाएं जुटाने के महत्त्वपूर्ण स्रोत होते हैं। सूचनाएं लीक करने की प्रक्रिया में कई खामियां भी होती हैं जिसके चलते उन्हें अपूर्ण, गैर-विशिष्ट, गलत सकारात्मक और जोखिम से भरपूर बताया जाता है। आईसीआईजे ने पनामा पेपर्स पर खुलासा करते समय उसे 'धुंधले ढांचों के असली मालिक' बताया था। उनमें दुनिया भर के 21 देशों में मौजूद 2.14 इकाइयों के अलावा एक लाख विदेशी इकाइयों का जिक्र था। पनामा की कानूनी फर्म मोसैक फोन्सेका से हासिल 1.15 करोड़ फाइलों के आधार पर वह रिपोर्ट तैयार की गई थी। लेकिन पनामा पेपर्स खुलासे में संदिग्ध कंपनियों के बैंक खातों, ईमेल और वित्तीय लेनदेनों के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी। इस अधूरेपन का जिक्र रिपोर्ट तैयार करने वाले लेखकों ने भी किया था। लगता है कि आईसीआईजे ने अपने पास उपलब्ध सूचनाओं का छोटा हिस्सा ही जारी किया और खुद उसी ने तय किया कि किन सूचनाओं को सार्वजनिक करना है। क्या लोगों को सबसे ज्यादा अचंभित करने वाले बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया गया था? इसलिए इन खुलासों में निहित जोखिम को भी समझना काफी जरूरी है। पहला, गोपनीय सूचनाओं के खुलासे के पीछे का एजेंडा क्या हो और उसे कब जारी किया जाए? किन आंकड़ों को किस हद तक सार्वजनिक करना है और कौन सी ऐसी सूचना है जिसे जारी नहीं करना है? दरअसल कर अधिकारियों के पास खुद भी कई स्तरों से सूचनाएं पहुंचती हैं। 
 
दूसरा, खुलासे का एजेंडा और उसके हितों के हिसाब से खास माध्यम भी चुनने पड़ते हैं। इस तरह खुलासे का माध्यम सरकार या समाचारपत्र होने से उनके असर और गतिशीलता में अंतर देखने को मिलेगा। सरकार की तरफ से उठाए जाने वाले कदमों और मीडिया संगठनों के बीच एक जटिल अन्योन्याश्रयी संबंध है और उसी को ध्यान में रखते हुए खुलासे का माध्यम तय किया जाता है। सार्वजनिक आंकड़ों का वैश्विक स्तर पर इस्तेमाल भी काफी हद तक इसी पर निर्भर करता है। मसलन, ग्राहकों के अघोषित खाते पाए जाने वाले एचएसबीसी बैंक के मामले में फ्रांसीसी अधिकारियों ने डाटा के इस्तेमाल और दूसरे देशों को डाटा साझा करते समय गोपनीयता का आश्वासन दिया हुआ था लेकिन इस खुलासे में शायद ही कोई गोपनीयता बनी रह पाई।
 
और तीसरा, स्रोत की तरफ से सूचनाएं मुहैया कराए जाने और सरकारी एजेंसियों तक उनके पहुंचने में लगने वाला समयांतराल आंकड़ों के जारी होने के संभावित रणनीतिक समय पर भी सवाल खड़े करता है।
 
चौथा, आंकड़े लीक होने पर जबरदस्त और तात्कालिक असर होता है लिहाजा उनमें हंगामा-पसंद सरकारों और विवादप्रिय जनता के लिए जोखिम भी निहित होता है। दरअसल जनता व्यवस्थित तरीके से जुटाए गए आंकड़ों की तुलना में ऐसे खुलासों पर काफी त्वरित और तीव्र प्रतिक्रिया देती है।
 
