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दूरगामी फैसलों के लिए 2017 रहेगा कारोबार जगत को याद

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  December 28, 2017

साल 2017 खत्म होने वाला है। कारोबारी गतिविधियों को प्रभावित करने वाली प्रमुख कानूनी घटनाओं पर नजर डालने का यह माकूल मौका है। तीन कानूनी मामले तो कारोबार जगत पर दीर्घकालिक असर भी डाल सकते हैं।   साल के अंतिम महीने में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले (या अब हमें इसे 'कथित घोटाला' ही कहना चाहिए?) पर आया विस्मयकारी फैसला सबसे पहले स्थान पर है। सर्वोच्च न्यायालय के दो सदस्यीय पीठ ने 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंसों को निरस्त कर न्यायिक हस्तक्षेप का उत्कृष्टï उदाहरण पेश किया था। न्यायालय ने राष्ट्रपति की तरफ से विचार के लिए भेजे गए मामले में कहा था कि देश के प्राकृतिक संसाधनों के वितरण की नीति बदली जानी चाहिए। हालांकि उसने यह साफ कर दिया था कि इस फैसले का 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन संबंधी अंतिम फैसले पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इतना जरूर हुआ है कि अब प्राकृतिक संसाधनों का लाइसेंस सर्वोच्च बोली लगाने वाले को ही मिलता है। जहां तक 2जी मामले पर सुनवाई करने वाली विशेष अदालत का सवाल है तो न्यायाधीश ने लंबी सुनवाई के दौरान हरेक ताकतवर आवेदक की विदेश जाने की अनुमति या जमानत को लेकर दाखिल अपीलों पर सख्त रुख अपनाया हुआ था। लेकिन अपने निर्णायक फैसले में उन्होंने कहा कि इसमें अपराध का कोई मामला ही नहीं बनता है। इस फैसले ने उन टिप्पणीकारों को अचंभित कर दिया जो यह मानकर चल रहे थे कि जब सर्वोच्च न्यायालय कुछ लोगों को अनुुचित बरताव का दोषी पा चुका है तो फिर इन मुख्य किरदारों का दोषी साबित होना महज औपचारिकता ही होगा। इस पर यही कहा जा सकता है कि भले ही सभी अपराधों में अनुचित बरताव निहित होता है लेकिन हरेक अनुचित कार्य का अपराध होना जरूरी नहीं है।

 
वैसे विशेष अदालत का फैसला भी कोई अंतिम फैसला नहीं है। इसके खिलाफ ऊपरी अदालतों में अपीलें होंगी। लेकिन इस फैसले ने उस उत्साह को फीका कर दिया है जिससे केंद्र की पिछली सरकार पर सियासी हमले किए जाते रहे हैं। अंतिम फैसला आने में तो कई साल लग जाएंगे। उस समय इस मामले की जितनी शिद्दत से पैरवी की जाएगी, वही इसके अंतिम नतीजे को तय करेगी। लेकिन इतना कहा जा सकता है कि यह एक ऐतिहासिक फैसला है। स्पेक्ट्रम लाइसेंस निरस्त करने से कारोबार जगत में अनिश्चितता बढऩे की बात कही गई थी। लेकिन इस मामले में आए फैसले से यह साफ हुआ है कि अनिश्चितता भी अनिश्चित हो सकती है।
 
बहरहाल इसका चमकदार पहलू यह है कि प्रत्यक्ष अनुपालन वाले कारोबार में सक्रिय नियामकों को अब यह समझ में आ जाएगा कि किसी मामले को लेकर अंतरिम आधार पर सख्ती बरतने का यह मतलब नहीं है कि वास्तव में कोई कानूनी उल्लंघन हुआ ही है। अगर देश के सबसे हाई-प्रोफाइल मामले में भी आरोपियों को बरी किया जा सकता है तो नियामकों को विचार के लिए आने वाले हरेक अद्र्ध-न्यायिक मामले को भी खुले दिमाग से परखने की जरूरत समझनी होगी।  दूसरा चर्चित मामला दिवालिया कानून का है। इस साल कारोबारी धारणा पर ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता ने सर्वाधिक असर डाला है। यह कानून अमल में आते ही तीव्र न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बन चुका है। कई मामले तो सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुंचे हैं। इस कानून में प्रावधान है कि अखबार बेचने वाला शख्स भी किसी कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू कर सकता है और कर्ज अदायगी में चूक करने वाली कंपनियों को घुटनों के बल ला सकता है। कारोबारी अनुबंधों के लिहाज से यह बढिय़ा कदम है। लेकिन कुछ अतिवादी उपाय इस कानून की मूल भावना को ठेस पहुंचा सकते हैं। इस कानून में अध्यादेश के जरिये यह प्रावधान जोड़ा गया है कि वसूली के संदर्भ में लिए जाने वाले बैंकों के फैसलों पर केंद्रीय बैंक लगाम रखेगा। अध्यादेश में यह भी जोड़ा गया है कि किसी चूककर्ता से दूर का संबंध रखने वाले व्यक्ति को भी देश में किसी भी कर्ज समाधान प्रक्रिया के अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।
 
इसी स्तंभ में इन दोनों प्रावधानों की अतार्किकता को लेकर पहले हम विश्लेषण कर चुके हैं लिहाजा उसे दोहराने की जरूरत नहीं है। मेरी राय है कि इन पर रवैया दुरुस्त करने की जरूरत है, खासकर दूसरे प्रावधान पर। लेकिन समर्थकों का कहना है कि मौजूदा दौर में इन अपूर्णताओं की जरूरत है और आगे चलकर इन्हें ठीक किया जा सकता है। अगर इन खामियों को ठीक नहीं किया जाता है तो दिवालिया कानून ही व्यर्थ हो जाएगा। अगर इसे सुधारा नहीं गया तो किसी दिवालिया संस्थान से जुड़ा व्यक्ति या कंपनी दुनिया में कहीं पर भी किसी कर्ज समाधान प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन सकता है। हम इस बारे में भय नहीं फैला रहे हैं, अध्यादेश लाने के पीछे की मंशा ही यही थी। तीसरा और अंतिम मामला धन विधेयक के इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है। संविधान में धन विधेयक के बारे में कोई भी फैसला करने का अधिकार लोकसभा अध्यक्ष को दिया गया है लेकिन इस साल एक बेहद अनूठी बात हुई। दरअसल संसद में पारित अधिनियमों के जरिये गठित तमाम न्यायाधिकरणों को वित्त विधेयक, 2017 के जरिये खत्म करने की बात कही गई थी। इस पर यह कहते हुए आपत्ति जताई गई कि सरकार इन अधिकरणों के उन्मूलन एवं विलय के लिए पिछले दरवाजे का इस्तेमाल कर रही है। अध्यक्ष ने इस वित्त विधेयक को 'धन विधेयक' करार दिया लेकिन अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाया गया है। संक्षेप में, धन विधेयक के इस्तेमाल को उसकी अधिकतम सीमा तक खींचा जा चुका है। वैसे हो सकता है कि आने वाले साल में हमें इसकी एक नई सीमा भी देखने को मिले। अगले साल के बजट के लिए वित्त विधेयक के प्रारूप पर चर्चा नॉर्थ ब्लॉक के गलियारों में शुरू हो चुकी है। ऐसे में हमें इस पर नजर बनाए रखनी होगी।
 
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
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