बिजनेस स्टैंडर्ड - दवा में बढ़ा बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जलवा
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दवा में बढ़ा बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जलवा

उज्ज्वल जौहरी /  December 17, 2017

एक तरफ जब भारतीय दवा कंपनियों का प्रदर्शन शेयर बाजारों में कमजोर है, वहीं दूसरी तरफ कई बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियां बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। उदाहरण के लिए ऐबट इंडिया का शेयर हाल में 52 हफ्ते के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया, वहीं फाइजर नवंबर के दूसरे पखवाड़े में यह कारनामा दिखा चुकी है। विश्लेषकों की नजर में सनोफी इंडिया, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन फार्मा (जीएसके) और मर्क के शेयर भी आने वाले दिनों में अच्छा प्रदर्शन करेंगे। 

 
नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से उत्पन्न हुई अस्थायी दिक्कतें धीरे-धीरे दूर होने के बाद वित्त वर्ष 2018 की दूसरी छमाही में घरेलू दवा बाजार की विकास दर दो अंकों में पहुंचने की उम्मीदें मजबूत हुई हैं। इस उम्मीद के बूते ही विदेशी दवा कंपनियों का विश्वास बढ़ा है। यहां तक कि घरेलू दवा बाजार के रफ्तार पकडऩे से भारतीय दवा कंपनियों को भी लाभ होगा, लेकिन अमेरिकी दवा बाजार में उनकी उपस्थिति देखते हुए घरेलू बाजार में मिले लाभ के एक बड़े हिस्से पर पानी फिर सकता है। कीमतों से जुड़े मुद्दों और नियामकीय बाधाओं के कारण घरेलू कंपनियों का अमेरिकी दवा बाजार दबाव में है। तुलनात्मक रूप में देखें तो देसी बाजार पर अधिक जोर और जमे-जमाए ब्रांडों की बदौलत बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों की बढ़ोतरी अच्छी रह सकती है। सेंट्रम ब्रोकिंग के रंजित कपाडिय़ा कहते हैं कि इन कंपनियों का बही-खाता मजबूत है और उनके पास नकदी भी खासी है। ऐसे में स्थिर ब्याज दर वाले माहौल में उनकी दूसरी आय भी शानदार रहेगी। 
 
इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कारोबारी माहौल खासा उत्साहजनक लग रहा है। पिछले दो सालों में बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों का कारोबार प्रभावित हुआ क्योंकि इनके कई उत्पाद मूल्य नियंत्रण के दायरे में आ गए थे। नतीजा यह हुआ कि उनका मुनाफा प्रभावित हुआ और यह उनके शेयरों में कमजोर प्रदर्शन का एक बड़ा कारण बना। हालांकि अब इनकी ज्यादातर दवाएं मूल्य नियंत्रण के तहत आवश्यक दवाओं की श्रेणी में शामिल हैं, इसलिए आगे चलकर इस मोर्चे पर इनके कारोबार की राह में कोई बड़ा जोखिम नहीं दिख रहा है। स्थापित ब्रांडों के मूल्य नियंत्रण दायरे में आने के बाद इनकी कीमतें कम हो गई हैं, जिससे इनकी बिक्री बढ़ रही है। ये कंपनियां बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने और अपने ब्रांड का विस्तार करने के लिए भी पूरा प्रयास कर रही हैं। कई बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों को अधिक फायदा देने वाले टीकों (वैक्सिन कारोबार) से भी मदद मिली है। विश्लेषकों का कहना है कि इनमें कई कंपनियां बेहतर स्थिति में हैं और बाजार में इनके शेयर और चढ़ सकते हैं।
 
प्रमुख कंपनियों में ऐबट इंडिया ने सितंबर तिमाही में मजबूत प्रदर्शन किया है। इसका राजस्व 28 प्रतिशत बढ़ा जबकि मुनाफे में 7.10 प्रतिशत की तेजी आई। इन दोनों वजहों से कंपनी का शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर 83 प्रतिशत बढ़ गया। कंपनी के 16 बड़े ब्रांडों में 13 के कारोबार में बाजार की 2.8 प्रतिशत बढ़ोतरी के मुकाबले अधिक तेजी आई। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में ये ब्रांड कंपनी की रफ्तार ऐसे ही कायम रखेंगे। नोवो नॉर्डिस्क की मधुमेह के इलाज में काम आने वाली दवा के वितरण से भी एबट (कंपनी को वितरण मार्जिन मिलता है) को लाभ मिला। कपाडिय़ा का मानना है कि अधिक मुनाफा वाले टीका खंड में उपस्थिति और नए उत्पाद उतारने से भविष्य में कंपनी की वृद्धि दर में इजाफा होगा।
 
