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विकल्प की गुंजाइश

संपादकीय /  December 26, 2017

मर्सिडीज-बेंज की भारतीय इकाई के मुख्य कार्यकारी रोलैंड फॉल्गर ने सरकार से अनुरोध किया है कि वह इलेक्ट्रिक वाहनों का दौर लाने में जल्दबाजी न करे। उनका यह बयान सरकार के उस संकल्प से आया है जिसके मुताबिक वर्ष 2030 के बाद भारत में केवल इलेक्ट्रिक वाहनों की ही बिक्री हो सकेगी। कुछ महीने पहले परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इलेक्ट्रिक वाहन लाने की समयसीमा आगे बढ़ाने के विचार पर संभावित विरोध को देखते हुए ऑटो उद्योग को 'जमींदोज' कर देने की धमकी दी थी। गडकरी समेत पूरी सरकार का परंपरागत ईंधन वाली गाडिय़ों के बजाय इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहित करना काफी हद तक न्यायसंगत भी है। दिल्ली जैसे शहरों में प्रदूषण अक्सर खतरनाक स्तर पर रहता है। इसके अलावा डीजल एवं पेट्रोल से चलने वाली कारों की संख्या काफी अधिक होने से शहरी जनसंख्या का सांस लेना भी दूभर होता जा रहा है। परंपरागत ईंधनों के आयात पर खर्च होने वाली बड़ी राशि भी चिंता का विषय है। इसके साथ ही स्वच्छ ईंधन एवं परिष्कृत इंजनों को बढ़ावा देने वाले किसी भी कदम को लेकर अनिच्छुक रवैया रखने की भी धारणा ऑटो उद्योग के बारे में बनी है।  

 
वैसे फॉल्गर के सुझाव पर गौर करने की भी कई वजहें हैं। केवल इलेक्ट्रिक वाहनों की ही बिक्री की नीति अपनाने के खिलाफ सबसे बड़ा तर्क यह है कि इस तरह का कोई भी फैसला अन्य एवं संभवत: बेहतर तकनीकी विकल्पों के लिए रास्ता बंद कर देगा। ईंधन के तौर पर हाइड्रोजन का इस्तेमाल करने का भी मुद्दा इससे जुड़ा हुआ है। उम्मीद है कि वर्ष 2040 तक दुनिया भर में कारें हाइड्रोजन से चलने लगेंगी। अगर हाइड्रोजन-चालित कारें अधिक कारगर विकल्प साबित होती हैं तो फिर इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए देश भर में चार्जिंग स्टेशन बनाने और अन्य जरूरी ढांचा खड़ा करने में लगने वाले भारी खर्च का भुगतान कौन करेगा? हालांकि मामला केवल हाइड्रोजन कारों की व्यवहार्यता या इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए जरूरी ढांचा तैयार करने पर होने वाले भारी खर्च से ही जुड़ा हुआ नहीं है। असली मुद्दा यह है कि भारत के नीतिगत ढांचे में इससे एक अंतर्निहित कठोरता भी आएगी जो अन्य ईंधन विकल्पों को पूरी तरह खारिज करेगी। 
 
अगर इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने की मुख्य वजह बढ़ता प्रदूषण है तो फिर सैन फ्रांसिस्को जैसे शहरों की तरह हमें शून्य उत्सर्जन को बढ़ावा देने वाली नीति अपनानी होगी और बाकी मसलों को बाजार पर छोड़ देना चाहिए। अगर हमारी सबसे बड़ी चिंता प्रदूषण ही है तो भारत के लिए इलेक्ट्रिक वाहन सर्वश्रेष्ठ विकल्प नहीं हैं। बेल्जियम जैसे देश में कम प्रदूषण विकल्प के तौर पर इलेक्ट्रिक वाहन सही हो सकते हैं क्योंकि वहां पर आधी से अधिक बिजली का उत्पादन परमाणु संयंत्रों से होता है। इसी तरह चीन भी बड़ी तेजी से अपने पुराने कोयला-आधारित संयंत्रों के स्थान पर गैस-चालित बिजली केंद्र लगा रहा है। लेकिन भारत में सौर बिजली की सीमित उत्पादन क्षमता और नाभिकीय ऊर्जा के नगण्य अनुपात को देखें तो बिजली की अधिकांश जरूरत कोयला-आधारित संयंत्रों से ही पूरी करनी पड़ेगी। भारत अपनी बिजली जरूरतें पूरा करने के लिए मुख्य रूप से कोयला-आधारित तापीय बिजली संयंत्रों पर ही निर्भर है जो बड़े पैमाने पर प्रदूषण फैलाते हैं। लेकिन इलेक्ट्रिक वाहनों की चार्जिंग के लिए बिजली की जरूरत बढऩे पर इस बात की कोई गारंटी नहीं होगी कि प्रदूषण का स्तर कम ही हो जाए। 
 
वास्तव में, इसकी भी आशंका है कि प्रदूषण का स्तर बढ़ जाए क्योंकि पेट्रोल, डीजल या संपीडित प्राकृतिक गैस (सीएनजी) की तुलना में एक यूनिट ऊर्जा पैदा करने में कोयला काफी अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करता है। स्पष्ट है कि स्वच्छ ईंधन की दिशा में कदम बढ़ाना एक निरपवाद लक्ष्य है लेकिन भारत के नीतिगत प्रारूप में अन्य समाधान के लिए भी स्थान होना चाहिए।
Keyword: vehicle, car, electric, petrol, diesel,,
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