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'2जी स्पेक्ट्रम का मामला महज एक छलावा'

आदिति फडणीस /  12 24, 2017

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी उस संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के सदस्य भी थे जिसने दूरसंचार लाइसेंस एवं स्पेक्ट्रम के आवंटन एवं कीमतों से जुड़े मुद्दों की समीक्षा की थी। उन्होंने आदिति फडणीस को बताया कि 2जी स्पेक्ट्रम फैसले का असर बेहद व्यापक है। बातचीत के संपादित अंश: 

 
हमें 2जी स्पेक्ट्रम फैसले को किस तरह देखना चाहिए?
 
सीबीआई की विशेष अदालत का साफ निष्कर्ष यह है कि फैसला लेने की प्रक्रिया किसी गलत मकसद या किसी भी आरोपी को किसी तरह का आर्थिक लाभ देने के लिए नहीं शुरू की गई थी। 
 
लेकिन उच्चतम न्यायालय ने प्रक्रियागत खामियों के आधार पर ही अपने शुरुआती आदेश में लाइसेंसों का आवंटन रद्द कर दिया....
 
2012 में अपने फैसले में शीर्ष अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन के लिए नीलामी सबसे बेहतर तरीका है। शीर्ष अदालत का सम्मान करते हुए मैं यह कहना चाहूंगा कि यह सबसे सही कदम नहीं हो सकता है। अब विशेष अदालत के फैसले के बाद मुमकिन है कि शीर्ष अदालत के कुछ फैसलों की समीक्षा करने की पड़े। 
 
आप कह रहे हैं कि उच्चतम अदालत जैसे निष्कर्ष पर पहुंची उसके मुकाबले विशेष अदालत ने जिन सबूतों का आकलन किया वे ज्यादा वैध व अकाट्य हैं? 
 
ये दोनों अलग-अगल पहलू है। 1994 में निजी कंपनियों को सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य पर स्पेक्ट्रम देने की नीति तय की गई थी जो उस दौरान बनी दूरसंचार नीति के अनुरूप थी। निर्धारित मूल्यों पर स्पेक्ट्रम देने की नीति पर पी वी नरसिम्हा राव की सरकार, एच डी देवेगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल और छह सालों तक अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने भी अमल किया। इसके बाद मनमोहन सिंह की सरकार ने भी 8 सालों तक इसी नीति पर अमल किया। सरकार द्वारा निर्धारित मूल्यों पर स्पेक्ट्रम देने का ही नतीजा था कि आज देश में दूरसंचार घनत्व में बेहद तेजी से बढ़ोतरी के साथ-साथ दरों में काफी कमी देखी जा रही है। इसी वजह से दूरसंचार और खासतौर पर मोबाइल किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए किफायती हो गया है। वर्ष 2013 में उच्चतम न्यायालय ने अफने विवेक से यह फैसला लिया कि बाकी प्राकृतिक संसाधनों का पूरा आवंटन नीलामी के सिद्दांत पर ही आधारित हो। बाद में संप्रग और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के कार्यकाल के दौरान नीलामी भी हुई और अब ऐसी स्थिति देखी जा रही है जिसमें दूरसंचार क्षेत्र में बेहद दबाव है। दूरसंचार कंपनियां सरकार से राहत पैकेज की गुहार लगा रही हैं और यह रकम अनुमानत: 4-5 लाख करोड़ रुपये होगा। अब तर्क यह दिया जा रहा है कि अगर दूरसंचार क्षेत्र को राहत नहीं दी गई तो बैंकों पर दबाव बढ़ेगा और स्पेक्ट्रम नीलामी के लिए दिए गए सभी कर्ज फंसे हुए कर्ज (एनपीए) साबित हो सकते हैं। इसके बाद यह बुनियादी सवाल भी उठता है कि क्या सरकार का काम अपनी कमाई को अधिकतम स्तर पर लाना है? आप सार्वजनिक कल्याण के बड़े सवालों पर गौर करें। विशेष अदालत ने यह पाया कि निर्धारित कीमतों पर स्पेक्ट्रम का आवंटन करना कोई आपराधिक गलती नहीं थी और अब संभव है कि उच्चतम न्यायालय के फैसले की समीक्षा हो। पहले भी ऐसा हुआ है जब शीर्ष अदालत ने अपने ही फैसले की समीक्षा की है। 
 
इस कथित दूरसंचार घोटाले से कई लोगों का प्रदर्शन अच्छा हुआ। कई लोगों को नौकरी और रोजगार मिला। हमें इन बातों को किस तरह देखना चाहिए? 
 
सबसे पहले पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) विनोद राय को देश से इस 'मनोहर कहानी' के लिए स्पष्ट तौर पर माफी मांगनी चाहिए। सीएजी की अपनी रिपोर्ट में उन्होंने 1.76 लाख करोड़ रुपये के कथित नुकसान का आरोप लगाया और उसके साथ ही 2जी सर्कस की शुरुआत हो गई। पिछले सात सालों में लोगों की जिंदगी बर्बाद हुई है, प्रतिष्ठा पर दांव लगा है और भारत की छवि पर कीचड़ उछाला गया है। देश की जो अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी के झटके को सहने में सक्षम रही उसे पटरी से उतार दिया गया और यह सब आधे-अधूरे तरीके से तैयार की गई रिपोर्ट का नतीजा था। जेपीसी का सदस्य होने के नाते जिन्हें भी तीन दिनों तक विनोद राय से वृहद तरीके से पूछताछ का मौका मिला था उन सभी के साथ-साथ मुझे भी उस वक्त ऐसा ही लगा था कि यह रिपोर्ट पूरी तरह से रेत की नींव वाली इमारत साबित होगी। आखिरकार जनवरी 2014 में जेपीसी की रिपोर्ट पेश की गई जिसमें वास्तविकता का साक्ष्य दिया गया। आपके पास दंड न्यायालय भी है जिसने कहा कि लाइसेंस देने या स्पेक्ट्रम का आवंटन करने में कोई अपराध नहीं है। ऐसे हालात में अब यह जरूरी हो गया है कि विनोद राय ने सीएजी में अपने कार्यकाल के दौरान जितनी भी रिपोर्ट दी हैं उनकी समीक्षा करना और फिर से उनका ऑडिट करना जरूरी है क्योंकि अब यह स्पष्ट हो गया है कि इन रिपोर्ट को बुरे मकसद से आगे बढ़ाया गया। विडंबना की बात यह है कि सीएजी की जिस रिपोर्ट की वजह से पूरे घटनाक्रम की शुरुआत हुई उस दस्तावेज पर अभियोग पक्ष सात सालों की 2जी मामले की सुनवाई के दौरान निर्भर नहीं रहा। 
 
