बिजनेस स्टैंडर्ड - सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोतरी की असल वजह क्या?
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सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोतरी की असल वजह क्या?

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  12 21, 2017

इन दिनों यह आम धारणा है कि आर्थिक वृद्धि में जितनी गिरावट आनी थी, वह आ चुकी है और अब इसमें बढ़ोतरी होगी। यह इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 5.7 फीसदी तक गिर गई थी। दूसरी तिमाही में यह 6.3 फीसदी पर पहुंच गई। क्या ऊंची वृद्धि फिर से पटरी पर आ गई है? क्या कारोबारी चक्र बदल रहा है? क्या यह गिरावट के बाद अस्थायी वृद्धि है? ऐसा लगता है कि कुछ बिंदुओं को लेकर सभी सहमत होंगे। पहला, यह साफ है कि नोटबंदी और जीएसटी के दो झटकों के असर आर्थिक तंत्र में अलग-अलग रफ्तार से बरकरार हैं। मापनीय उत्पादन पर नोटबंदी का तात्कालिक असर संभवतया खत्म हो चुका है। लेकिन जीएसटी के असर अभी दिखने बाकी हैं। पहली तिमाही में वृद्धि कम रहने की मुख्य वजह यह थी कि जीएसटी लागू होने से पूर्व पहले के बने माल का स्टॉक खत्म किया गया। लेकिन दूसरी तिमाही में फिर से स्टॉक किए जाने से वृद्धि में मामूली बढ़ोतरी हुई। 

 
जीएसटी के ढांचे, नियमों और दरों में फेरबदल जारी है। इनपुट क्रेडिट का अभी पूरा भुगतान नहीं हुआ है। यह आगे पता चलेगा कि बिल मिलान की पूरी प्रक्रिया प्रभावी रहती है या नहीं। जीएसटी का क्या असर हुआ, इसे समझने के लिए हमें कम से कम दो और तिमाहियों के आंकड़े देखने होंगे।  यह उम्मीद की जा रही है कि जीएसटी प्रणाली ठीक से लागू होने पर इसके व्यापक और सकारात्मक असर दिखेंगे। इनसे लागत कम होगी और आर्थिक गतिविधियों में इजाफा होगा। दूसरा, जीडीपी के ताजा आंकड़ों के हमारे विश्लेषण में कुछ सतर्कता बरती जानी चाहिए। इसकी वजह यह है कि जीएसटी लागू होने का आंकड़ों को मापने के तरीके पर भी असर पड़ा है। आम तौर पर कारोबारी क्षेत्र में वृद्धि का अनुमान अप्रत्यक्ष कर संग्रह में बढ़ोतरी पर आधारित होता है। दूसरी तिमाही जीएसटी लागू होने के बाद की तिमाही है, इसलिए अप्रत्यक्ष कर संग्रह के दूसरी तिमाही के आंकड़ों की पहली तिमाही के आंकड़ों से तुलना करने का कोई मतलब नहीं है। इसलिए जीएसटी के दायरे से बाहर रखे गए पेट्रोलियम क्षेत्र के लिए विभिन्न शॉर्टकट का इस्तेमाल किया गया है। दूसरी तिमाही ऐसी अवधि थी, जिसमें तेल की कीमतें आखिरकार बढऩे लगी थीं, इसलिए ये शॉर्टकट गलत साबित हो सकते हैं। यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि अंतिम वृद्धि के आंकड़ों में एक बड़ा हिस्सा व्यापार, होटल और परिवहन क्षेत्र में साल दर साल आधार पर 10 फीसदी बढ़ोतरी का रहा है। हाल के वृद्धि के आंकड़ों का अजीब पहलू यह भी था कि विनिर्माण में औसत हलचल और सीमेंट क्षेत्र की मांग के अनुमानों में तालमेल नहीं था। 
 
