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हल्के जूट बोरों के इस्तेमाल पर एफसीआई ने जताया एतराज

जयजित दास / भुवनेश्वर December 24, 2017

जूट क्षेत्र के सबसे बड़ा उपभोक्ता भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने उन्नत श्रेणी के कच्चे जूट से तैयार किए जाने वाले हल्के वजन के जूट बोरों के इस्तेमाल को लेकर अपना एतराज जताया है। चावल और गेहूं की पैकिंग के लिए परंपरागत टाट की बोरी की जगह हल्के बोरियों का इस्तेमाल खाद्यान्नों की संभावित बर्बादी का कारण बन सकता है। गौरतलब है कि राज्य खरीद एजेंसियों की तरफ से बोरी निर्माण के लिए एफसीआई हर साल 8-10 लाख टन टाट की खरीद करता है। 

 
जूट उद्योग ने खाद्यान्न की बरबादी से लगभग 2000 करोड़ रुपये के नुकसान होने की उम्मीद जताई है। एफसीआई ने इस मामले में पहले ही भारत के जूट आयुक्त को आगाह कर दिया है। जूट आयुक्त को लिखे एक पत्र में एफसीआई ने कहा है कि पिछले एक वर्ष के दौरान जूट टाट से तैयार होने वाले बोरे की गुणवत्ता में दो बार संशोधन किया गया जिसके तहत बोरे के भार में कमी, उसके कड़ेपन में कमी लाने जैसी बातें शामिल हैं। इसके कारण एफसीआई को कमजोर बोरियों की आपूर्ति हुई जिससे एफसीआई को शीघ्र फट जाने वाले बोरियों, पीडीएस (जन वितरण प्रणाली) प्राधिकारियों का विरोध और खाद्यान्नों की बर्बादी जैसी कठिन समस्याओं का सामना करना पड़ा था। ऐसा माना जा रहा है कि जूट बोरी के निर्माण के लिए टीडी-6 ट्ïवील की अत्यधिकम मात्रा वाले और दूसरे निम्रस्तरीय जूट के उपयोग का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इसके बारे में एफसीआई का कहना है कि ऐसे में जूट बोरियों की गुणवत्ता और अधिक खराब होगी जिससे खाद्यान्न के भंडारण के समय स्थिति और बदतर हो जाएगी।  
 
एफसीआई को 8 से 12 महीनों तक बफर स्टॉक रखना पड़ता है, ऐसी स्थिति एफसीआई का मत है कि जूट बोरी की गुणवत्ता में किसी प्रकार की कमी लाने से भंडारण पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। नतीजतन खाद्यान्न बर्बादी के तौर पर राष्टï्रीय स्तर की क्षति होगी। जूट उपायुक्त दिपंकर महतो ने इस संबंध में कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया। दिसंबर 2015 में जूट आयुक्त कार्यालय ने 665 ग्राम की बोरी के बदले 580 ग्राम वाले हल्के बोरियों के निर्माण को मंजूरी दी थी। सरकार ने 2016 के खरीफ सत्र से संशोधित गुणवत्ता वाले टाट बोरियों की खरीद शुरू की। 
 
चूंकि हल्के बोरियों के निर्माण के लिए केवल उन्नत श्रेणी की कच्चे जूट (टीडी-3, 4 और 5 किस्मों के जूट) ही उपयुक्त होते हैं, इन्हें तैयार करने में कई बाध्यताएं हैं। भारत में उत्पादित कच्चे जूट का एक बड़ा हिस्सा निम्रस्तरीय किस्म (टीटी-6/7 और इससे नीचे) की होती है। ऐसी स्थिति में बाजार में मांग-आपूर्ति का असंतुलन पैदा हो गया है जहां निम्रस्तरीय जूट की 28 लाख गांठें उपलब्ध हैं जो कि जरूरत से अधिक है, वहीं केवल 10 लाख उन्नत श्रेणी की गांठें हैं जो कि मांग से कम है। 
 
निम्रस्तरीय जूट श्रेणी के इस्तेमाल में कमी के कारण, कच्चे जूट की कीमत 35,000 प्रति टन की न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे आ गई है। ऐसे में किसान परेशान होकर न्यूनतम समर्थन मूल्य से लगभग 30 फीसदी से कम भाव 22,000 प्रति टन की दर से जूट बेचने को  मजबूर हैं।
Keyword: joot, cotton, bag, FCI,,
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