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मेरे आंसुओं को समझ, मेरे लफ्जों में उलझ

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  December 29, 2017

आपके हिसाब से वर्ष 2017 का सही सियासी मिजाज बताने वाली तस्वीर कौन है? गुजरात में जीत के बाद कार से उतरते समय 'वी'  का निशान बनाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस का झंडा फहराने के दौरान गांधी टोपी पहने हुए राहुल गांधी, दलित समाज से संबंधित नए राष्ट्रपति, पंजाब में जीत दर्ज करने वाले अमरिंदर सिंह, हार के लिए ईवीएम को दोषी ठहराने वाले अरविंद केजरीवाल या फिर तमाम अंधविश्वास को दरकिनार कर नोएडा पहुंचने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। अगर आपको जटिलताएं पसंद हैं तो आप विजय रूपाणी के शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचे नीतीश कुमार की तस्वीर भी चुन सकते हैं। यह नीतीश ही थे जिन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोहों में मोदी को शामिल नहीं होने दिया था। वैसे आप दोबारा जेल जा रहे लालू प्रसाद की तस्वीर भी चुन सकते हैं। 

 
वैसे मेरे हिसाब से इस साल की सबसे अहम सियासी तस्वीर गुजरात में जीत के बाद हुई भाजपा संसदीय दल की बैठक की है जिसमें भाषण देते समय मोदी भावुक हो गए थे। मैंने इस तस्वीर को इसलिए चुना है कि 2017 की सियासत को बखूबी बयां करने वाली यह तस्वीर 2018 की राजनीति को भी तय करेगी और 2019 में होने वाले महासंग्राम की भी आधारशिला रखेगी।  दूसरे प्रधानमंत्रियों की तुलना में मोदी अपने सच्चे मनोभावों को सीने में दबाकर रखने में काफी हद तक सफल रहे हैं। सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी काफी सोची-समझी होती है और भावनाओं का प्रदर्शन तो और भी सजग होता है। संसदीय दल की बैठक में वह जिस तरह भावुक नजर आए वह तो स्वत:स्फूर्त ही लग रहा था। अगर मैं थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर कहूं तो वह भावनाओं का नियंत्रित उद्गार था।
 
प्रधानमंत्री को गुजरात अभियान के बीच में ही अहसास हो गया था कि इस बार लड़ाई तगड़ी है। नवंबर के अंत तक यह चुनाव लोगों की सोच से भी अधिक करीब चल रहा था। अगर नजदीकी मुकाबले वाली कुछ सीटें दूसरी तरफ चली जातीं तो भाजपा के पास बहुमत होते हुए भी उसे काफी नुकसान होता। इससे संक्रमण काल से गुजर रही कांग्रेस को काफी मजबूती मिलती और वह भाजपा-विरोधी दलों को एक पाले में लाने के लिए चुंबक का काम करती। नीतीश जैसे नए सहयोगी भी डगमगा सकते थे। ऐसे में मोदी का भावुक भाषण राहत की अभिव्यक्ति होने के साथ ही गुस्से को भी बयां करता है। संभवत: यह गुस्सा ही उनकी आगे की राजनीति की रूपरेखा तय करने वाला है। वैसे उनके गुस्से की वजह समझी जा सकती है। भले ही उनकी पार्टी 22 साल से सत्ता में होने के नाते सत्ता-विरोधी रुझानों को इस कड़े मुकाबले के लिए जिम्मेदार बता रही हो लेकिन मोदी इस भ्रम में नहीं पड़ सकते हैं। वह जानते हैं कि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात में पहला विधानसभा चुनाव हुआ था। ऐसे में सत्ता-विरोधी रुझान का कोई मायने नहीं रह जाता है। मोदी के दिल्ली आने के साढ़े तीन साल के भीतर ही भाजपा ने गुजरात में मामला हाथ से काफी हद तक निकल जाने दिया। इस दौरान दो मुख्यमंत्री बने और दोनों ही खास प्रभावी नहीं साबित हो पाए। जाति-आधारित जनांदोलनों को भांपने और उन पर काबू पाने में पार्टी और राज्य सरकार दोनों नाकाम रहे। 
 
किसानों का गुस्सा ऐसे स्तर तक पहुंच चुका था कि मोदी के लिए उसे झेल पाना आसान नहीं था। मोदी को नापसंद करने वाले नेताओं की एक नई जमात खड़ी हो गई है जबकि कांग्रेस के नेता भी उन्हें लेकर विस्मित रहते आए हैं। यह सब उस राज्य में हुआ जहां से प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह दोनों आते हैं। अगर प्रधानमंत्रित्व काल के चौथे वर्ष में भी वह गुजरात को लेकर निश्चिंत नहीं हो सके और भाजपा आसान जीत का तोहफा नहीं दे सकी तो फिर गुस्सा करना सही था। 
 
दरअसल मोदी को इसके गहरे मायनों का बखूबी अहसास है। कुल आर्थिक वृद्धि खुशनुमा अहसास देने वाले स्तर से लगातार नीचे चल रही है। बेरोजगारी का दंश झेल रहे युवा भी किसानों की ही तरह तनाव के दौर से गुजर रहे हैं। हालांकि अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार तेज करने का कोई तात्कालिक समाधान नहीं है। अगर आर्थिक वृद्धि में तेजी आती भी है तो युवाओं को बड़ी संख्या में रोजगार दिलाने के लिहाज से काफी देर हो चुकी होगी। मोदी के लिए तो ये युवा ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी रहे हैं। आने वाले साल में वह इन सभी चिंताओं को स्वर देते हुए नजर आ सकते हैं और इसी से उनकी भावी राजनीति की इबारत तय होगी। उन्हें पता है कि अगर नए जातिगत समूहों के चलते गुजरात में उनकी पकड़ ढीली पड़ती है तो उन्हें आगे भी चुनौती दी जा सकती है। गुजरात में मिली आंशिक कामयाबी को उनके विरोधी अब हर जगह अपनाने की कोशिश करेंगे। 
 
