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राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में कम होते जा रहे राज्य स्तरीय नेता

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  12 20, 2017

विधानसभा चुनावों में एक नया रुझान यह है कि राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में राज्य स्तरीय नेताओं का वजूद घटता जा रहा है। हो सकता है कि ग्रामीण इलाकों के मुश्किल दौर से गुजरने के कारण भारतीय जनता पार्टी को गुजरात के ग्रामीण इलाकों में कई विधानसभा सीट गंवानी पड़ी हों, जबकि व्यापार एवं लघु उद्यमों पर वस्तु एïवं सेवा कर (जीएसटी) के थोड़े समय रहे असर से भाजपा के वोट बैंक में कोई सेंध नहीं लगी हो। लेकिन भारत की चुनावी राजनीति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण और चिंताजनक बात यह है कि राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में स्थानीय नेता गुम होते जा रहे हैं। 

 
कुछ साल पहले तक विधानसभा चुनाव मुख्य रूप से राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के स्थानीय नेताओं की ताकत से लड़े जाते थे। महाराष्ट्र, असम और पंजाब ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के स्थानीय नेताओं की ताकत देखी है। इन नेताओं ने ये विधानसभा चुनाव राज्यों की जमीनी हकीकत की अपनी समझ और स्थानीय लोगों में अपनी लोकप्रियता के बलबूते पर लड़े हैं।  देवेंद्र फडणवीस, सर्वानंद सोनोवाल और अमरिंदर सिंह जैसे ताकतवर स्थानीय नेताओं की लोकप्रियता ने इन राज्यों के विधानसभा चुनावों के अंतिम नतीजों में अहम भूमिका निभाई। उनमें से प्रत्येक पार्टी को विधानसभा चुनाव जिताने में अग्रणी भूमिका निभाने से पहले अपने-अपने राज्य में पार्टी के किसी प्रमुख पद पर था। निस्संदेह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, अब कांग्रेस अध्यक्ष बन चुके राहुल गांधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने इन राज्यों के विधानसभा चुनावों में जोर-शोर से प्रचार किया। लेकिन इन चुनावों में राज्य स्तरीय नेताओं की ताकत को कम करके नहीं आंका जा सकता है। 
 
इस संदर्भ में गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव परिपाटी से हटकर हैं। ये उस रुझान को और मजबूत करते हैं, जो इस साल के प्रारंभ में उत्तर प्रदेश के चुनावों में शुरू हुआ था। ऐसा नहीं है कि भाजपा और कांग्रेस के पास वरिष्ठ और अहम पदों पर स्थानीय नेता नहीं हैं। लेकिन चुनावों में उनकी भूमिका तुलनात्मक रूप से मामूली रही। चुनाव प्रचार के दौरान उन पर मोदी, शाह और गांधी हावी रहे। 
 
गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों को ही लेते हैं। क्या किसी को याद है कि चुनाव प्रचार के दौरान गुजरात में भाजपा के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने क्या कहा था? हिमाचल प्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल ने क्या कहा? या गुजरात में कांग्रेस के दिग्गज नेता शक्तिसिंह गोहिल और हिमाचल प्रदेश में नई सरकार आने के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटने जा रहे कांग्रेस के वीरभद्र सिंह ने क्या कहा था? 
 