फाइजर का प्रदर्शन भी सितंबर तिमाही में मजबूत रहा। आलोच्य अवधि में कंपनी का शुद्ध मुनाफा 90 प्रतिशत उछल गया, जबकि मार्जिन में 1,290 आधार अंक सुधर आया। कंपनी के दस ब्रांड अच्छा कारोबार कर रहे हैं और अब कंपनी ने न्यू लाइन एक्सटेंशन (कोरेक्स हटाकर कोरेक्स-टी) शुरू किया है। आगे भी न्यू लाइन एक्सटेंशन (स्थापित ब्रांड के नाम से एक नई दवा की पेशकश) और उतारे जाने की योजना है। फाइजर ने अपने कुछ परिपक्व ब्रांडों की भी बिक्री की है, लेकिन एस्ट्रा जेनेका से ब्रांड भी खरीदे हैं। विश्लेषकों के अनुसार इससे कंपनी को रफ्तार कायम रखने में मदद मिलेगी।
 
सनोफी ने भी दमदार प्रदर्शन दिखाया है। इलारा कैपिटल के परम देसाई और आरती राव ने कहा कि कीमतों में कटौती के बाद बिक्री बढऩे से आंशिक या कुछ मामलों में काफी हद तक कंपनी को कम अवधि में कीमतों में कमी की भरपाई हुई है। इसके कुछ प्रमुख उत्पाद जैसे लैंटस, इन्सुमैन, कॉम्बीफ्लेम और एमारिल का लाइन एक्सटेंशन का कारोबार लगातार बढिय़ा रहा है और टूजियो जैसे नए ब्रांड से इसे और मजबूती मिलनी चाहिए। ऐसे में विश्लेषकों को कंपनी के शेयर में 10 से 25 प्रतिशत तेजी की उम्मीद है। मर्क विटामिन के कारोबार पर ज्यादा निर्भर है। उसका 45 फीसदी राजस्व इसी से आता है। उसे भी ईवायन और एपीआई विटामिल ई के मूल्य नियंत्रण से बाहर होने का फायदा मिलना चाहिए। कुल मिलाकर सितंबर तिमाही में कंपनी के शीर्ष 11 ब्रांडों में 6 ब्रांड घरेलू बाजार के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़े हैं। 
 
इससे आने वाले समय में कंपनी के शेयर में संभावनाएं मजबूत दिख रही हैं। मूल्य नियंत्रण से जीएसके का मर्जिन कम हुआ है, जिसका असर इसके कारोबार पर पड़ा है। हालांकि कंपनी ने अपने उत्पादों में इजाफा करना बंद नहीं किया है। कंपनी के शीर्ष 500 उत्पादों में 4 टीके हैं। सितंबर तिमाही में इसके निमोनिया वैक्सीन- सिन्फ्लोरिक्स के राजस्व में 24 प्रतिशत की शानदार वृद्धि हुई। जीएसके ने सितंबर तिमाही में प्रायोरिक्सटेट्रा (खसरा, मम्स और रूबेल का संयुक्त रूप) वैक्सिन उतारा है। इससे पहले कंपनी नोवार्तिस के वैक्सिन पोर्टफोलियो के लिए वितरण अधिकार खरीद चुकी थी, जिसमें लोकप्रिय दवा रैबीपुर भी शामिल है। अन्य शुरुआतों में जीएसके एन्टेरियो प्लस-प्रोबायोटिक फूड सप्लीमेंट उतारा है और नियोस्पोरिन का उत्पादन दोबारा शुरू किया है। साथ ही उसने थायरॉइड की दवा एल्ट्रॉक्सिन के उत्पादन के लिए अलग संयंत्र शुरू किया है। इन सभी प्रयासों से कंपनी की आय बढऩी चाहिए और इसके शेयर को और समर्थन मिलना चाहिए।
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