तीसरा, अर्थव्यवस्था में कुछ मांग लौटने के सबूत मिलेजुले हैं। अगर आप मांग को नवंबर के 4.9 फीसदी के महंगाई के आंकड़ों के नजरिये से देखते हैं तो आपको ऐसा लग सकता है कि मांग लौटने लगी है। लेकिन औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक की वृद्धि सुस्त पड़ रही है। यह अक्टूबर में सालाना आधार पर 2.2 फीसदी रही, जो सितंबर में 4.1 फीसदी थी। (यहां त्योहारी सीजन के उत्पादन के अलहदा पैटर्न की भी कुछ भूमिका हो सकती है।) जीडीपी के आंकड़ों में उपभोग और निर्यात के आंकड़े भी आकर्षक नजर नहीं आ रहे हैं। वित्त वर्ष 2017-18 की दूसरी तिमाही में निजी अंतिम उपभोग व्यय सालाना आधार पर 6.5 फीसदी बढ़ा है, जो 2016-17 की इसी तिमाही में 7.9 फीसदी बढ़ा था। 
 
चौथा, निजी निवेश में सुधार के कोई संकेत नजर नहीं आ रहे हैं। यह सही है कि दूसरी तिमाही में सकल स्थायी पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) 4.7 फीसदी बढ़ा है। यह कोई वृद्धि न होने से बेहतर है। लेकिन यहां इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि जीएफसीएफ से मापे जाने वाले निवेश का उत्पादन में अनुपात दूसरी तिमाही में पहली तिमाही से कम रहा है। दूसरी तिमाही में अनुपात 28.9 फीसदी रहा, जो पहली तिमाही में 29.8 फीसदी था। असल में यह पिछली चार तिमाहियों में सबसे कम अनुपात है। भारतीय अर्थव्यवस्था के पूंजीगत व्यय के आंकड़ों की निगरानी के लिए केंद्र द्वारा जुटाए गए आंकड़ों में नए निवेश में कोई इजाफा नहीं हुआ है। नई परियोजनाएं कई वर्षों के निचले स्तर पर हैं, रुकी हुई परियोजनाएं, कई वर्षों के उच्च स्तर पर हैं। 
 
मॉर्गन स्टैनली का अनुमान है कि इस साल आर्थिक वृद्धि 6.5 फीसदी से कम रहेगी, लेकिन यह अगले साल 7.5 फीसदी रहेगी। नोमुरा का भी ऐसा ही अनुमान है। लेकिन स्टैंडर्ड चार्टर्ड ने कहा है कि भारत को 7.5 फीसदी या उससे अधिक वृद्धि का स्तर हासिल करने के लिए कुछ वर्ष लगेंगे। हालांकि चिंता की कई वजह हैं। जीएसटी से भविष्य में राजस्व के स्रोतों को लेकर बहुत ज्यादा अनिश्चितता पैदा हुई है। केंद्र सरकार ने अपना घाटा कम करने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन राज्य सरकार इससे विपरीत दिशा में कदम बढ़ा रही हैं। राज्य और केंद्रीय पत्रों से बॉन्ड बाजार अटा पड़ा है। इसके अलावा भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण जैसे निर्गमकर्ताओं ने काफी बड़ी मात्रा में अद्र्ध-सरकारी ऋण जुटाया है। उदय के तहत सरकारी बिजली बॉन्ड पहले ही जारी हो चुके हैं, जबकि 1.35 लाख रुपये के बैंक पुनर्पूंजीकरण बॉन्डों की घोषणा की गई है।
 
रिजर्व बैंक बाह्य बाजार कार्यों के जरिये डॉलर की अपनी खरीद सीमित कर रहा है। प्रतिफल पर असर पूरी तरह नहीं दिखा है क्योंकि नोटबंदी के बाद की पूंजी का एक बड़ा हिस्सा म्युचुअल फंडों में गया है, जिन्होंने इसके बदले बहुत से अद्र्ध-सरकारी बॉन्ड खरीदे हैं। लेकिन जल्द ही इसका बड़े हिस्से पर असर दिखेगा। भारत का सॉवरिन प्रतिफल वक्र 2011 के बाद तीव्र ढलान पर है। यह पिछले छह महीने में एक बड़ा बदलाव है। यह ऐसे समय हो रहा है, जब बैंक और ऋण देने के बजाय अपनी बैंलेंस शीट साफ-सुथरी बनाने पर ध्यान दे रहे हैं। इसलिए निजी क्षेत्र के लिए कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार पूंजी का प्रमुख स्रोत बच गया है। वृद्धि को पटरी पर लाने के लिए हम इसी निजी क्षेत्र पर दांव लगा रहे हैं। 
Keyword: GDP, growth,,
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