कई ऐसी कंपनियां हैं जिनका कहना है कि उनके साथ बुरा हुआ और भारत ने भी उनके साथ न्यायपूर्ण बर्ताव नहीं किया और मुमकिन है कि वे सरकार को भी अदालत में घसीटे या संभवत: मध्यस्थता करें....
 
सबसे पहला सवाल अपील का है। मुझे लगता है कि न्यायाधीश ने फैसला लिखकर सुनाया और जब तक उसकी स्याही सूखी भी नहीं थी कि सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने यह घोषणा कर दी कि वे उच्च न्यायालय में इस फैसले के खिलाफ अपील दायर करेंगे। बुनियादी सवाल यह है कि सीबीआई और ईडी कोई निजी वकील नहीं है। वे मध्यस्थता वाला फैसला नहीं कर सकते हैं। वे स्वतंत्र तरीके से काम करती हैं। जैन हवाला मामले में फैसले के बाद एक स्वतंत्र डायरेक्टोरेट ऑफ प्रॉसीक्यूशन बनाया गया जिन्हें इन एजेंसियों के लिए ही बनाया गया था। इन एजेंसियों में से जिन्होंने भी इन तीन फैसलों के बारे में पढ़ा होगा वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे होंगे कि फैसला एकपक्षीय था और इसके खिलाफ अपील करने की जरूरत है। प्रत्येक फैसले 1500 पन्ने से भी ज्यादा में लिखे गए। सीबीआई और ईडी ने इन फैसलों के खिलाफ अपील करने की घोषणा करने से पहले आखिर किस तरह की प्रक्रिया का अनुसरण किया?
 
क्या सिर्फ अपील करने के लिए ही अपील होगी?
 
यह पहला बुनियादी सवाल है और यह सवाल वे लोग पूछेंगे जिन्हें इस मामले में आरोपी बनाया गया था। दूसरी बाधा वाली बात यह है कि यह अपील दोषमुक्ति के फैसले के खिलाफ होगा जिसमें उच्च मानक वाले सबूत हैं ऐसे में बड़ी जिम्मेदारी के साथ इस पर कदम उठाना होगा। तीसरी बात क्षति, गलत इरादे से किए गए मुकदमे से जुड़ी है और जाहिर है कंपनियों को दोनों सरकारों से सवाल पूछने का अधिकार होगा और मुमकिन है कि वे उच्चतम न्यायालय के खिलाफ भी अपील कर सकती हैं कि उनका लाइसेंस बहाल किया जाए।
 
एक कॉरपोरेट संस्था के पक्ष में सारे फैसले तय कराने की जो पूरी कोशिशें हुईं, जिसे तय करने के टेप वाले साक्ष्य हैं..आखिर हमे उसे क्या समझना चाहिए?
 
यह बेहद समान्य बात थी। यह एक कॉरपोरेट जगत का जंग था। जिन्हें 1994-95 और 2001 में 1,651 करोड़ रुपये में लाइसेंस मिला उनसे पता था कि उनके लाइसेंस का नवीनीकरण 2015-16 या बाद में हो सकता है और उन्हें यह 2001 की कीमत पर नहीं मिल सकता है। जब नई कंपनियों को 2001 की कीमतों पर लाइसेंस मिला तो प्रतिस्पद्र्धी कंपनियों ने पूरा जोर लगाकर उन्हें बाहर करने की कोशिश की। इसी वजह से न्यायाधीश संभवत: इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पूरे तथ्य को इस कलाकारी के साथ पेश किया गया कि यह एक घोटाले की तरह नजर आए। ऐसे में इस कॉरपोरेट जंग में जानबूझकर या अनजाने में सीएजी ने अहम भूमिका निभाई। 
 
भविष्य में क्या द्रमुक अपनी राह बदल सकती है?
 
द्रमुक पहले भी काफी बदलाव की राह पर चली है। मुझे नहीं लगता है कि लोग राजनीतिक फैसला न्यायिक फैसले के आधार पर करते हैं। यह एक षडयंत्रकारी अवधारणा है कि द्रमुक को बचाने में सरकार की कोई भूमिका थी, यह बेबुनियाद बातें हैं। 
 
अब आपको क्या लगता है कि क्या होने वाला है?
 
सरकार चेहरा बचाने के लिए जल्द अपील दायर करने की कोशिश कर सकती है क्योंकि सरकार का 2014 का चुनावी अभियान संप्रग सरकार के खिलाफ 2जी और दूसरे कथित मामलों पर आधारित था। मुझे लगता है कि जो बरी हुए हैं अब वे जोरदार तरीके से इसका विरोध करेंगे। आने वाले वक्त में संघर्ष और भी अहम होगा।
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