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वर्ष 2018 में बाजार में आ सकती है गिरावट

आकाश प्रकाश /  December 18, 2017

बाजार को लेकर तेजडिय़ों का आशावाद समझा जा सकता है लेकिन वर्ष 2018 में वैश्विक बाजारों में गिरावट की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। विस्तार से बता रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
हम वित्तीय परिसंपत्तियों और खासतौर पर शेयर बाजार की बात करें तो यह तेजी का नौवां वर्ष चल रहा है। तेजी के दौर की शुरुआत अमेरिका से हुई थी जब एसऐंडपी 500 सूचकांक मार्च 2009 में गिरकर 667 अंक पर रह गया था। बहरहाल अब तेजी के दौर का विस्तार यूरोप, जापान और उभरते बाजारों तक हो चुका है। वर्ष 2009 के न्यूनतम स्तर तक गिरावट के बाद से अमेरिकी शेयर बाजार चार गुना उछाल हासिल कर चुके हैं। कई अन्य क्षेत्रों में दो से ढाई गुना तक का इजाफा हो चुका है। चालू वर्ष तो सभी क्षेत्रों, बाजारों और तमाम परिसंपत्ति क्षेत्र के लिए बेहद शानदार रहा है। बाजार में तेजी के स्वरूप और उसकी अवधि को देखते हुए तथा मजबूत मूल्यांकन के चलते कई निवेशक वर्ष 2018 को लेकर चिंतित हैं। वर्ष 2018 में मौद्रिक नीति के सामान्यीकरण की प्रक्रिया भी आरंभ होगी। उसके वित्तीय परिसंपत्ति क्षेत्र पर गहरे प्रभाव हो सकते हैं।
 
लंबी अवधि के कारोबार में बेहतर ट्रैक रिकॉर्ड वाले अधिकांश निवेशक भी अभी काफी शंकालु नजर आ रहे हैं। कमोबेश हर रोज किसी न किसी वित्तीय जानकार की ओर से कोई न कोई चेतावनी सामने आ ही जाती है।  वित्तीय परिसंपत्ति काफी हद तक फेसबुक, एमेजॉन, ऐपल, नेटफ्लिक्स और गूगल के शेयरों में सिमटी हुई है। यह बात भी कई लोगों को परेशान कर सकती है। अगर उपरोक्त कंपनियों के या अलीबाबा और टेंसेंट जैसे अन्य प्रौद्योगिकी शेयरों में निवेश नहीं हो तो बाजार में बेहतर प्रदर्शन करना लगभग नामुमकिन है। कई लोग इन कंपनियों के प्रदर्शन की तुलना सन 2000 के दशक के डॉटकॉम बबल या सन 1960 के दशक के निफ्टी-फिफ्टी शेयरों से जुड़ी घटना से कर रहे हैं। प्रौद्योगिकी एक बार फिर शेयर बाजार में हावी है। नियामकीय जोखिम जरूर बढ़ रहा है लेकिन कोई उनकी परवाह करता नहीं दिख रहा। नियामकीय स्तर पर ऐसा कोई भी विपरीत कदम जो उपरोक्त कंपनियों के मुनाफे के गणित को खराब कर सकता हो, वह पूरे बाजार को प्रभावित कर सकता है। यानी ऐसे वक्त में जबकि शेयर बाजार अपराजेय नजर आ रहे हैं, हमें चिंतित होने की जरूरत है। 
 
तमाम शंकाओं और शेयर बाजार में हालिया लडख़ड़ाहट के बाद आशावादियों द्वारा जताए जा रहे तेजी के आसार पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। ऐसे भी लोग हैं जिन्हें लगता है कि हम अभी तेजी के दौर के मध्य में हैं। यह एक ढांचागत तेजी का बाजार है। हकीकत में वे आज और सन 1982-2000 के बीच के ढांचागत अमेरिकी तेजी के बाजार के बीच समतुल्यता स्थापित करते हैं। मार्च 2009 के बाद की बाजार की रैली काफी हद तक सन 1982-2000 के तेजी के दौर से मिलती-जुलती है। बल्कि कहा जा सकता है कि वे एकदम समरूप हैं। तेजडिय़ों को यकीन है कि अभी बिकवाली करना जल्दबाजी होगी। उनका आशावाद मौजूदा वैश्विक माहौल पर आधारित है। 
 
