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हितों के टकराव में उलझी दुनिया के लिए विचार की अहमियत

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  December 18, 2017

पेंगुइन ने हाल ही में मेरी किताब 'कॉन्फ्लिक्ट्स ऑफ इंटरेस्ट' प्रकाशित की है जिसके बारे में मुझे उम्मीद है कि काफी प्रतिक्रिया होगी। किताब लिखना एक ऐसा सफर है जिस पर मैं कभी नहीं निकली रहती। दरअसल हमारे काम में पीछे की ओर देखना एक विशेषाधिकार जैसा है। हमारे लिए तो हरेक दिन ही नई चुनौती लेकर आता है जो हमें नई चीजें सीखने और अधिक कोशिश करने के लिए मजबूर करता है। वास्तव में, हम जिस तरह का काम करते हैं वह काफी निराशाजनक और परेशान करने वाला होता है। हमें हमेशा अपनी नजर अपने लक्ष्य की तरफ रखनी होती है ताकि हमारा दिमाग पूरी तरह मकसद पर ही टिका रहे। यही बात मुझे हमेशा पूरे जोश से भरी रहती है। साफ-साफ कहूं तो यही एक रास्ता है जो मुझे लाचारगी का अहसास नहीं कराता है। काम का बोझ होने और अक्सर उस काम के निरर्थक साबित होने से आप खुद को विवश महसूस कर सकते हैं। मुझे लगता है कि इस काम में एक-दूसरे से जुड़े हुए धागे या कई सबक हैं।

 
पहला, खुद मुद्दे का ही मुद्दा है। अक्सर हम समस्या में इस कदर उलझे हैं कि उसका हल तलाशने के लिए जरूरी काम के पहचान की क्षमता ही खो चुके हैं। मेरे हिसाब से जवाब तलाशने पर दिया जाने वाला यह जोर ही हमारा सबसे अहम योगदान है। लेकिन इससे भी अधिक मुश्किल होता है उस समस्या के समाधान के लिए सुझाए गए रास्ते पर बने रहना। भारत के सौ करोड़ से अधिक निवासी हैं और हममें से हरेक के पास कुछ विचार हैं। हालांकि कोई भी समाधान संपूर्ण नहीं होता है और हम तो वैसे भी काफी आलोचनात्मक रवैया रखते हैं। ऐसे में संघर्षरत वास्तविकता का मुकाबला इसलिए करना है कि आपका ध्यान न बंटे।
 
इसके बाद खुद समस्या की समस्या तो है ही। भारत में कई ऐसी बातें हैं जिन्हें करने की जरूरत है और उन सभी को बीते हुए दिन ही कर लिया जाना चाहिए था। ऐसे में आप अपनी प्राथमिकता कैसे तय करते हैं? जब आपको पता चले कि हरेक समस्या अपने-आप में एक दुनिया है तो आप यह कर सकते हैं। हमारा 30 वर्षों का कामकाज बताता है कि हरेक मसले को चुनौती दी जा सकती है और उसका नतीजा आने में वक्त लगता है। वायु प्रदूषण का ही मुद्दा लें। हमने 1990 के दशक के मध्य में इस मसले पर काम करना शुरू किया और वर्ष 2000 के दशक की शुरुआत में हमें कुछ कामयाबी मिली थी। अब यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। चक्र गोल है और इसके लिए आपको लगातार इस पर जोर देते रहना जरूरी है।
 
ऐसा तब है जब मदद के लिए हमारे पास सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवॉयरनमेंट (सीएसई) के रूप में एक सांस्थानिक ढांचा मौजूद है। अनिल अग्रवाल ने 1980 में लंदन स्थित अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण एवं विकास संस्थान (आईआईईडी) की नौकरी छोडऩे के बाद भारत लौटकर सीएसई का गठन किया था और आज के समय में यह हमारी सबसे अहम संपत्ति है। उनके बाद हमारे सहयोगियों और खुद मेरे लिए भी यह चुनौती रही है कि यह संस्थान पूरे जज्बे से  काम करता रहे।
 
