बिजनेस स्टैंडर्ड - अफवाहों-अटकलों की जुबानी 2जी 'घोटाले' की कहानी
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अफवाहों-अटकलों की जुबानी 2जी 'घोटाले' की कहानी

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  12 25, 2017

फर्जी खबर की सटीक परिभाषा यह है कि कुछ गलत और/या सनसनीखेज सूचनाओं को तथ्यों पर आधारित बताते हुए पेश करना। आज दुनिया जिस 'फर्जी खबर' के दंश से पीडि़त है उनमें सनसनीखेज कवरेज, सामूहिक-निर्णय और सोशल मीडिया पर गरमागरम बहसों के जरिये गलत धारणाएं पैदा करने की कवायद अहम है। यह एक छोटी, सहज लेकिन हल्की पेचीदगी वाली खबर को बार-बार बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हुए बड़े घोटाले की शक्ल देने की कोशिश करता है। 

 
सभी देशभक्तों के लिए मेरे पास एक अच्छी खबर है और वह यह कि बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना असल में भारत की ही देन  है। लेकिन यह वैदिक काल जितना पुराना नहीं है बल्कि हाल के दौर की खोज है।  हम वर्ष 2010-2014 का दौर भूलने की जितनी भी कोशिश करें लेकिन उस समय को याद कर पाने वाले लोग एक महान लोकतंत्र में पहली बार रचे जा रहे ऐसे राजनीतिक विमर्श के गवाह बने जो गलत सूचना, भोलेपन और नजरिये की कमी के चलते विकृत होता चला गया। इनमें से कुछ भ्रमों को अब जाकर दुरुस्त किया जा रहा है लेकिन इसमें काफी देर हो चुकी है। निचली अदालत ने पूर्व संचार मंत्री ए राजा और अन्य आरोपियों को 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में भ्रष्टाचार के आरोपों से बरी कर इस दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
 
हमारे साथ वर्षों तक फरेब किया जाता रहा है। हमें यह बताया जाता रहा है कि संप्रग सरकार के समय लाखों करोड़ रुपये का भ्रष्टाचार हुआ था। हमें बताया गया कि यह भ्रष्टाचार सारी दुनिया को पीछे छोड़ देने वाला, अपनी तरह का अनूठा, अभूतपूर्व, असली और ठोस था। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रक्रियागत मनमानेपन को आधार बनाते हुए स्पेक्ट्रम लाइसेंसों का आवंटन निरस्त करने का फैसला दिया था लेकिन उसका इस्तेमाल इस धारणा को सही ठहराने के लिए ही किया जाता रहा जबकि शीर्ष अदालत ने इन संदिग्ध तथ्यों पर कोई फैसला नहीं दिया था। और इस धारणा को मजबूती देने वाले लोग कौन थे? 'जनहित के लिए समर्पित' सुब्रमण्यन स्वामी जैसे लोगों ने इसे एक चर्चित मुकदमे के रूप में तब्दील कर दिया। वहीं विनोद राय जैसे 'स्वतंत्र लोक सेवकों' ने इस 'घोटाले' को मीडिया के मनमाफिक ढालने का काम किया। 
 
