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गुजरात: जंग करीबी मगर नतीजा सपाट

श्रीकांत सांब्राणी /  December 19, 2017

गुजरात के चुनाव में मतदाता को शायद लोकतंत्र का जश्न नहीं दिखा बल्कि तकलीफ देने वाली ऐसी रवायत दिखी, जिससे पीछा छुड़ाना उसके वश में नहीं था। बता रहे हैं श्रीकांत सांब्राणी 

 
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि गुजरात विधानसभा के लिए थकाऊ जंग के सबसे रोमांचक क्षण 18 दिसंबर, सोमवार को सुबह साढ़े नौ बजे से दस बजे के बीच रहे। उस आधे घंटे के दौरान बढ़त पल-पल बदलती रही, हरेक चैनल पर बदलती रही। टेलीविजन स्क्रीन पर आएदिन चिल्लाने वाले एंकरों की हालत तो उस वक्त ऐसी हो गई थी मानो उन्हें मिर्गी सी आ गई हो और जोश-जोश में उन्होंने ऐलान कर डाला, 'कांग्रेस आगे!' लेकिन उसके बाद वही पुरानी कहानी चली और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आगे बढ़ती गई।
 
भाजपा और कांग्रेस दोनों के शब्दों के जादूगर अपने काम पर लग गए हैं। एक खेमे का कहना है, 'दोहरी सत्ता विरोधी लहर के बावजूद हम 10 से 15 सीट ही हारे, लेकिन आखिर हम ही जीते, नहीं?' दूसरा खेमा कह रहा है, '1985 के बाद से हमारा सबसे शानदार प्रदर्शन रहा और हमने भाजपा के रथ की रफ्तार धीमी कर दी, इसलिए यह हमारी नैतिक जीत है।' तमाम चुनावी विश्लेषक और पंडित पहले की ही तरह गलत साबित हुए, लेकिन अपनी मेहनत को सही साबित करने के लिए वे अखबार भी रंगेंगे और टीवी पर भी जम जाएंगे।
 
ऐसा लगता है कि गुजरात ने जातिवादी नेताओं की तीखी और विभाजनकारी अपीलों को तवज्जो ही नहीं दी। पाटीदार पूरे राज्य में बराबर फैले हुए हैं। सूरत को पाटीदार आरक्षण आंदोलन समिति का गढ़ माना जाता है और 2015 के नगर निगम चुनावों में कांग्रेस के कई उम्मीदवार वहां से जीते थे। समिति के नेतृत्व यानी हार्दिक पटेल को यकीन था कि सूरत से खुशखबरी मिलेगी। लेकिन वैसा नहीं हुआ। मध्य गुजरात में पाटीदार समुदाय ने तो आरक्षण समर्थकों को और भी कम भाव दिया। लगता है कि जातिवाद की भावुकता भरी अपील सभी क्षेत्रों में इतनी मजबूत नहीं थी कि सत्तारूढ़ पार्टी के समर्थकों को डिगा पाती या दूसरे मुद्दों पर भारी पड़ती।
 
लेकिन यह भी गंभीर चिंता का विषय है कि आबादी में नौ प्रतिशत हिस्सेदारी वाले मुसलमानों को किसी ने तवज्जो नहीं दी। भाजपा के लिए उनका अधिक महत्त्व नहीं था और अब कांग्रेस भी उन्हें नजरअंदाज कर रही है। यह बात मणिशंकर अय्यर की बेवक्त की घटिया टिप्पणी के बाद भी नजर आई, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान की साजिश वाली बात कही और उस समय भी दिखी, जब कांग्रेस के लिए मोर्चा लड़ रहे हार्दिक (पटेल), अल्पेश (ठाकोर) और जिग्नेश (मेवाणी) को सांप्रदायिक रंग वाला 'हज' नाम दिया गया।
 
पिछली बार के मुकाबले इस बार भाजपा की सीटों में कमी हमें बताती है कि विकास का मंत्र जपते रहने के बावजूद गुजरात उस आर्थिक पीड़ा से अछूता नहीं है, जिसे पूरा देश महसूस कर रहा है और सत्तारूढ़ दल को यह बात बता भी रहा है। शहरों में भाजपा का दबदबा बरकरार रहने का मतलब है कि तकलीफ के इकलौते कारण नोटबंदी या वस्तु एवं सेवा कर नहीं हैं, जिनका असर शहरी मतदाताओं पर ज्यादा पड़ा होगा। आम आदमी को इसकी वजह से आई आर्थिक सुस्ती और दिक्कतों से अधिक परेशानी है क्योंकि वृद्घि की अनिश्चित तस्वीर रोजगार सृजन पर असर डाल रही है और वस्तुओं की कीमतें बेमौसम ही बढ़ रही हैं।
 
