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प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारों की बहाली का स्वर्णिम अवसर

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  December 24, 2017

पूर्व संचार मंत्री ए राजा और द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम की सांसद कनिमोई के 2जी मामले में बरी होने से इस पूरे मामले में राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के रवैये पर सवाल खड़े हो गए हैं। एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अगर आरोप पत्र में खामी थी तो संशोधित आरोप पत्र क्यों नहीं दाखिल किया गया? 2जी मामले में फैसला सुनाने वाले न्यायाधीश ने कहा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) इस मामले में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था। अब सभी इसी बात को लेकर माथापच्ची कर रहे हैं कि आखिर सरकार किस आधार पर विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ आगे अपील करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास प्रधानमंत्री कार्यालय के निहित अधिकार साबित करने का सुनहरा अवसर है, लेकिन यह अवसर उनके हाथ से फिसलता दिख रहा है। ऐसे में यह पूछा जाना लाजिमी है कि मोदी अब गंभीरता से आगे बढ़ेंगे या पहले की तरह ही रवैया रखेंगे? प्रधानमंत्रियों से गलतियां होती हैं, लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि इंदिरा गांधी को छोड़कर देश के  दूसरे प्रधानमंत्रियों ने कम से कम किसी मंशा के साथ गलतियां नहीं कीं। 

 
मोदी के पिछले साढ़े तील साल के कार्यकाल के बाद अब प्रतीत हो रहा है कि वह भी अब इंदिरा की राह पर चल रहे हैं। लोग अक्सर भूल जाते हैं कि जब 1977 में इंदिरा चुनाव में पराजित हुई थीं तब तक भारत में सरकार संचालन की बुनियाद हमेशा के लिए हिल चुकी थी। इंदिरा वाजिब अधिकारों की जद से बाहर निकलकर अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर रही थीं और यह विरासत वह छोड़ गईं। इंदिरा को यह बात कभी समझ नहीं आई कि शक्ति एक व्यक्ति के साथ होती है जबकि अधिकार पद के साथ टिका होता है। इंदिरा में इन दोनों के बीच अंतर समझने की बौद्धिक कुशलता भी नहीं दिखी। 
 
लिहाजा उन्होंने सत्ता से आई शक्ति का दुरुपयोग किया, जिससे उनके अधिकार की मर्यादा खंडित हुई और इसी का नतीजा था कि 1971 और 1977 के बीच उन्होंने कई गलतियां कीं। आज भारत का जो स्वरूप दिख रहा है उनके लिए पूरी तरह वह जिम्मेदार हैं। उन्होंने भारत की संरचना में एक ऐसा 'वायरस' छोड़ दिया, जिसे हटाने के सभी प्रयास विफल रहे हैं। भारत में सरकार संचालन के ढांचे में आईं विसंगतियों के लिए वह पूरी तरह जिम्मेदार थीं। बैंकों के राष्टï्रीयकरण (जिससे लोगों की बचत राजनीतिज्ञों के रहमो-करम पर टिक गई) से लेकर प्रीवी पर्स समाप्त करने और सरकार के प्रति अंध निष्ठïा रखने वाले नौकरशाह और न्यायापालिका को बढ़ावा देने से लेकर संविधान संशोधनों के जरिये भारत के मूलभूत ढांचे को विरुपित करने जैसे सभी कार्य इंदिरा ने किए।
 
'मेरा व्यक्तित्व और मेरे विचार'
 
सत्ता से भाजपा जब तक  बेदखल होगी (इसमें थोड़ा अभी समय लगेगा) तब तक सरकार संचालन से जुड़ी बुनियादी बातें भी मोदी के कारण बदल जाएंगी। मोदी भी सत्ता की शक्ति और अपने कार्यालय के निहित अधिकारों के बीच विभेद नहीं कर पा रहे हैं। अधिकारों की गरिमा बहाल करने और सीबीआई में आमूल-चूल सुधार लाने के लिए उन्हें अपने कार्यालय की पूरी ताकत का इस्तेमाल करना होगा। अंतत: यह एक प्रशासनिक मुद्दा बन जाता है।
 
अधिकार के संदर्भ में एक अन्य महत्त्वपूर्ण बात है हिंदुओं के गैर-हिंदुओं के प्रति व्यवहार को लेकर उनका रवैया। मोदी का संदेश अब तक आवश्यक असर नहीं छोड़ पाया है। मोदी को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है, जिन्होंने उतनी ही स्वतंत्रता के साथ अपनी राजनीति आगे बढ़ाने के लिए धर्म के नाम का सहारा लिया है, जितनी इंदिरा गांधी मिश्रित समाजवाद का चोला ओढ़कर अपनी राजनीतिक विधारधारा बढ़ाती दिखीं। इंदिरा गांधी की नजर में गरीबों के कल्याण के नाम पर अमीरों पर अधिक बोझ डालना जायज था। हालांकि यह अब भी स्पष्टï नहीं है कि गरीबों को इससे लाभ हुआ है या नहीं, लेकिन अब भी इस विचार का जबरदस्त राजनीतिक असर है। 
 
इसी तरह, मोदी भी यह विचार (अगर उन्होंने अपना रवैया नहीं बदला तो) जायज ठहरा सकते हैं कि हिंदुओं के लिए अल्पसंख्यकों के लिए चीजें तय करना बिल्कुल वाजिब है। इस मामले में यह स्पष्टï नहीं है कि उनकी पार्टी को छोड़कर इसका लाभ और किसे मिलेगा। इंदिरा गांधी के राजनीतिक सोच ने अर्थव्यवस्था को स्थायी चोट पहुंचाई, वहीं मोदी अपने विचारों से सामजिक ताने-बाने को स्थायी क्षति पहुंचा सकते हैं। इंदिरा गांधी का अनुसरण करने वाले आम लोगों, राजनीति में रहे वकीलों, उनकी पार्टी और प्रशासन एवं नौकरशाही के रूप में मौजूद थे। मोदी के साथ भी यही बात लागू होती है। 1970 में इंदिरा के विचारों का दौर शुरू हुआ था और अब मोदी एक विचार लग रहे हैं, जिनका समय आया है। 
 
कम शक्ति, अधिक अधिकार
 
शक्तियों के दुरुपयोग से किसी कार्यालय के अधिकारों की गरिमा धूमिल होती है। हालांकि मनमोहन सिंह की तरह शक्ति का इस्तेमाल न करना भी अधिकारों की गरिमा को चोट पहुंचाता है। मनमोहन ने अपने मंत्रियों को नैतिक रूप से चुनौती देने का प्रशासनिक अधिकार कभी इस्तेमाल नहीं किया और राजनीतिक अधिकार बौद्धिक रूप से विकलांग परिवार के हवाले कर दिया। उन्होंने मंत्रियों के भ्रष्टïाचार का एक नया शब्द भी दिया: 'गठबंधन धर्म'। 
 
2014 में मोदी के प्रचंड विजय की एक वजह यह थी कि लोगों को लगा कि वह प्रधानमंत्री कार्यालय की शक्ति और अधिकार दोनों को पुनर्जीवित करेंगे। प्रशासनिक मामलों में निश्चित तौर पर उन्होंने ऐसा किया, लेकिन अन्य मसलों पर उनका रवैया क्या रहा इस पर कुछ न कहना ही बेहतर होगा। 
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