किरण बेदी जैसे 'भ्रष्टाचार-विरोधी कार्यकर्ताओं' ने इसे खूब प्रचारित किया। और अर्णव गोस्वामी जैसे 'मुखर टीवी ऐंकरों' ने देश की तरफ से इन आरोपियों को सजा की मांग बुलंद की। यह समूची पारिस्थितिकी उस दिशा में काम कर रही थी जो निचली अदालत के न्यायाधीश के मुताबिक 'अफवाहों, गप्पबाजी और अटकलों के जरिये जन धारणा' बनाने की दिशा में काम कर रही थी। जबकि इस पारिस्थितिकी को कभी स्वतंत्र माना जाता था। हालांकि आज इस पारिस्थितिकी के अतीत और उसके झुकावों के बारे में स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो चुकी है। 2जी 'घोटाले' की सवारी करते हुए सत्ता तक पहुंचने वाली सरकार से स्वामी को कार, पद और सुरक्षा समेत बहुत-कुछ मिल चुका है। विनोद राय बैंक बोर्ड ब्यूरो का प्रमुख होने के अलावा भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का संचालन कर रही प्रशासकीय समिति के भी मुखिया हैं। किरण बेदी को भाजपा ने दिल्ली में अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था और अब वह एक राज्य की उप राज्यपाल हैं। गोस्वामी को भाजपा की अगुआई वाले राजग के ही एक सांसद की तरफ से अपना चैनल चलाने का मौका मिला है। सुनवाई अदालत के न्यायाधीश ने समूचे घटनाक्रम को कुछ इस तरह बयां किया है: 'कुछ लोगों ने चुनिंदा तथ्यों को चालाकी से रखते हुए और पहचाने न जा सकने वाले आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हुए एक घोटाले को जन्म दे दिया'। क्या अब भी हमें यह मानने में दिक्कत होगी कि हम इसकी चपेट में ले लिए गए थे?
 
मैंने अपने इसी कॉलम में कहा था कि भ्रष्टाचार को लेकर उपजे 'नैतिक संत्रास' ने मौजूदा समय के विमर्श को जहरीला बना दिया है। इसका मतलब है कि नोटबंदी जैसी पूरी तरह असमर्थनीय नीति को भी भ्रष्टाचार के खिलाफ उठाए गए कदम के तौर पर प्रचारित किया जा सकता है। यानी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण जैसे वास्तविक नीतिगत सुधार को अनिश्चितकाल के लिए टाला जा सकता है। 2010-14 के कालखंड में व्याप्त उन्माद को लेकर मैंने पहले भी कहा था कि वह इस मायने में गलत था कि 'उसमें भारत के लोगों को ही भ्रष्ट मान लिया गया था, न कि खराब तरीके से बनी संस्थाओं को।' उस खामी को अब पूरी तरह साफ देखा जा सकता है। हमने सत्ता में बैठे लोगों को तो बदल दिया है लेकिन कुछ और नहीं बदला है। इस दौरान भ्रष्टाचार के खिलाफ शोर मचे रहे समूचे परिवेश ने चुप्पी साध ली है। आखिर, इसका मिशन पूरा हो चुका है। 
 
यहां पर मेरी दो आपत्तियां हैं। पहली, संभव है कि इस फैसले को आगे चलकर पलट दिया जाए या फिर आरोपों के घेरे में आए लोक सेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के डरावने प्रावधानों के तहत अधिक सख्त आरोप पत्र दाखिल कर दिया जाए। हम इस बात को लेकर अटकलें नहीं लगा सकते हैं कि काल्पनिक रूप से ऐसा किए जाने की वजह क्या हो सकती है? लेकिन हमें इतना पता ही है कि फैसले में घटनाक्रम से संबंधित तथ्यों के जरिये रखे गए बिंदुओं को नहीं बदला जा सकता है।
 
फिलहाल तो हम सभी को यही उम्मीद करनी चाहिए कि 2जी आवंटन मामले को लचर आधार होते हुए भी 'घोटाला' बनाने में मदद करने वाला मीडिया और अन्य लोग अपनी भूमिका को लेकर मंथन करेंगे। उम्मीद करनी चाहिए कि इस मामले को सामूहिक-निर्णय, अटकलों, अफवाहों और आक्षेपों के प्रति एक चेतावनी के रूप में देखा जाएगा। वैसे सच यह है कि इन उम्मीदों के पूरा होने की संभावना कम ही है। लेकिन इस निर्णय में जिस तरह तथ्यों और तार्किकता का क्षणिक पक्षपोषण किया गया है उससे भी हमारी उम्मीदें कायम रहती हैं।
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