चुनाव प्रचार, विशेष रूप से गुजरात में मोदी और गांधी का ही दबदबा था। असल में इन स्थानीय नेताओं में से दो खुद ही चुनाव हार गए, जो हिमाचल प्रदेश में धूमल और गुजरात में गोहिल हैं। यह उनकी पार्टियों के प्रदर्शन के बिल्कुल विपरीत था। भाजपा ने भारी बहुमत से हिमाचल प्रदेश जीता है और कांग्रेस ने गुजरात में अपनी सीटों की संख्या 16 बढ़ाई है। विडंबना यह है कि दोनों ही राष्ट्रीय राजनीतिक दल इन चुनावों में अपने राष्ट्रीय नेताओं की जीत का जश्न मना रहे हैं। भाजपा यह प्रचार करने में व्यस्त है कि गुजरात में उसकी जीत ने फिर से मोदी का जादू और प्रधानमंत्री का जलवा कायम किया है। वहीं कांग्रेस यह कहकर अपनी पीठ थपथपा रही है कि गुजरात के चुनावों से राहुल गांधी के रूप में पार्टी में एक ऐसे नए नेता का उभार हुआ है, जो भाजपा को चुनौती दे सकता है। ये सभी उचित दावे हैं। लेकिन ये दोनों पार्टियां अपने राष्ट्रीय नेताओं को लेकर इतनी मग्न हैं कि कोई भी व्यक्ति अपने कुछ शीर्ष स्थानीय नेताओं के खराब प्रदर्शन को लेकर आंसू नहीं बहाना चाहता या इसकी पड़ताल नहीं करना चाहता है कि उनकी इतनी करारी हार क्यों हुई। 
 
ये विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के राज्य स्तरीय नेताओं की अहमियत में  चिंताजनक गिरावट के अलावा इस ओर भी इशारा कर रहे हैं कि चुनावी मैदान में स्थानीय मुद्दे गौण होते जा रहे हैं। कांग्रेस ने ग्रामीण क्षेत्रों की खराब हालत और जीएसटी की दिक्कतों जैसे मुद्दे उठाए। लेकिन ये केवल स्थानीय मुद्दे नहीं थे। कृषि आय में धीमी बढ़ोतरी एक ऐसी समस्या है, जो देशभर के किसानों को प्रभावित करती है। जीएसटी से पैदा हुई दिक्कतें देेश के हर कोने में महसूस की जा रही हैं। विकास को लेकर भाजपा के प्रचार की व्यापक अपील थी, जिससे राज्य विधासभा का चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों का जनमत बन गया। 
 
इन दोनों दलों द्वारा जारी चुनावी घोषणापत्र में स्थानीय मुद्दे थे, लेकिन भाजपा और कांग्रेस के प्रचार अभियान में इन मुद्दों को बहुत कम जगह मिली। इसकी मुख्य वजह यह थी कि ये प्रचार अभियान उनके राष्ट्रीय नेताओं ने चलाए। उनका तात्कालिक लक्ष्य विधानसभा चुनाव जीतना था, लेकिन उनका ज्यादा महत्त्वपूर्ण और लंबी ïअवधि का लक्ष्य अगले आम चुनावों की जमीन तैयार करना था। वर्तमान जंग राज्य विधानसभा के लिए थी, लेकिन असली लड़ाई 2019 में लोक सभा के लिए थी। 
 
इस तरह की रणनीति न भाजपा और न ही कांग्रेस के लिए ठीक है। राज्यों में प्रशासनिक मुद्दों की अनदेखी करने के अलावा विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय नेताओं और राष्ट्रीय मुद्दों के दबदबे से नेतृत्व के स्तर पर खालीपन पैदा हो सकता है, जिसके राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए गंभीर नतीजे होंगे। पहले ही मुख्यमंत्रियों सहित राज्यों के नेता केंद्र में सरकार का हिस्सा बनने के अनिच्छुक हैं क्योंकि वे अपनी ताकत और आजादी नहीं खोना चाहते हैं। अगर राष्ट्रीय राजनीतिक दल राज्य स्तरीय नेताओं की जगह भी छीन लेंगे तो यह बहुत गलत होगा। भाजपा और कांग्रेस दोनों को राज्य स्तरीय नेताओं की एक मजबूत टीम खड़ी करनी चाहिए और उन्हें अपनी जगह में बने रहने की आजादी देनी चाहिए। इस तरह की सहकारी संघवाद की भावना न केवल भाजपा बल्कि कांग्रेस के लिए भी अहम है। 
Keyword: gujrat, election, BJP, congress,,
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