यह बात किसानों और देहात में साफ नजर आई, जहां मतदाताओं ने कांग्रेस को अधिक वोट देकर अपना गुस्सा जाहिर कर दिया। गुजरात कुछ अरसे तक शानदार कृषि वृद्घि की बात कह रहा था, लेकिन आज वहां भी कृषि संकट है। ऐसी हालत में फसल कितनी भी हो, संपन्नता नहीं आती। चुनावी नतीजे जो भी रहे हों, वर्तमान सदी में गुजरात ने जो भी प्रगति की है, उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। उसकी प्रगति साफ झलकती भी है: अच्छी सड़कें हैं, गांवों में भी चौबीसों घंटे बिजली आती है, चमचमाते हुए नए कारखाने खुले हैं, कानून व्यवस्था की हालत पहले से बेहतर और स्थिर है। इन्हें खारिज करने की कांग्रेस की कोशिश कामयाब नहीं हो पाई। गुजरातियों को तकलीफें और शिकायतें तो हैं, लेकिन वे मतदाता के तौर इतनी मजबूती नहीं दिखा पाए कि सत्तारूढ़ पार्टी को बाहर कर दें, खास तौर पर तब, जब ये चुनाव मोदी पर जनमत संग्रह जैसे ही थे।
 
इस नतीजे का असली प्रभाव क्या होगा? जवाब है कुछ नहीं होगा, न तो गुजरात में और न ही देश में। दोनों बड़ी पार्टियों के पास ढंग के स्थानीय नेता नहीं हैं। सोलह साल हो गए, गुजरात की डोरी मोदी के ही हाथ में है। कांग्रेस चाहे तो विरोध कर सकती है, लेकिन कोई नतीजा शायद ही निकले। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का दबदबा बरकरार रहेगा, लेकिन उसे राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपने गढ़ मजबूत करने होंगे, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इन राज्यों में असंतोष की आवाजें सुनाई देने लगी हैं। पिछले कई महीनों से गुजरात में भी ऐसा ही था। पार्टी ने उसे अनसुना कर दिया और उसे नुकसान झेलना पड़ा।
 
कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी ने गुजरात में खोखले प्रचार अभियान को नई ऊर्जा तो दी, लेकिन पार्टी की किस्मत पलटने की उम्मीद बहुत कम है। कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनावों में उसके लिए मामला फंसा हुआ है क्योंकि उस राज्य में सत्ता विरोधी लहर उसे परेशान कर रही है। मोदी का नेतृत्व विपक्ष के चौतरफा हमलों के बावजूद सबसे मजबूत रहा है। लेकिन अपने पुराने जनाधार को बढ़ाकर पूरे देश का निर्विवाद नेता बन जाना अब भी दूर की कौड़ी है। हालांकि उनकी पार्टी के नेता इसे दूसरी तरह से देखते हैं और मानते हैं कि वे अपने असली उद्देश्य के प्रति समर्पित हैं। इन सबके बीच उदार लोकतंत्र के बुनियादी तत्त्व -सहिष्णुता, अन्य विचारों के प्रति सम्मान तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता-हाशिये पर खिसकते जा रहे हैं।
 
गुजरात चुनावों पर इस त्वरित टिप्पणी के अंत में कुछ खरी-खरी बातें होनी चाहिए। भारतीय राजनीति पर नजर रखते हुए मेरे लिए यह चुनाव अभियान अब तक का सबसे अधिक कोलाहल भरा और भद्दा अभियान रहा। और मैं ही अकेला नहीं हूं। केवल 68 प्रतिशत मतदाता वोट डालने निकले, जो 2012 के मुकाबले तो 3 प्रतिशत ही कम है (लेकिन अन्य राज्यों में पडऩे वाले 80 प्रतिशत से अधिक वोटों से बहुत कम है) और इससे पता चलता है कि मतदाता भी पहले की तरह उत्साह में नहीं थे। उस मतदाता को यह चुनाव शायद लोकतंत्र के जश्न जैसा नहीं लगा बल्कि परेशान करने वाली ऐसी रवायत जैसा लगा, जिससे वह पीछा नहीं छुड़ा सकता।
 
(लेखक लंबे समय से गुजरात में रहते हैं और वहां की राजनीति पर पैनी नजर रखते हैं)
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