तेजी का मामला दो चीजों पर आधारित है। पहली बात, वैश्विक आर्थिक चक्र में सुधार का दौर है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन के सदस्य देश तथा तमाम प्रमुख उभरते देश बिना वित्तीय स्थिरता की चुनौती के तेजी से विकसित हो रहे हैं। यह तेजी जल्दी समाप्त नहीं होगी।  दूसरी बात, अपस्फीतिकारी ताकतों मसलन तकनीकी नवाचार, श्रम बाजार में मंदी और अतिरिक्त क्षमता आदि के चलते केंद्रीय बैंक भी दायरे से पीछे रहेंगे। दुनिया के तमाम प्रमुख केंद्रीय बैंक आज मुद्रास्फीति की तुलना में अपस्फीति को लेकर अधिक चिंतित हैं। वे अपस्फीति के माहौल की वापसी का कोई भी संकेत मिलते ही झट से दरों में कटौती करने या ठहराव लाने में नहीं हिचकेंगे। अमेरिका में मौद्रिक नीति धीरे-धीरे सामान्य हो जाएगी लेकिन यूरोपीय संघ और जापान में वह निकट भविष्य में तेज बनी रहेगी। फेडरल रिजर्व की टैपरिंग के बावजूद केंद्रीय बैंक अगले साल भी वित्तीय परिसंपत्तियों के खरीदार बने रहेंगे। इस बीच आय का स्तर मजबूत बना रहेगा और कंपनियों का बेहतर प्रदर्शन जारी रहेगा। मार्जिन भी अनुमान से बेहतर बने रहे हैं। परंतु वह निकासी नहीं हुई है जिसके आधार पर मार्जिन के सामान्यीकरण की बात कही जा रही थी। 
 
तेजडिय़ों की यह दलील भी है कि यूरोपीय संघ और जापान अप्रत्याशित और अपारंपरिक मौद्रिक नीति के मामले में अमेरिका का अनुसरण कर रहे हैं। इन दोनों क्षेत्रों के समक्ष अभी भी सामान्य से बेहतर वृद्घि और मुनाफे की अवधि बरकरार है।  अमेरिका ने यह भी दिखाया है कि एक बेहतर और सुनियोजित ढंग से अप्रत्याशित मौद्रिक प्रोत्साहन को खत्म करने से वित्तीय बाजारों में अस्थिरता को रोका भी जा सकता है। अमेरिकी शेयर सूचकांकों ने क्वांटिटेटिव ईजिंग के बाद भी बहुत शानदार प्रदर्शन किया है। 
 
तेजडिय़ों का यह भी कहना है कि यूरो के टूटने या चीन की अर्थव्यवस्था के अंत:स्फोट से वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट की आशंका जताई जा रही थी लेकिन फिलहाल ऐसा कुछ होता नहीं नजर आ रहा है। बाजार दोनों ही परिदृश्यों में गिरावट के जोखिम से चिंतित रहे हैं। लेकिन कम से कम वर्ष 2018 में ऐसा कोई खतरा नजर नहीं आता। एक प्रासंगिक चिंता यह भी हो सकती है कि क्या बाजार ने इन सकारात्मक खबरों को पूरी तरह समायोजित कर लिया है और वह मौजूदा बेहतर माहौल का पूर्ण मूल्यांकन कर रहा है। 
 
मंदडिय़ों का कहना है कि मूल्य आय अनुपात दिखाता है कि बाजार काफी अधिमूल्यित है। यह काफी हद तक सन 1929 जैसे स्तर पर है। तेजडिय़ों का कहना है कि उक्त अनुपात मौजूदा कम ब्याज दर के माहौल की असामान्यता को लेकर पूरी तरह समायोजित नहीं है। कम दरों के साथ समायोजन करने पर यह अंदाजा लग जाता है कि बाजार औसत मूल्यांकन पर ही काम कर रहे हैं। 
 
मैं अपने आपको शंकालु खेमे में पाता हूं। ज्यादा से ज्यादा हमें एक तार्किक झटके की आवश्यकता है ताकि हम अपनी आश्वस्ति से बाहर निकल पाएं। पैसे बनाना कभी इतना सहज और आसान नहीं नजर आना चाहिए। इसके साथ कुछ भय और आत्म संदेह तो होना ही चाहिए। वैश्विक स्तर पर देखें तो भय की कमी नहीं नजर आ रही है। तेजडिय़ों का यह कहना सही हो सकता है कि इसे पूरी तरह मंदी का बाजार कहना जल्दबाजी हो सकती है। परंतु वर्ष 2018 में गिरावट से इनकार नहीं किया जा सकता। 
Keyword: share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर,,
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