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कच्चे तेल की तेजी का असर, फिसलन का कितना डर?

शाइन जैकब /  December 17, 2017

पेट्रोलियम निर्यात करने वाले देशों के संगठन ओपेक की जब हाल में  ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में 173वीं बैठक हुई तो इसके परिणाम पर भारत सहित पूरी दुनिया की नजर थी। भारी अटकलों के बीच ओपेक ने उत्पादन में कटौती के समझौते को एक वर्ष के लिए आगे बढ़ाने का फैसला किया। इसका मतलब यह हुआ कि 2018 तक रोजाना बाजार में 18 लाख बैरल कम कच्चे तेल की आपूर्ति होगी। इस फैसले से भारत की खर्च करने की क्षमता प्रभावित होने की संभावना है। कच्चे तेल का उत्पादन करने वाले देशों के लिए 2017 कीमतों को फिर से पटरी पर लौटाने वाला साल रहा है। जनवरी 2016 में कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल 28 डॉलर के ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई थी। भूराजनीतिक अनिश्चितता और अमेरिका में कच्चे तेल के भंडार में कमी के कारण कच्चे तेल की कीमतें अब 64 डॉलर प्रति बैरल पहुंच चुकी हैं।

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कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल 60 डॉलर से अधिक पहुंचने पर भारत के आयात बिल में 8 से 10 अरब डॉलर की बढ़ोतरी होगी और इससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा। सूत्रों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत के 65 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन अगर कीमतें इसके पार जाती हैं तो सब्सिडी का बोझ साझा करने की व्यवस्था लौट सकती है। इसके तहत बढ़ी हुई कीमत का बोझ उपभोक्ताओं और सरकार को बराबर वहन करना पड़ेगा। वित्त मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय ने पिछले साल इसका खाका तैयार किया था। 
 
अलबत्ता सरकार ने वर्ष 2017-18 में कच्चे तेल की कीमत 55 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान लगाया था और 2017-18 के बजट में पेट्रोलियम सब्सिडी 25,000 करोड़ रुपये रखी गई थी। वित्त वर्ष 2013 में 96,879 करोड़ रुपये थी। उद्योग के सूत्रों का दावा है कि एलपीजी (रसोई गैस) सब्सिडी के 13,000 करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया था लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में हाल में हुई बढ़ोतरी के कारण इसके 15,000 करोड़ रुपये होने की संभावना है। वित्त वर्ष के पहले 6 महीनों के लिए पेट्रोलियम मंत्रालय से एलपीजी और केरोसीन की संचयी सब्सिडी के रूप में 9,079 करोड़ रुपये का दावा किया गया है। लेकिन अब इसका बढऩा तय है। उपभोक्ताओं की जेब पर भी इसका बोझ पड़ा है। पिछले साल अक्टूबर से इस साल नवंबर तक बिना सब्सिडी वाले एलपीजी सिलिंडर की कीमत 59 फीसदी बढ़कर 742 रुपये पहुंच चुकी है। इसी तरह सब्सिडी वाले सिलिंडर की कीमत में 16 फीसदी का इजाफा हुआ है और यह 495.69 रुपये हो गई है।
 
केयर रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक ओपेक के हाल के फैसले का भारत पर अल्पकालिक असर होगा क्योंकि वह रोजाना 42 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात करता है जो उसकी कुल खपत का 80-85 फीसदी है। एजेंसी का मानना है कि कच्चे तेल की कीमत 65 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर नहीं जाएगी क्योंकि अमेरिकी का भंडार और उत्पादन बढऩे से यह नियंत्रण में रहेगी।
 
हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक एम के सुराणा ने कहा, 'सऊदी अरब और इराक में तनाव, वेनेजुएला में वित्तीय संकट और अमेरिका में मुद्रास्फीति के दबाव के बारे में आम धारणा जैसे कुछ उत्प्रेरक हैं। इसके लिए उत्पादन में ओपेक द्वारा घोषित कटौती के अनुपालन का स्तर भी बहुत अच्छा है। मेरा मानना है कि आने वाले दिनों में कीमतें 57 से 65 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहेंगी।'
 
यह अर्थव्यवस्था के लिए अहम है क्योंकि सालाना आधार पर भारत 1,57.5 करोड़ बैरल कच्चे तेल का आयात करता है। यानी कीमत में एक डॉलर की स्थायी बढ़ोतरी से ही भारत का आयात बिल करीब 10,000 करोड़ रुपये बढ़ जाएगा। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016-17 में भारत के कच्चे तेल के आयात का बिल 70 अरब डॉलर था जबकि 2014-15 में यह 113 अरब डॉलर और 2013-14 में यह 143 अरब डॉलर था। इसका कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई कमी है। 2014 के मध्य में यह 115 डॉलर प्रति बैरल था जबकि जनवरी 2016 में यह 28 डॉलर प्रति बैरल रह गया था।
 
डेलॉयट टच तोहमात्सू इंडिया के पार्टनर देवाशीष मिश्रा ने कहा कि सरकार ने उत्पाद शुल्क पर और कटौती का संकेत दिया है। इससे खुदरा कीमतों में इजाफा होने की संभावना नहीं है। लेकिन उत्पाद शुल्क में कमी का राजकोषीय घाटे पर प्रतिकूल असर हो सकता है। सरकार ने राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.2 फीसदी रखने का लक्ष्य रखा है और वह इसे बरकरार रखने के लिए प्रतिबद्घ है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और गैर कर स्रोतों से मिलने वाले राजस्व की स्थिति अभी साफ नहीं है और उत्पाद शुल्क में कटौती से सरकार के सामने एक और चुनौती आ सकती है।
 
कच्चे तेल की कीमतों में अगर और तेजी आती है तो इसका महंगाई पर असर पडऩा लाजिमी है क्योंकि थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) में कच्चे तेल और इसके उत्पादों का भारांक 10.4 फीसदी है। केयर रेटिंग्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का भारांक 2.4 फीसदी है। इसलिए कच्चे तेल की कीमतें बढऩे से डब्ल्यूपीआई महंगाई पर असर होगा। राज्य के कर और शुल्क मूल्यों के अनुरूप होते हैं, इसलिए इसका असर कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव से ज्यादा होगा।
 
इस बीच एनालिटिकल एजेंसी वुड मैकिंजी की उपाध्यक्ष एन्न लुई हिटल ने कहा, '2018 की दूसरी छमाही मे आपूर्ति और मांग में संतुलन मजबूत होगा और इससे कीमतें में तेजी आएगी। 2018 की पहली दो तिमाहियो में जरूरत से ज्यादा आपूर्ति की स्थिति बहाल होने से हम पहली छमाही में कीमतों में कमी की उम्मीद कर रहे हैं।' यह भारत के लिए अच्छी खबर होनी चाहिए क्योंकि अब अर्थव्यवस्था में स्थिरता आनी शुरू हो गई है।
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