पांचवां, इसकी वजह से कानूनी एवं प्रवर्तन एजेंसियों की बुरी तरह से लागू प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं। प्रतिभूति नियमन, वित्तीय नियमन और कंपनी शासन के अध्येताओं ने यह पाया है कि किसी संकटकालीन स्थिति में लागू किए गए कानूनों में जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया का असर होता है। कुछ हद तक ये सारे पहलू खुलासे की प्रवृत्ति के ही अंग हैं। यहां पर हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि अगर संस्थागत डाटा इतने अच्छे ही होते तो उनकी उत्पादकता इतनी धीमी क्यों होती? क्या कर प्रशासन के प्रति हमारा रवैया 'सोते हुए कुत्तों को मरने दो' वाला ही होता है? अगर ऐसा है तो क्या यह सुस्त रवैया लीक जानकारियों से जुड़ी लोकप्रिय सनसनी को और बढ़ाने का काम करता है?
 
असल में, नजरअंदाज नहीं की जा सकने वाली लीक जानकारियों के इस्तेमाल के कई फायदे भी हैं। जैसे, इन खुलासों से कर अधिकारियों को नई जानकारियों के संदर्भ में करदाताओं का मुफ्त ऑडिट करने का मौका मिल जाता है, सीमापार गतिविधियों के बारे में अधिक स्पष्ट तस्वीर नजर आती है, अन्य कर-चोरों की भी पहचान की संभावना बढ़ जाती है। सांख्यिकीय आंकड़ों की तुलना में कम व्यवस्थित होने के बावजूद क्या लीक डाटा अधिक एवं तीव्र कानूनी बदलावों की जमीन नहीं तैयार करता है? वहीं करदाताओं के लिहाज से देखें तो संभावित करचोरों को ऐसा करते समय बड़ी लागत लगानी होगी और अगर ऐसा होता है तो सूचनाएं लीक होने का सकारात्मक वितरण प्रभाव पडऩा चाहिए।
 
इस तरह सरकार द्वारा इस लीक जानकारी का इस्तेमाल करने की संभावना बढ़ जाती है लेकिन जब इनके आधार पर सरकार कर कानून में बदलाव या कर चोरों को गिरफ्त में लेने की कोशिश करती है तो कुछ बातों का ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए। खुलासे के बाद सोचे-समझे बगैर प्रतिक्रिया देने के बजाय तर्कसंगत प्रतिक्रिया देनी चाहिए, लीक डाटा का विवेकपूर्ण इस्तेमाल किया जाए ताकि छद्म सकारात्मक पक्षों को बाहर किया जा सके। पारदर्शिता के लिए प्रतिबद्धता और अन्याय एवं बदले की भावना को न्यूनतम किया जाए। किसी भी नए कर कानून के असर का तटस्थ विश्लेषण किया जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि पूर्व-निर्धारित लक्ष्यों को हासिल किया जा रहा है? कम लागत वाले और कम-आक्रामक विकल्पों पर भी विचार किया जाना चाहिए। 
 
निष्कर्षत: दुनिया भर में धन का संकेंद्रण बढऩे और छिपाकर रखी गई आय का पता लगाने और कर वसूलने में कर अधिकारियों की नाकामी सामने आने की बात को ध्यान में रखें तो यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि केवल व्यवस्थागत आंकड़ों के प्रयोग से ही कर चोरी और कर-वंचना को रोका जा सकता है। खातों की जानकारियां सनसनीखेज तरीके से लीक होने की प्रवृत्ति के आगे भी लोकप्रिय बने रहने की संभावना है क्योंकि इनसे दुनिया भर में राजस्व संग्रह बढऩे की उम्मीद बंधती है। वैसे उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में कर अधिकारियों की कोशिशों के अंजाम तक पहुंचने या राजनीतिक उपयोगिता के चलते इन्हें पहले ही रोक दिए जाने को लेकर अनिश्चितता बनी रहेगी। यहां पर कर विभाग पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है, उसके अधिकारी भी भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं और कई बार वे सत्ता में बैठे नेताओं के इशारे पर चलते हैं। ऐसे खतरों से बचने में किसी देश का क्रमिक आर्थिक विकास और नागरिक मामलों में दिखाई जाने वाली परिपक्वता ही अहम होगी।
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