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गलत राह पर ई-वे

संपादकीय /  December 17, 2017

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली के गत 1 जुलाई को लागू होते समय सक्षमता बढ़ाने और कर आतंकवाद एवं इंस्पेक्टर राज कम करने का वादा किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीएसटी की शुरुआत के समय इसे 'बढिय़ा एवं सरल कर' बताते हुए कहा था कि इससे कारोबार खासा आसान हो जाएगा। देश भर में सामान एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने वाले ट्रकों को सीमाओं पर होने वाली नियमित जांच से  आजादी मिलना कारोबारी सहजता एवं सक्षमता का एक प्रमुख अवयव साबित होने वाला था। मोदी ने कहा था कि जीएसटी का क्रियान्वयन और राज्यों की सीमा पर बने चेक पोस्ट खत्म होने से वस्तुओं की आवाजाही में लगने वाला समय 30 फीसदी तक कम हो गया है जिससे हजारों करोड़ रुपये की बचत हुई है। हालांकि जीएसटी के प्रस्तावित प्रावधानों में से एक ई-वे बिल की शुरुआत भी थी जो कर अधिकारियों को वस्तुओं की आवाजाही पर इलेक्ट्रॉनिक निगरानी की मंजूरी देता। लेकिन कारोबारी जगत इसका विरोध करता रहा है।

 
जीएसटी लागू होने के बाद कारोबार जगत को हुए व्यापक गतिरोध की वजह से नीति-निर्माताओं ने इस विधेयक को अंतिम स्वीकृति देने से परहेज ही रखा। लेकिन पिछले हफ्ते जीएसटी परिषद ने ई-वे प्रावधान को 1 जून, 2018 से अमल में लाने का फैसला कर लिया है। एक राज्य के भीतर होने वाली माल आवाजाही भी दायरे में होगी। अंतरराज्यीय आवाजाही पर कई तरह की पाबंदियां भी जल्द शुरू होंगी। जीएसटी परिषद ने 50,000 रुपये से अधिक मूल्य वाले सभी उत्पादों को 10 किलोमीटर से अधिक दूर ले जाए जाने के लिए पूर्व-पंजीयन की समयसीमा को भी 1 अप्रैल से घटाकर 1 फरवरी कर दिया है। लेकिन ई-वे निगरानी व्यवस्था के 16 जनवरी से ही प्रायोगिक स्तर पर शुरू हो जाने से कारोबारी एवं ट्रांसपोर्टर इसे स्वैच्छिक स्तर पर पहले भी आजमा सकते हैं। अनुमान है कि इससे कारोबार जगत समयसीमा के प्रभावी होने तक खुद को बेहतर तरीके से तैयार कर लेगा।
 
ई-वे बिल का तरीका यह है कि अगर कोई कंपनी जीएसटी के तहत 50,000 रुपये मूल्य से अधिक का सामान एक जगह से दूसरी जगह ले जाना चाहती है तो उसे पहले अपने पूरे माल का ऑनलाइन पंजीकरण कराना होगा और बिल भी जमा कराना होगा जिसे कर अधिकारी कभी भी देख सकते हैं। लेकिन जीएसटी का सार तो यह रहा है कि वस्तुओं की मुक्त आवाजाही हो सके और देश भर में एक बाजार का सृजन हो। लेकिन अगर ई-वे व्यवस्था के चलते वस्तुओं की आवाजाही मुश्किल होती है तो जीएसटी की मूल अवधारणा को ही ठेस पहुंचेगी। यही वजह है कि जीएसटी सलाहकार परिषद ई-वे बिल के क्रियान्वयन को कम-से-कम वर्ष 2019 तक टाले जाने का तर्क देती रही है। लेकिन जीएसटी परिषद ने नई कर प्रणाली लागू होने के बाद राजस्व संग्रह में आई तीव्र गिरावट को देखते हुए ई-वे बिल पर आगे बढऩे का फैसला किया है। अक्टूबर में जीएसटी कर संग्रह महज 83,346 करोड़ रुपये रहा जो न्यूनतम है। सरकार को संदेह है कि सीमा पार कर रहे उत्पादों पर नगण्य जवाबदेही होने से अच्छी-खासी मात्रा में कर चोरी हो रही है।
 
इसमें कोई संदेह नहीं है कि ई-वे बिल लागू करना जोखिम भरा कदम होगा। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने अक्टूबर में ई-वे व्यवस्था के विरोध में कहा था कि इससे जीएसटी प्रणाली ही निष्प्रभावी हो जाएगी। बहुतेरे स्वतंत्र पर्यवेक्षक भी इस बात से सहमत हैं कि राजस्व संग्रह की चिंताओं से परे ई-वे व्यवस्था को अनुचित तरीके से लागू करने का आपूर्ति शृंखलाओं पर काफी प्रतिकूल असर पड़ेगा और इससे जीएसटी का 'एक देश एक कर' का मूल मकसद भी अधूरा रह जाएगा। जीएसटी परिषद को राजस्व संग्रह में आई गिरावट दूर करने के लिए अन्य विकल्प आजमाने चाहिए थे। और कुछ नहीं तो कम-से-कम ई-वे को कुछ उत्पादों तक सीमित करने के बारे में सोचा जा सकता था।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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