अब हम तीसरे धागे की ओर रुख करते हैं। यह सच है कि हरेक मुद्दे को परखा जाना चाहिए क्योंकि उसमें हितों के टकराव निहित होते हैं। लेकिन परख इसलिए भी होनी चाहिए कि यह विचारों एवं वास्तविकताओं का संघर्ष है। इस संघर्ष में शामिल होने के लिए शोध और सच माने जा चुके स्थापित तथ्यों के खिलाफ खड़े होने की सामथ्र्य जरूरी होती है। यहीं वह बिंदु है जहां पर हमें अपने सबसे बड़े दुश्मनों का सामना करना पड़ा है। ऐसा हितों के टकराव की वजह से नहीं बल्कि विचारों के संघर्ष के चलते हुआ है जिसके मूल में हित होते हैं। इस किताब का कोई भी अध्याय पढि़ए और आपको मेरी कही हुई बातें दिखाई भी देंगी। हवा को साफ करने की लड़ाई के दौरान हमें डीजल के बारे में 'स्थापित' विज्ञान से भी लडऩा पड़ा था। इसी तरह खाद्य उत्पादों की सुरक्षा के मसले पर हमें कीटनाशकों से संबंधित स्थापित विज्ञान और वन्यजीव प्रबंधन के नए तौर-तरीके आजमाने के दौरान वन संरक्षण के स्थापित विज्ञान से भी मुकाबला करना पड़ा है। यह सूची काफी लंबी है लेकिन यह युद्ध मस्तिष्क के भीतर जगह पाने वाले विचारों का है। 
 
जब मैं ये बातें लिख रही हूं तो मैं इस पर सजग हूं कि मस्तिष्क के भीतर जगह पाने के लिए जारी संघर्ष आने वाले वर्षों में और भी अधिक मुश्किल होने जा रहा है। मैंने अपनी किताब में इस पहलू का जिक्र किया है। हम दुनिया को पहले की तुलना में अधिक सिकुड़ा हुआ मान सकते हैं और हम पहले से अधिक जुड़ गए हैं और मीडिया भी अब सोशल हो गया है लेकिन सच्चाई इससे कहीं दूर है। असल में, हम अपने व्यक्तिगत खोल में रह रहे हैं, अपनी पसंद की सामग्री ही पढ़ रहे हैं और पसंद नहीं आने वाले विचारों को नजरअंदाज कर रहे हैं। 
 
इसका मतलब है कि यथास्थिति के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले हमारे जैसे लोगों के लिए आने वाला समय मुश्किल होगा। लेकिन हम हथियार नहीं डाल सकते हैं और न ही निहित स्वार्थों को पनपने दे सकते हैं। यह संघर्ष असली है और इसे लडऩा ही होगा। यही असली सार है। पर्यावरणवाद को लेकर दो एकदम जुदा सोच हैं- एक समृद्ध लोगों का और एक गरीबों का। यह भविष्य का एक तकनीकी नजरिया है जहां मशीनें और नवाचार हमारी उठापटक को सरल बनाएंगे। यह नजरिया भी है कि अधिक मानवीय एवं समावेशी तरीकों का विकास किए बगैर हम बेहतर भविष्य का निर्माण नहीं कर पाएंगे। यह पर्यावरण की सियासत है और इसे बेजान नहीं बनाया जा सकता है। कृपया आप कॉन्फ्लिक्ट्स ऑफ इंटरेस्ट पढि़ए क्योंकि न केवल सहमत होने बल्कि असहमति जताने के लिए भी यह जरूरी है। यह हमारे वर्तमान दौर की कहानियां हैं और हमारे साझे भविष्य की ओर इशारा करती हैं। मुझे आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है।
Keyword: environment, india, pollution,,
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