अब उत्तर प्रदेश के बजाय गुजरात का चुनाव ही भावी राजनीति को आकार देगा। मोदी और शाह का राज्य होते हुए भी भाजपा को यहां कड़ा मुकाबला झेलना पड़ा जबकि उत्तर प्रदेश में वह त्रिकोणीय मुकाबले में काफी हद तक अलोकप्रिय नेताओं से मुकाबला कर रही थी।  मोदी इस करीबी मुकाबले से कुछ निष्कर्ष निकालेंगे जो 2019 के आम चुनाव और उससे पहले 10 राज्यों में होने वाले चुनावों के लिहाज से अहम होंगे। पहला सबक थोड़ा पुराना है। जब भी हिंदू एक साथ मतदान करते हैं तो भाजपा जीतती है जबकि बड़ी जातियों के आधार पर मतदान उसे नाकाम बनाता है। वैसे छोटे जातीय समूहों के असर को अमित शाह अपनी चतुराई से कम कर सकते हैं। लेकिन हमारी चुनावी राजनीति का मूल मुद्दा यह है कि क्या आप जातिगत आधार पर बंटे समाज को धर्म के धागे से सील सकते हैं? कांग्रेस ने जिग्नेश, अल्पेश और हार्दिक की मदद से गुजरात को लगभग जीत ही लिया था। ऐसे में मोदी-शाह इसका दोहराव नहीं देखना चाहेंगे। लिहाजा हिंदुत्व के सहारे ध्रुवीकरण बढऩे की उम्मीद है।
 
तीन तलाक को गैरकानूनी ठहराने वाला विधेयक इस तरफ उठी पहली चाल है। राहुल गांधी इसका जवाब मंदिरों के दर्शन से देंगे लेकिन इस विधेयक का विरोध करने के लिए तीक्ष्ण राजनीतिक प्रतिभा की जरूरत होगी ताकि अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण का आरोप भी न लग पाए। कर्नाटक में टीपू सुल्तान यह काम कर सकते हैं जबकि राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी ऐसे मुद्दे खोज  लिए जाएंगे। भले ही भाजपा 'विकास' का नारा देगी लेकिन उसे भी अब यह मालूम है कि अर्थव्यवस्था से न तो रोजगार पैदा होंगे और न ही उसे वोट मिल पाएंगे। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सियासी ईंधन बचा हुआ है। लिहाजा विमर्श का मुद्दा बदला जाएगा। बड़ी शख्सियतों पर कार्रवाई और छापे बढऩे के साथ कुछ कारोबारी समूहों को दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। हालांकि 2जी मामले में आरोपियों के बरी होने से मोदी की भ्रष्टाचार-विरोधी छवि को ठेस पहुंची है लेकिन खुद उनकी और सरकार की छवि अभी तक भ्रष्टाचार के आरोपों से बेदाग है। सरकार पर हाल में लगे आरोप टिक नहीं पाए और 'अदाणी-अंबानी सरकार' का जुमला रिट्वीट तो दिला सकता है वोट नहीं। ऐसे में अगर सरकार नए जोश से भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान नहीं चलाती है तो अचरज होगा। 
 
हालांकि चुनावी राजनीति में जिताऊ समीकरण तो धर्म और राष्ट्रवाद का मेल ही है। खासकर राष्ट्रवाद के नाम पर बेशुमार घटनाएं देखने को मिलेंगी। इतिहास बताता है कि संकट के दौर में पूरा देश एक नाकाम या नकारा सरकार के पीछे भी खड़ा रहा है। वाजपेयी और मनमोहन सिंह इसके ताजा उदाहरण हैं जिन्हें करगिल युद्ध और 26/11 हमलों के बाद हुए चुनावों में दोबारा जीत मिली। पाकिस्तान के साथ संकट को बढ़ाया जा सकता है जिसमें टीवी चैनल का 'कमांडो' शोर भी मददगार होगा। लेकिन चीन के बारे में ठोस समझ नहीं होने से हालात उलझ सकते हैं। कोई नहीं जानता कि डोकलाम या अन्य जगहों पर बर्फबारी होने पर उसका रवैया क्या होगा? सीमा पर हालात काबू में रहने तक कोई भी संकट सरकार के लिए बढिय़ा ही रहेगा। वैसे आक्रामक राष्ट्रवाद और अपनी सामरिक सीमाओं के बीच तालमेल बिठाने में लगी मोदी सरकार के लिए यह मसला चुनौतीपूर्ण हो सकता है। धर्म, राष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार भाजपा की आगामी चुनावी राजनीति के तीन इंजन होंगे। बीच-बीच में विकास, रोजगार और अच्छे दिनों के बारे में भी सुनने को मिलेगा। लेकिन ये नारे महज उत्तर-चिंतन होंगे। मोदी की नम आंखों से भरा चेहरा उनके बाकी कार्यकाल को लेकर कुछ ऐसी ही तस्वीर दिखा रहा है। 
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