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वाजिब कीमत

संपादकीय /  12 27, 2017

ऐसे संकेत हैं कि वित्त वर्ष 2018-19 के लिए पेश होने वाला बजट किसानों पर केंद्रित हो सकता है। इस बजट में कृषि उत्पादों का बेहतर मूल्य दिलाने पर खास जोर रहने की संभावना है जो ग्रामीण इलाकों में चौतरफा व्याप्त आर्थिक असंतुष्टि को देखते हुए वाजिब भी है। लेकिन प्रमुख फसलों के विपणन में प्रभावी सहयोग देने के लिए सरकार जिन उपायों पर विचार कर रही है उनकी कामयाबी को लेकर खास भरोसा नहीं जग पा रहा है। एक उपाय यह है कि समर्थन मूल्य दिलाने के लिए बाजार में हस्तक्षेप का जिम्मा राज्यों पर ही डाल दिया जाए। इस दौरान किसी भी तरह का नुकसान होने पर केंद्र सरकार उसका 30 फीसदी बोझ भी उठाएगी। कुछ दालों, तिलहनों और प्याज जैसी प्रमुख सब्जियों के मामले में कमोबेश ऐसी ही व्यवस्था पहले से है जिसमें केंद्र 100 फीसदी तक नुकसान वहन करता है। लेकिन इसे भी कोई खास कामयाबी नहीं मिल पाई है। अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के दायरे में शामिल सभी कृषि उत्पादों के लिए यह लागू कर दिया जाता है तो उससे प्रदर्शन और खराब हो सकता है। इसके लिए बड़े पैमाने पर श्रमशक्ति और खरीदारी, परिवहन एवं भंडारण के लिए व्यापक ढांचा खड़ा करने की भी जरूरत पड़ेगी। संभवत: राज्य सरकारें इसका बोझ नहीं उठा पाएंगी।

 
गेहूं और चावल के लिए मूल्य समर्थन देने का दायित्व मूल रूप से केंद्र सरकार पर ही है लेकिन इन प्रमुख कृषि उत्पादों के लिए भी समुचित ढांचागत आधार अभी तक खड़ा नहीं हो पाया है। ऐसे में राज्यों से यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि वे केंद्र से बेहतर प्रदर्शन करें और शुरू से ही सटीक हों। किसी भी तरह भौतिक बाजार में हस्तक्षेप पर आधारित मूल्य गारंटी व्यवस्था प्रतिकूल नतीजों से परे नहीं है। गेहूं और चावल के संंदर्भ में ऐसा देखा भी जा चुका है। गेहूं एवं चावल की मूल्य गारंटी होने से इन फसलों का पूरा पैटर्न ही बदल गया है। अब अनाज मंडियों में निजी कारोबार लगभग खत्म हो चुका है और सरकार के पास अनाजों का भारी लेकिन गैरजरूरी भंडार खड़ा हो जाता है। ऐसे में बाकी फसलों के लिए भी उसी परिपाटी को अपनाना सही नहीं होगा। उत्पादन लागत कम कर और उत्पादों पर मिलने वाला रिटर्न बेहतर कर खेती को लाभपरक बनाना ही इस समस्या का टिकाऊ समाधान है। इसके लिए कृषि क्षेत्र के विपणन सुधारों को भी तेज करना जरूरी है। मंडियां बनाने के लिए निजी निवेश आकर्षित कर प्रतिस्पद्र्धा को बढ़ाया जा सकता है। इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म से होने वाला लेनदेन कृषि विपणन को काफी हद तक पारदर्शी बनाने का काम करेगा। 
 
दूसरा तरीका यह है कि एकदम नई व्यवस्था ही बनाई जाए। नीति आयोग के एक कार्यबल ने कृषि उत्पादों के बाजार मूल्य एवं एमएसपी मूल्य में मौजूद अंतर का भुगतान करने वाली प्रणाली अपनाने का सुझाव दिया है। मध्य प्रदेश में तो इसे लागू भी किया जा चुका है जबकि कुछ राज्य कपास की फसल के लिए इसे लागू करने की तैयारी में हैं। इस प्रणाली में पिछले कुछ वर्षों के बाजार मूल्य के आधार पर फसलों का आधार मूल्य तय किया जाता है और ये कीमतें मिलने में कोई भी कमी रह जाने पर उत्पादकों को उसकी भरपाई की जाती है। सरकारी खरीद का प्रावधान नहीं होने से इस प्रणाली को सभी इलाकों में और सभी फसलों के लिए लागू किया जा सकता है। इसमें हमें कृषि उत्पादों का भारी भंडार भी नहीं जमा करना पड़ेगा। ऐसी व्यवस्था का अतिरिक्त लाभ यह है कि इसमें बाजार की मांग का उत्पादन से संबंंध जोड़ा जा सकता है जिससे कुल उत्पादन एवं मूल्य स्थिरता के लिए जरूरी कृषि उत्पादों के बीच संतुलन साधने में भी मदद मिलेगी। कृषि उत्पादों के मूल्य-निर्धारण और उनके व्यापार से जुड़ी सुदृढ़ नीतियों की भी जरूरत है। मूल बिंदु यह है कि केंद्र को फसलों की वाजिब कीमतें दिलाने की व्यवस्था खड़ा करने की अगुआई खुद करनी चाहिए।
Keyword: budget, arun jaitley, agriculture,,
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