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यौन प्रताडऩा के मामलों से निपटने की कवायद

कनिका दत्ता /  December 14, 2017

आखिरकार 'मी टू' अभियान के चलते एक राजनेता को अमेरिकी सीनेट के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। रॉय मूर अल्बामा सीनेट सीट से रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी थे। परंतु किशोर उम्र की लड़कियों पर हमले और उनका पीछा करने के तमाम खुलासों के बाद उन्हें अपनी सीट गंवानी पड़ी। यौन शोषण के खुलासों से जुड़े 'मी टू' अभियान ने अब तक अनेक वरिष्ठ राजनेताओं, पत्रकारों और तमाम विचारधाराओं से जुड़े कलाकारों को प्रभावित किया है।

सवाल यह है कि कॉर्पोरेट अमेरिका यौन शोषण के मुद्दे पर खामोश कैसे बना रहा? और भारत जैसे देश के संस्थान जो मर्दवाद के लिए इतने कुख्यात हैं कि विदेशी निगम अपनी महिला कर्मचारियों को यहां भेजने तक से हिचकिचाते हैं, वहां क्या हालत है? भारत की कंपनियों से इतर अमेरिकी कंपनियों में हाल के वर्षों में सकारात्मक सामाजिक बदलाव को लेकर तमाम लॉबीइंग देखने को मिली है। उदाहरण के लिए ज्यादातर बड़े निगम लेस्बियन, गे बाइसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) अधिकारों का समर्थन करते हैं, और इसे आखिरकार देशव्यापी वैधानिक मंजूरी भी हासिल हो गई है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने प्रवासियों के विरोध में जो बातें कहीं और जिस तरह उन्होंने मुस्लिम देशों पर प्रतिबंध लगाने की बात की उसका इन सभी ने खुलकर विरोध किया।

परंतु तमाम सार्वजनिक छवि वाले लोगों के खिलाफ यौन शोषण के लगातार बढ़ते मामले, जिनमें एक राष्ट्रपति भी शामिल थे, अमेरिका में सामने आ चुके हैं। इससे भी ज्यादा उल्लेखनीय बात यह है कि अमेरिकी कारोबारी जगत के तमाम मुखिया जो हर विषय पर अपनी राय देते रहते हैं, वे भी इन मामलों पर चुप्पी बरतते हैं। अमेरिका के समान रोजगार अवसर आयोग (ईईओसी) के मुताबिक कार्यस्थल पर शोषण के 75 से 80 फीसदी मामले कभी सामने ही नहीं आते। यह प्रगतिशील अमेरिका की तस्वीर है। भारत में भी ऐसे मामलों के बारे में हालात लगभग समान हैं।

अमेरिकी कारोबारी जगत में शोषण मामले सामने आने की दर इतनी निराशाजनक क्यों है? यह जानना दिलचस्प है कि ईईओसी और भारत में ऐसे मामलों की वजह लगभग एक समान हैं। वीओएक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसके लिए शर्मिंदगी, भय और सांस्कृतिक वजहें उत्तरदायी हैं। प्रतिहिंसा का डर भी एक बड़ी वजह है। ताकतवर फिल्म निर्माता हार्वी वाइनस्टीन नवोदित अभिनेत्रियों का करियर खराब करने की धमकी देकर उनके साथ बेजा हरकतें करते थे। उनके खिलाफ शिकायतों का सिलसिला तब शुरू हुआ जब मूल शिकायतकर्ता के बाद एक के बाद एक कई महिलाएं सामने आईं। कॉर्पोरेट व्यवस्था में शिकायत करने वाले को होने वाले नुकसान से हम सभी वाकिफ हैं। 

भारतीय बार महासंघ द्वारा इस वर्ष कराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में 70 फीसदी महिलाएं इस डर से शिकायत नहीं करतीं कि उनके खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई की जाएगी। एक सच यह भी है कि वर्ष 2013 में कार्यस्थल पर यौन शोषण संबंधी नया कानून पारित होने के बाद मामलों का दर्ज होना बढ़ा है। अधिकांश संगठनों में औपचारिक शिकायत की प्रक्रिया को मानव संसाधन विभाग के स्तर पर ही रोक दिया जाता है। अगर आरोपित व्यक्ति अच्छा प्रदर्शन करने वाला व्यक्ति हुआ तो शायद ही शिकायत को औपचारिक रूप से दर्ज किया जाए। यौन शोषण शिकायत समिति का गठन अब कानूनन जरूरी है और उम्मीद की जाती है कि यह समस्या से निपटने में व्यवस्थागत प्रणाली अपनाएगी। 

पहली बाधा: देश की एक तिहाई से ज्यादा कंपनियां मानती हैं कि उनके यहां आंतरिक शिकायत समिति नहीं है। हर चौथी बहुराष्ट्रीय कंपनी का भी यही मानना है। देश की आधी से अधिक कंपनियों का कहना है कि उनके यहां इन समितियों में काम करने के लिए प्रशिक्षित लोगों की कमी है। 

दूसरी बाधा: अनुक्रम व्यवस्था की दिक्कत भी बरकरार है। सन 1997 में जारी किए गए दिशानिर्देश और 2013 का कानून कहते हैं कि हर शिकायत समिति में एक बाहरी सदस्य, महिलाओं के लिए काम करने वाले एक स्वयंसेवी संगठन का सदस्य होना चाहिए। इसके पीछे विचार यह है कि स्वतंत्र सदस्य को एक प्रतिष्ठिïत व्यक्ति होना चाहिए जो निष्पक्ष मशविरा दे सके। 

कंपनियों ने इस शर्त से बच निकलने का रास्ता भी निकाल लिया है। महिलाओं के खिलाफ अपराध पर शोध में विशेषज्ञता रखने वाली अनघा सरपोतदार इस बात को स्पष्टï करती हैं, 'कुछ ऐसे कदम उठाए जाते हैं जिनकी मदद से इस प्रावधान को नाकाम किया जा सके। इसके तहत किसी भी अनुशासन में स्नातक की पढ़ाई करने वाले बच्चों को बाहरी सदस्य बना दिया जाता है। नियोक्ताओं के समक्ष एक सूची होती है जिसमें से वे बाहरी सदस्य का चयन कर सकते हैं।' वह कहती हैं कि नए आदमी की या गैर अनुभव व्यक्ति की मौजूदगी समिति की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है। यह पूरी कवायद को सीमित करने वाली बात है। 

वर्ष 2013 के अधिनियम में एक संशोधन किया गया और आंतरिक शिकायत समिति को आंतरिक समिति में बदल दिया गया। अब इसके दायरे में परोक्ष शिकायतें भी शामिल हैं। अब यह समिति कार्यस्थल को महिलाओं के अनुकूल बनाने के लिए भी जवाबदेह हैं। यह कदम यकीनन अमेरिका की तुलना में भी प्रगतिशील है। अमेरिका के सामाजिक माहौल में भी पर्याप्त बदलाव आया है और वहां सार्वजनिक पदों पर बैठे पुरुष अब इसे महसूस कर रहे हैं। भारतीय समाज व्यापक तौर पर अभी उससे दूर है परंतु आशा है इसमें बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा।
 
Keyword: metoo, campaign, women, security, harassment, मी टू, यौन शोषण,
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